देवनागरी लिपि और सार्वभौमिक चेतना के स्वरूप पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न
यूरोपीय महाद्वीप की देवनागरी लिपि की इकाई की ‘देवनागरी लिपि और सार्वभौमिक चेतना का स्वरूप’ विषय पर गोष्ठी सम्पन्न हुई। यह गोष्ठी नागरी लिपि परिषद दिल्ली व साझा संसार फाऊंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में नागरी लिपि परिषद के महामंत्री डॉ. हरिसिंह पाल की अध्यक्षता में आयोजित की गई।
मुख्य अतिथि श्रीमती लीना मेंहदेले, डॉ. रामा तक्षक समन्वयक नागरी लिपि परिषद यूरोप महाद्वीप व अध्यक्ष संसार फाऊंडेशन, सुश्री अश्विनी केगांवकर प्रभारी नागरी लिपि परिषद नीदरलैंड, निधि मिश्र प्रभारी नागरी लिपि परिषद इटली, डॉ. रश्मि चौबे गाजियाबाद, भारत, डॉ. सुनीता शर्मा प्रभारी नागरी लिपि परिषद ऑस्ट्रेलिया, चिंतामणि वर्मा म्यांमार, श्रीमती श्रद्धा रामा मताई नीदरलैंड्स व श्रीमती लैलावती – लालाराम हरद्वार सिंह सूरीनाम, दक्षिण अमेरिका ने इस गोष्ठी में भाग लिया।
डॉ. रश्मि चौबे ने नागर प्रार्थना के माध्यम से देवनागरी लिपि के महत्व को रेखांकित किया। अश्विनी केगांवकर ने आयोजन का सफल संचालन किया।
डॉ. हरिसिंह पाल ने विनोबा भावे द्वारा 1975 में स्थापित नागरी लिपि परिषद के उद्देश्य व नागरी लिपि परिषद द्वारा विगत दशकों में किया जा रहे व्यवहारिक स्वरूप एवं परिषद कार्यों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि देवनागरी लिपि का प्रचार प्रसार ज्ञान का एक महायज्ञ है। उन्होंने कहा कि यह बहुत ही सुखद बात है कि प्रवासी भारतीय देवनागरी लिपि के संरक्षण एवं संवर्धन में प्रयासरत हैं।
डॉ. रामा तक्षक ने अपने वक्तव्य में कहा कि हमारे ऋषि – ऋषिकाओं ने अस्तित्व की समझ को देवनागरी लिपि के माध्यम से देह की ध्वनियों में उतारा है। यही ध्वनियाँ मंत्र को रूपायित करती हैं। इस जगत के सत्य को समझना है तो पहले अपने आप को समझना होगा। यदि भीतर समझ आएगा तो बाहर भी समझ आएगा। बाहरी जगत, देह के भीतर बसे चैतन्य का विस्तार ही है।
कौशलम न्यास पुणे की संस्थापक लीना मेंहदेले ने देवनागरी की वर्णमाला पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भाषा की शुद्धता लिपि को बचाने से ही संभव हो पाएगी। साथ ही कहा कि लिपि को सिखाना बहुत सरल है। देवनागरी लिपि ध्वन्यात्मक है। अक्षर की ध्वनि बीज मंत्र का काम करती है। देवनागरी लिपि की ध्वन्यात्मकता पर शोध हो।
डॉ. सुनीता शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि लिखे अक्षरों में हमारी स्मृतियाँ सुरक्षित रहती हैं। विचार शब्द में उतर जाता है तो समय के पार की यात्रा करता है।
लैलावती लालाराम हरद्वार सिंह ने सूरीनाम में हिंदी भाषा के पाठ्यक्रम की पुस्तकों पर चर्चा की। साथ ही उन्होंने रामायण के माध्यम से देवनागरी लिपि के महत्व को प्रतिपादित किया।
श्रद्धा रामा मताई ने अपने नाना रमेश रामावतार सिंह के नीदरलैंड्स में हिंदी भाषा के योगदान के विषय बताते हुए कहा कि उन्हें नीदरलैंड्स में ‘हिंदी का पितामह’ के नाम से जाना जाता है। नाना के पास नीदरलैंड्स में हिंदी भाषा की पुस्तकों का सबसे बड़ा पुस्तकालय है। देवनागरी में लिखना एक कला है। भाषा को लिखना आवश्यक है। देवनागरी लिपि भारतीय संस्कृति को संरक्षित रखने में सक्षम है।
चिंतामणि वर्मा ने म्यामांर में अपनी 51 वर्ष की हिंदी सेवा के विषय में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि म्यांमार में हरि भजन शर्मा को ‘हिंदी का जनक’ कहा जाता है। उनके द्वारा 360 से अधिक पाठशालाओं की तथा हिंदी साहित्य सम्मेलन की भी म्यांमार में स्थापना की।
निधि मिश्र ने स्वागत वक्तव्य के साथ साथ देवनागरी लिपि की महत्ता पर बात करते हुए कहा कि हिंदी भाषा को देवनागरी लिपि में लिखने का बहुत महत्व है। विदेशी छात्रों को देवनागरी लिपि में लिखना सिखाना आवश्यक है ताकि वे भारत भ्रमण के समय देवनागरी लिपि में लिखे को पढ़ सकें। साथ ही आमजन से बात कर सकें।
इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में भारत से भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के वरिष्ठ निदेशक श्री सुनील कुमार सिंह, केंद्रीय हिंदी संस्थान हैदराबाद के डॉ. भास्कर दुबे, नीदरलैंड के हिंदी से भी डॉ. अरविंद व्यास काबुल अफगान के लखनऊ में शोध छात्र मलिक मोहम्मद नसेरी, कोट्टयम केरल के हिंदी प्राध्यापक डॉ. अनीश सिरीएक, डॉ. रेखा, महाराष्ट्र के प्राचार्य डॉ. पोपट राव कोटमे, डॉ. देवीदास बामने, जयवीर सिंह, शांतिनिकेतन पश्चिम बंगाल के हिंदी अधिकारी डॉ. गोपाल कुमार, राँची झारखंड के डॉ. गणेश पोद्दार, जयपुर राजस्थान की डॉ. सुमन सिरोहीवाल, उज्जैन के प्रोफेसर रामचरण कुसुमरिया, तापी गुजरात के हिंदी प्राध्यापक डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह, राजेश कुमार सिंह, यूके से तितिक्षा शाह, पटना बिहार के पत्रकार सोनू कुमार, बिजनौर के नरेश सिंह, कानपुर के अध्यापक जितेंद्र कुमार पाल, डॉ. अस्मिता शर्मा, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी की डॉक्टर सुनीता वर्मा, दूरदर्शन के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी डॉ. अजय कुमार ओझा, दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी राजेंद्र पाल सहित देश विदेश के अनेक नागरिक लिपि प्रचारक और विद्वान उपस्थित रहे धन्यवाद ज्ञापन संयोजक नीदरलैंड के डॉक्टर रामापीरक्षक ने प्रस्तुत किया। अतिथि वक्ता अरविंद व्यास और गोपाल कुमार ने भी लिपियों के विषय में जानकारी दी।

