Category: प्रवासी कविता

भावना ( कविता ) : डॉक्टर शिवनंदन यादव

भावना ( कविता ) : डॉक्टर शिवनंदन यादव मैंने पूछा कि भावना क्या है?कौन-सा रूप, धारणा क्या है?भावना दुलार, नेह, ममता है,मीरा का गीत, सूर-कविता है; भावना मिलन-सांझ, सरस प्रेम-पाती…

बूढ़ी यादें ( कविता ) : डॉ. शैलजा सक्सेना

बूढ़ी यादें ( कविता ) : डॉ. शैलजा सक्सेना याद आ रही तेरी बेटादिन में ही अँधियारा छायाआँखें अब कमज़ोर हो गईं,सही लग रहा मैला-मैला॥ तू अपने घर उलझा है,पर…

पिछली रोटी ( कविता ) : डॉ. शैलजा सक्सेना

पिछली रोटी ( कविता ) : डॉ. शैलजा सक्सेना उसने कभी नहीं दीपिछली रोटीअपने पति और बच्चों को,….ख़ुद ली…!! जब भूलने लगी अपना होना,तो याद आयामाँ ने भी नहीं दी…

दो लड़कियाँ ( कविता ) : डॉ. शैलजा सक्सेना

दो लड़कियाँ ( कविता ) : डॉ. शैलजा सक्सेना दो –दो लड़कियाँ रहती हैं मेरे भीतर!एक वो, जो पैदा हुई थीगली के कोने वाले घर में जहाँ सौर के बाहर…

“धरती ने भिजवाई पाती” : संगीता चौबे ‘पंखुड़ी’

“धरती ने भिजवाई पाती” : ( कविता ) धरती ने भिजवाई पातीजिसमें पीड़ा और उदासीझर झर उसके आँसू बहतेतेज गति से तरु जब कटते…. सुनो मनुज! अब मेरी गाथाकब तक…

साइकिल – स्वास्थ्य और खुशी का साथी : सांद्रा लुटावन (कविता)

साइकिल – स्वास्थ्य और खुशी का साथी : सांद्रा लुटावन (कविता) सुबह की पहली किरण जब धरती पर मुस्काती है,हल्की ठंडी हवा भी मन को छू जाती है।सड़क किनारे खड़ी…

तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहां पाते हैं ?

अनूप भार्गव अक्सर जमाने कीज़बरदस्ती ओढाई गईतहज़ीब की चाशनी मेंफ़िसल के लौट जाते हैं , तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहां पाते हैं ? तुम्हारे होठों के गोल होने…

दृश्य: सुबह – डॉ. शैलजा सक्सेना ( कविता )

दृश्य: सुबह – डॉ. शैलजा सक्सेना ( कविता ) हवा शान्त है,रात बरसता मेह रुक गया,सड़कें पानी पीकर लेटीं,पत्ते सभी नहाये दिखते,सूरज भी अब बदन पौंछ कर,आने की तैयारी में…

दृश्य: वर्षा – डॉ. शैलजा सक्सेना ( कविता )

दृश्य: वर्षा – डॉ. शैलजा सक्सेना ( कविता ) आज धूप की मुठ्ठी बाँधेसूरज बादल पीछे दुबकाऔर हवा की बन आई हैघर-घर जा कर चुगली करती। सूरज व्याकुल देख रहा…

“चाय की मिठासक्ष” – सांद्रा लुटावन

“चाय की मिठासक्ष” – सांद्रा लुटावन सुबह की शुरुआत हो या शाम का समाँ,चाय हर पल को बना देती है सुहाना।कभी हल्की भाप में सुकून मिलता है,कभी एक प्याले में…

“प्रवासी मजदूर”- डॉ. वंदना मुकेश

“प्रवासी मजदूर”- डॉ. वंदना मुकेश छत होती तो देखती,गली से निकलतेप्रवासी मजदूरों की टोलियाँ।देखती कुछ औरतें,कुछ बच्चे लटकाए,कंधों पर झोले अटकाए। कुछ औरतें,खाली पेटवाली,कुछ पेटवाली, खाली। मुझे छत चाहियेकि देख…

हम मिलें आमने-सामने (कविता)

हम मिलें आमने-सामने (कविता) (बृद्धावस्था, सामयिक चिंतन) खुशी की खोज में मैं करवटें बदलता हूँमैं कोई संगीतकार या कवि नहीं हूँऔर नहीं हूँ शब्दों का जाल बिछाता लेखकजो बनाते हैं…

प्रभु का ध्यान (कविता)

प्रभु का ध्यान (कविता) (आत्मिक चिंतन, अधूरे प्रश्न) प्रभु, मैं कैसे ध्यान करूँ?अपने मन के भावों को कैसे तुम्हें बताऊँश्रद्धा भक्ति के गीतों को कैसे तुम्हें सुनाऊँ व्याथापूर्ण वाणी को…

राही एक सड़क पर (कविता)

राही एक सड़क पर (कविता) (प्रवासी जीवन, भावनात्मक संघर्ष) विजय पताका लेकर भागा, दुनिया की इस दौड़ मेंकालचक्र की सुधि नहीं थी, यौवन के इस खेल में lसुख-दुःख का बन्धन…

चौक पुराये मंगल गायें – (कविता)

डॉ. शिप्रा शिल्पी (कोलोन, जर्मनी) ***** चौक पुराये मंगल गायें चौक पुराये मंगल गायें, आई है दीवालीनाचे-गायें ख़ुशी मनायें, आई है दीवाली धनतेरस खुशहाली लायाजन-जन का है मन हर्षायामिलजुल कर…

रावण (कविता)

दसग्रीव दशानन् दसकंधर कहलाता थाजब रावण चलता सारा जग हिल जाता थावो था पंडित-विद्वान और था बलशालीउसके सन्मुख देवों का जी थर्राता था रावण ने सोने की लंका बनवाई थीतीनों…

हिंदी दिवस – (कविता)

अर्चना ***** हिंदी दिवस हिंदी शब्द सुन तरंगित हो उठे मन मेराकलम भी आतुर कुछ लिखने कोभारत भूमि से कोसों दूरएकत्रित हम यहाँदेने को सम्मानअपनी मातृभाषा कोक्यों ना इतराओं मैंइस…

रिश्ते – (कविता)

अर्चना ***** रिश्ते रिश्तों का अस्तित्व क्या है ? क्या समझ पाया है कोई ?बड़े बेमानी से लगते हैं ये रिश्ते क्या फूल से नाज़ुक या छुइमुई से हैं ?…

सच्चा साथी – (कविता)

अर्चना ***** सच्चा साथी इंसान हूँ इस्तेमाल हेतु कोई वस्तु नहींसीढ़ी बना अपनी मंज़िल पाना,सभी का शौक़ रहा।हर रिश्ते को बहुत ईमानदारी से निभाया,पर हर बार छली गई।भीड़नुमा रिश्तों के…

मेरी माँ – (कविता)

अर्चना ***** मेरी माँ ममता का सागर,मेरी प्यारी माँ।ज्ञान सरस्वती तुल्य है,सभी ग्रंथ है कंठस्थ,ज्ञान की खान है,मेरी प्यारी माँ….करुणा बुद्ध तुल्यजन्म जाति से परेअमीर हो या ग़रीबसब के दुःख…

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