दिन विशेष विमर्श में शैलजा सक्सेना की कविताएं
दिन विशेष विमर्श में शैलजा सक्सेना की कविताएं संवेदनशीलता कनाडा की शैलजा सक्सेना जी कविताओं की विशेषता हैं। उनकी कविताएँ उन विषयों पर हैं, जो खुद अपने बारे में नहीं…
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दिन विशेष विमर्श में शैलजा सक्सेना की कविताएं संवेदनशीलता कनाडा की शैलजा सक्सेना जी कविताओं की विशेषता हैं। उनकी कविताएँ उन विषयों पर हैं, जो खुद अपने बारे में नहीं…
दिन विशेष विमर्श में शालिनी वर्मा की कविताएँ पिछले 25 वर्षों से दोहा, कतर में हिंदी लेखन, भाषा एवं साहित्य में सेवारत शालिनी वर्मा के लेखन में भारतीय संस्कृति और…
दिन विशेष विमर्श में डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे की कविता का पाठ डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे भारत की बेटी, सूरीनाम की बहू एवं नीदरलैंड की स्थायी निवासी हैं…
कविता-विमर्श में ऋचा जैन की कविताएँ ‘फ़ोन पर माँ’ और ‘मैं राधा ही तो हूँ’ लंदन की ऋचा जैन की कविताओं को पढ़ते हुए आप अनुभूत कर सकते हैं कि…
प्रगति टिपणीस की कविताएं कविता विमर्श में आज पढिए, मूलतः लखनऊ से प्रगति टिपणीस पिछले तीस से अधिक वर्षों से मॉस्को में निवास कर रही हैं। वे पेशे से इंजीनियर…
भावना ( कविता ) : डॉक्टर शिवनंदन यादव मैंने पूछा कि भावना क्या है?कौन-सा रूप, धारणा क्या है?भावना दुलार, नेह, ममता है,मीरा का गीत, सूर-कविता है; भावना मिलन-सांझ, सरस प्रेम-पाती…
बूढ़ी यादें ( कविता ) : डॉ. शैलजा सक्सेना याद आ रही तेरी बेटादिन में ही अँधियारा छायाआँखें अब कमज़ोर हो गईं,सही लग रहा मैला-मैला॥ तू अपने घर उलझा है,पर…
पिछली रोटी ( कविता ) : डॉ. शैलजा सक्सेना उसने कभी नहीं दीपिछली रोटीअपने पति और बच्चों को,….ख़ुद ली…!! जब भूलने लगी अपना होना,तो याद आयामाँ ने भी नहीं दी…
दो लड़कियाँ ( कविता ) : डॉ. शैलजा सक्सेना दो –दो लड़कियाँ रहती हैं मेरे भीतर!एक वो, जो पैदा हुई थीगली के कोने वाले घर में जहाँ सौर के बाहर…
“धरती ने भिजवाई पाती” : ( कविता ) धरती ने भिजवाई पातीजिसमें पीड़ा और उदासीझर झर उसके आँसू बहतेतेज गति से तरु जब कटते…. सुनो मनुज! अब मेरी गाथाकब तक…
साइकिल – स्वास्थ्य और खुशी का साथी : सांद्रा लुटावन (कविता) सुबह की पहली किरण जब धरती पर मुस्काती है,हल्की ठंडी हवा भी मन को छू जाती है।सड़क किनारे खड़ी…
अनूप भार्गव अक्सर जमाने कीज़बरदस्ती ओढाई गईतहज़ीब की चाशनी मेंफ़िसल के लौट जाते हैं , तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहां पाते हैं ? तुम्हारे होठों के गोल होने…
दृश्य: सुबह – डॉ. शैलजा सक्सेना ( कविता ) हवा शान्त है,रात बरसता मेह रुक गया,सड़कें पानी पीकर लेटीं,पत्ते सभी नहाये दिखते,सूरज भी अब बदन पौंछ कर,आने की तैयारी में…
दृश्य: वर्षा – डॉ. शैलजा सक्सेना ( कविता ) आज धूप की मुठ्ठी बाँधेसूरज बादल पीछे दुबकाऔर हवा की बन आई हैघर-घर जा कर चुगली करती। सूरज व्याकुल देख रहा…
“चाय की मिठासक्ष” – सांद्रा लुटावन सुबह की शुरुआत हो या शाम का समाँ,चाय हर पल को बना देती है सुहाना।कभी हल्की भाप में सुकून मिलता है,कभी एक प्याले में…
“प्रवासी मजदूर”- डॉ. वंदना मुकेश छत होती तो देखती,गली से निकलतेप्रवासी मजदूरों की टोलियाँ।देखती कुछ औरतें,कुछ बच्चे लटकाए,कंधों पर झोले अटकाए। कुछ औरतें,खाली पेटवाली,कुछ पेटवाली, खाली। मुझे छत चाहियेकि देख…
हम मिलें आमने-सामने (कविता) (बृद्धावस्था, सामयिक चिंतन) खुशी की खोज में मैं करवटें बदलता हूँमैं कोई संगीतकार या कवि नहीं हूँऔर नहीं हूँ शब्दों का जाल बिछाता लेखकजो बनाते हैं…
प्रभु का ध्यान (कविता) (आत्मिक चिंतन, अधूरे प्रश्न) प्रभु, मैं कैसे ध्यान करूँ?अपने मन के भावों को कैसे तुम्हें बताऊँश्रद्धा भक्ति के गीतों को कैसे तुम्हें सुनाऊँ व्याथापूर्ण वाणी को…
राही एक सड़क पर (कविता) (प्रवासी जीवन, भावनात्मक संघर्ष) विजय पताका लेकर भागा, दुनिया की इस दौड़ मेंकालचक्र की सुधि नहीं थी, यौवन के इस खेल में lसुख-दुःख का बन्धन…
डॉ. शिप्रा शिल्पी (कोलोन, जर्मनी) ***** चौक पुराये मंगल गायें चौक पुराये मंगल गायें, आई है दीवालीनाचे-गायें ख़ुशी मनायें, आई है दीवाली धनतेरस खुशहाली लायाजन-जन का है मन हर्षायामिलजुल कर…