गजरे का एक फूल ( गीत ) : बालस्वरूप ‘राही’ पूजा की माला में कैसे तो गुँथ गयाएक फूल गजरे काअर्चना के बोलों से आ जुडीमुजरे की एक कड़ी। गंगा के बीच नहींछिछले तालाब में उतरती हैंमन्दिर की सीढियाँ,फूल नहीं, दीप नहींउनसे टकराती हैंपानों की पीक और बीड़ियाँ। सामने दुकानें हैं, होटल हैं, बार हैंजहाँ […]
हिंदी के इस वैश्विक मंच में 50 से अधिक देशों और भारत के प्राय: सभी राज्यों में स्थित लेखकों / विद्वानों की सक्रिय भागीदारी है। हमारा मानना है कि व्यावसायिक क्षेत्र में हिंदी का विकास ही हिंदी का भविष्य है और हम भाषा के प्रति सहानुभूति पर नहीं योगदान पर विश्वास करते हैं। आप सब का आह्वान करते हैं कि भाषा संबंधी परियोजनाओं को अपनी ऊर्जा और समय का योगदान कर मूर्त रूप दें।










इस तरह तो ( गीत ) : बालस्वरूप ‘राही’
इस तरह तो ( गीत ) : बालस्वरूप ‘राही’ इस तरह तो दर्द घट सकता नहींइस तरह तो वक़्त कट सकता नहींआस्तीनों से न आँसू पोछिएऔर ही तदबीर कोई सोचिए। यह अकेलापन, अँधेरा, यह उदासी, यह घुटनद्वार तो हैं बंद भीतर किस तरह झाँके किरण। बंद दरवाज़े ज़रा-से खोलिएरौशनी के साथ हँसिये-बोलिएमौन पीले पत्ते सा […]
पाँच मुक्तक ( गीत ) : बालस्वरूप ‘राही’
पाँच मुक्तक ( गीत ) : बालस्वरूप ‘राही’ 1. मेरा विश्वास पराजय को ज़हर होता हैमेरा उल्लास उदासी को क़हर होता हैमुझे घिरते हुए अँधियारे की परवाह क्यामेरी हर रात का अंजाम सहर होता है 2. आज बदली है ज़माने ने नई ही करवटनई धरा ने विचारों का छुआ है युग तटतुम जिसे मौत की […]
यात्रा ( गीत ) : बालस्वरूप ‘राही’
यात्रा ( गीत ) : बालस्वरूप ‘राही’ इन पथरीले वीरान पहाडों परज़िन्दगी थक गई है चढ़ते-चढ़ते । क्या इस यात्रा का कोई अंत नहींहम गिर जाएँगे थक कर यहीं कहींकोई सहयात्री साथ न आएगाक्या जीवन-भर कुछ हाथ न आएगा क्या कभी किसी मंज़िल तक पहुँचेंगेया बिछ जाएँगे पथ गढ़ते-गढ़ते। धुँधुआती हुई दिशाएँ : अंगारेये खण्डित दर्पण : […]
अधूरी समाप्तियाँ ( गीत ) : बालस्वरूप ‘राही’
अधूरी समाप्तियाँ ( गीत ) : बालस्वरूप ‘राही’ सब समाप्त हो जाने के पश्चात भीकुछ ऐसा हैजो कि अनहुआ रह जाता है चलते-चलते राह कहीं चुक जाती हैलेकिन लक्ष्य नहीं मिलताचाहे रखो उसे जल में या धूप मेंकिन्तु फूल कोई दो बार नहीं खिलता खिले फूल के झर जाने के बाद भीशापग्रस्त सौरभ उसकाकिसी डाल […]
प्यास के क्षण ( गीत ) : बालस्वरूप राही
प्यास के क्षण ( गीत ) : बालस्वरूप राही बाँट दो सारा समंदर तृप्ति के अभिलाषकों में,मैं अंगारे से दहकते प्यास के क्षण माँगता हूँ, दूर तक फैली हुई अम्लान कमलों की कतारें,किन्तु छोटा है बहुत मधुपात्र रस लोभी भ्रमर का,रिक्त हो पाते भला कब कामनाओं की सुराही,टूट जाता है चिटख कर किन्तु हर प्याला […]
पलकें बिछाए तो नहीं बैठीं ( गीत ) : बालस्वरूप ‘राही’
पलकें बिछाए तो नहीं बैठीं ( गीत ) : बालस्वरूप ‘राही’ कटीले शूल भी दुलरा रहे हैं पाँव को मेरेकहीं तुम पंथ पर पलकें बिछाए तो नहीं बैठीं ! हवाओं में न जाने आज क्यों कुछ-कुछ नमी-सी है,डगर की उष्णता में भी न जाने क्यों कमी-सी है,गगन पर बदलियाँ लहरा रही हैं श्याम-आँचल-सीकहीं तुम नयन में […]
क़तआत ( ग़ज़ल ) : बालस्वरूप ‘राही’
क़तआत ( ग़ज़ल ) : बालस्वरूप ‘राही’ 1. जानता हूँ कि ग़ैर हैं सपनेऔर खुशियाँ भी ये अधूरी हैंकिंतु जीवन गुज़ारने के लिएकुछ ग़लत फ़ेहमियाँ ज़रूरी हैं 2. हसरतों की ज़हर बुझी लौ मेंमोम-सा दिल गला दिया मैंनेकौन बिजली की धमकियाँ सहताआशियाँ ख़ुद जला दिया मैंने 3. दर्द के हाथ बिक गई ख़ुशियाँऔर हम बेच […]
लगे जब चोट सीने में हृदय का भान होता है ( ग़ज़ल ) : बालस्वरूप ‘राही’
लगे जब चोट सीने में हृदय का भान होता है ( ग़ज़ल ) : बालस्वरूप ‘राही’ लगे जब चोट सीने में हृदय का भान होता हैसहे आघात जो हँसकर वही इंसान होता है । लगाकर कल्पना के पर उड़ा करते सभी नभ परशिला से शीश टकराकर मुझे अभिमान होता है । सुबह औ’ शाम आ-आ […]
अचानक दोस्ती करना, अचानक दुश्मनी करना ( ग़ज़ल ) : बालस्वरूप ‘राही’
अचानक दोस्ती करना, अचानक दुश्मनी करना ( ग़ज़ल ) : बालस्वरूप ‘राही’ अचानक दोस्ती करना, अचानक दुश्मनी करनाये उसका शौक है यारों सभी से दिल्लगी करना सभी जज़्बात को दीवानगी की हद समझते हैंये ऐसा दौर है इसमें सँभल कर शायरी करना अँधेरे आँधियाँ बनकर चिरागों को बुझाते हैंबड़ा मुश्किल है दुनिया में ज़रा सी […]
