मेरे शब्द – मेरी दृष्टि (रिपोर्ट)

इस सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर सुधा सिंह विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा की गई। उन्होंने अध्यक्षीय वक्तव्य में रचना, आलोचना और जीवन-मूल्यों के गहरे संबंध पर विचार रखा। उन्होंने कहा कि अनुभव के बिना रचना संभव नहीं, पर केवल अपना अनुभव ही पर्याप्त नहीं है। लेखक को दूसरों के अनुभवों में प्रवेश करना सीखना पड़ता है-इसके बिना रचना सीमित हो जाती है।

उन्होंने स्त्रियों के लेखन संघर्ष पर आत्मालोचनात्मक दृष्टि रखते हुए कहा कि कठिनाइयों के लिए केवल बाहरी परिस्थितियों को दोष देना पर्याप्त नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं में हमारी अपनी भूमिका को भी समझना होगा। परिवार संस्था स्त्रियों से दायित्व चाहती है, इसलिए उसे स्वयं के लिये स्पेस नहीं मिलता।

उन्होंने यह भी कहा कि आज सूचना का अतिरेक है, पर उसमें से सार्थक और मानवीय तत्व चुन पाना कठिन हो गया है। रचनाकार को इस चुनौती से जूझते हुए समाज को आगाह करने वाली दृष्टि विकसित करनी होगी। शब्दों से हृदय की अभिव्यक्ति होती है। उन्होंने पाठक के भरोसे को लेखक की सबसे बड़ी पूँजी बताते हुए कहा कि शब्द ठग भी सकते हैं, इसलिए लेखक की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। रचना में जिन मूल्यों की स्थापना की जाती है, जीवन में उनसे बहुत दूर खड़ा लेखक पाठक का विश्वास खो देता है।

उन्होंने कहा कि जो दिख रहा है, उसका बयान कर देना रचना नहीं है। उन्होंने मुक्तिबोध के संदर्भ में इस त्रिकोण को रेखांकित किया कि रचना के लिए जीवन-मूल्य, रचना-मूल्य और सृजन-इन तीनों का संतुलन आवश्यक है। अंत में उन्होंने कहा कि रचना ही लेखक की संतान होती है और वही उसे भविष्य में जीवित रखती है।

मुख्य अतिथि ममता कालिया ने अपने वक्तव्य में भाषा, पात्र और विश्वसनीयता के संबंध को अत्यंत सहज ढंग से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि लेखक सबसे पहले अपनी भाषा नहीं, बल्कि अपनी दृष्टि चुनता है। दृष्टि स्वयं तय कर लेती है कि कौन-सा पात्र लेखक संभाल सकता है और कौन-सा नहीं। इसलिए लेखक वही लिख सकता है, जिसे उसने जाना और जिया है।

उन्होंने कहा कि पात्र अपनी भाषा स्वयं लेकर आते हैं-मजदूर अध्यापक की भाषा नहीं बोलेगा और अध्यापक मजदूर की। रचना की विश्वसनीयता इसी भाषाई सच्चाई से बनती है। उन्होंने प्रेमचंद का उदाहरण देते हुए बताया कि पात्रों की भाषा का सूक्ष्म भेद ही उन्हें जीवंत बनाता है।

अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि अलग-अलग शहरों, संस्कृतियों और भाषाओं की ‘रगड़’ ने उनकी भाषा को समृद्ध किया। मराठी, गुजराती, अंग्रेज़ी, ब्रज, मालवी, बंगाली व हिंदी- इन सबके मेल से उनकी भाषा बनी। उन्होंने कहा कि भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन की स्मृतियों और अनुभवों का परिणाम है। तुलसी और कालिदास की शब्द संपदा को देखना और समझना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि कई बार पाठक किसी रचना पर विश्वास नहीं कर पाता और उसे बीच में छोड़ देता है – यह भाषा और दृष्टि की असफलता होती है। वहीं कुछ रचनाएँ असहमति के बावजूद पाठक के भीतर बैठ जाती हैं।

अपने उपन्यास बेघर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पाठक वर्षों बाद भी पात्रों के भविष्य के बारे में पूछते हैं – यही रचना की सफलता है। अंत में उन्होंने कहा कि सफल रचना वही है, जो पाठक को यह महसूस करा दे कि यह उसके अपने जीवन की कहानी है।

विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर जितेंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि उनका प्रारंभिक जीवन गाँव में बीता, और वही गाँव – उसका श्रम, संघर्ष, स्त्री जीवन, किसान और वंचित समाज – उनकी कविता की बुनियाद बना। रचनाकार अपनी स्मृतियों से सीखता है, उनका मूल्यांकन करता है और वही स्मृतियाँ रचना को जीवन्त बनाती हैं। उन्होंने कहा कि जीवन निरंतर बदलता है और रचनाकार को यह आत्ममूल्यांकन करते रहना चाहिए कि वह अपने प्रारंभिक अनुभवों से कितना दूर आ गया है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि रचनाकार को अपने भीतर के मनुष्य को मरने नहीं देना चाहिए। पद, सत्ता, सुविधा और उपलब्धियाँ धीरे-धीरे मनुष्य को कृत्रिम बना देती हैं, जिससे रचना खोखली हो जाती है।

उन्होंने कहा कि केवल शिल्प या अर्जित ज्ञान के बल पर कविता नहीं चलती। पाठक ऐसी कविता को पहचान लेता है। रचना तभी टिकती है जब वह जीवनानुभवों की सच्चाई से उपजी हो। उन्होंने अपने कवि को अपने शिक्षक या प्रशासक से पृथक रखने की बात कहते हुए रचनात्मक ईमानदारी पर बल दिया।

मुख्य वक्ता प्रोफेसर अल्पना मिश्र ने अपने वक्तव्य में अनुभव के साथ-साथ दृष्टि (विजन) को रचना की आत्मा बताया। उन्होंने ऋग्वेद और उपनिषदों के संदर्भ में कहा कि अनुभव से ही ज्ञान जन्म लेता है, परंतु शब्द तभी प्राणवान होते हैं जब उनके पीछे दृष्टि होती है। केवल भाषा की सुंदरता बिना दृष्टि के निष्प्रभावी हो जाती है।

उन्होंने कहा कि लेखक के चारों ओर असंख्य कथाएँ बिखरी होती हैं, पर उन्हें समेटने और व्यक्त करने का समय बहुत सीमित होता है। विशेषतः स्त्रियों के लिए लेखन और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है, क्योंकि उन्हें अनेक स्तरों की जिम्मेदारियों के बीच रचना करनी पड़ती है।

उन्होंने मरीना त्स्वेतायेवा के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि हर रचना लेखक के जीवन से ‘चोरी की गई’ घटना होती है, पर वह हूबहू नहीं होती। लेखक अपने अनुभव, दृष्टि और संवेदनशीलता से पात्रों को नया रूप देता है। उन्होंने कहा कि लेखन केवल कल्पना नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है। लेखन बहुत सी दोस्तियॉं भी देता है अन्य कलाओं के साथ।  उन्होंने यह भी बताया कि कई बार पात्र लेखक पर हावी हो जाते हैं और लेखक उनकी दिशा में चलने लगता है। शब्द तभी सार्थक होते हैं जब उनमें दृष्टि, नैतिकता और मानवीय प्रतिबद्धता समाहित हो।

सत्र ‘मेरे शब्द – मेरी दृष्टि’ साहित्यिक चिंतन, रचनात्मक अनुभव एवं वैचारिक गहराई की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण एवं सारगर्भित रहा। इस सत्र में रचनाकार की दृष्टि, अनुभव, भाषा और सामाजिक उत्तरदायित्व पर गहन विमर्श किया गया। सारिका कालरा ने सत्र संचालन के साथ-साथ पूरे विमर्श को सूत्रबद्ध किया। संयोजन डॉ. उपासना दीक्षित द्वारा किया गया। धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र समाप्ति की गई।

रिपोर्ट प्रस्तुति- डॉ. संध्या सिलावट

सत्र – मेरे शब्द – मेरी दृष्टि

स्थान – दर्शनम्‌ – 2 सभागार – इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली

सत्र दिनांक -09 जनवरी,  2026

समय- 06: 00 से

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