परदेसी मन की संवेदनाओं में देशप्रेम की अभिव्यक्ति कार्यक्रम सम्पन्न

दिनाँक 16/08/2026, विश्व हिंदी सचिवालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा 16 अगस्त 2026 को एक महत्वपूर्ण ऑनलाइन संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय “परदेसी मन की संवेदनाएँ” रही
डॉ. पुष्पिता अवस्थी (नीदरलैंड) ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि मातृभूमि की स्मृतियाँ प्रवासी मन में सदैव जीवित रहती हैं और कविता मनुष्य को संवेदनशील बनाने का सशक्त माध्यम है। उन्होंने ‘स्मृतियों के देश में स्वदेश’ कविता प्रस्तुत की। कार्यक्रम में अनिल जोशी (अध्यक्ष, वैश्विक हिन्दी परिवार)ने अपनी चर्चित कविता ‘नींद कहाँ है?’ के माध्यम से प्रवासी जीवन के अकेलेपन, व्याकुलता और स्वदेश की स्मृतियों को स्वर दिया। उन्होंने संदेश दिया कि भारत न जा सकें तो भारत को अपने भीतर बसा सकते हैं।

रोहित कुमार ‘हैप्पी’ (न्यूजीलैंड) ने शहीदों के बलिदान और राष्ट्रप्रेम को स्वर दिया। रेखा राजवंशी (ऑस्ट्रेलिया) ने भारतीय संस्कृति, ज्ञान-परंपरा और मातृभूमि के प्रति नमन की भावना व्यक्त की। डॉ. शिप्रा शिल्पी सक्सेना (जर्मनी) ने प्रवासी जीवन में भारत की स्मृतियों और देशप्रेम को अभिव्यक्त किया। शालिनी वर्मा (कतर) ने बदलते और विकासशील भारत को अपनी कविता का विषय बनाया। मनीष पांडे (नीदरलैंड) ने प्रवासी मन की पीड़ा, स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और तिरंगे के गौरव को स्वर दिया।
आस्था देव (ब्रिटेन) ने ‘नया शहर लंदन’ और ‘गुलमोहर के रंग’, शिखा रस्तोगी (थाईलैंड) ने ‘माटी की पुकार’ तथा आस्था नवल (अमरिका) ने ‘माँ के घर वाली छुट्टी’ और ‘झुमके’ जैसी रचनाओं के माध्यम से प्रवासी जीवन, मातृभूमि की स्मृतियों, अपनत्व और भावनात्मक द्वंद्व को अभिव्यक्त किया। आराधना झा श्रीवास्तव ने ‘देश बहता है रगों में’ के माध्यम से राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक एकता की भावना को स्वर दिया।
कार्यक्रम में यह भाव प्रमुखता से उभरा कि प्रवासी भारतीय भले ही भौगोलिक रूप से भारत से दूर हों, लेकिन उनकी स्मृतियों, संवेदनाओं और सांस्कृतिक चेतना में भारत सदैव जीवंत रहता है। कविताओं ने भौगोलिक दूरियों को मिटाते हुए मातृभूमि से भावनात्मक जुड़ाव को और गहरा किया।
कार्यक्रम का संचालन आराधना झा श्रीवास्तव (सिंगापुर) ने किया तथा ऋषि कुमार शर्मा (अध्यक्ष वैश्विक हिन्दी, दिल्ली इकाई) ने धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने सभी रचनाकारों, वैश्विक हिंदी परिवार के सहयोगियों और सहभागी संस्थाओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि कविताओं की खुशबू हर हृदय तक पहुँचे और हिंदी की ज्योति विश्व के आंगन में सदैव जलती रहे।
