वैश्विक भाषा के रूप में हिंदी : स्थिति और दिशाओं पर वैश्विक हिंदी परिवार का साप्ताहिक कार्यक्रम

Suchna (13)

वैश्विक हिंदी परिवार का साप्ताहिक कार्यक्रम हिंदी दिवस पखवाड़े के अंतर्गत केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद और वातायन यूके के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। कार्यक्रम का विषय “वैश्विक भाषा के रूप में हिंदी : स्थिति और दिशाएं” रहा। देश-विदेश से जुड़े साहित्यकारों, भाषा सेवियों और विद्वानों ने हिंदी की वैश्विक स्थिति, चुनौतियों और संभावनाओं पर विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का संचालन यूके से अतीक्षा जी ने किया। प्रारंभ में नर्मदा कुमारी ने 28 सितंबर 2026 को आयोजित होने वाली निःशुल्क ऑनलाइन हिंदी प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता की जानकारी दी। प्रतियोगिता में 17 से 25 वर्ष के युवा भाग ले सकेंगे।

जापान से पद्मश्री प्रो. तोमियो मिजोकामी ने हिंदी के साथ अपने लगभग 65–67 वर्षों के जुड़ाव और जापान में हिंदी शिक्षण के विकास का अनुभव साझा किया। उन्होंने हिंदी के प्रति आत्मविश्वास बढ़ाने, उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रतिष्ठित करने तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में मातृभाषा आधारित शिक्षा के महत्व पर चर्चा की।

डॉ. पद्मेश गुप्त (लेखक व संरक्षक, वैश्विक हिन्दी परिवार) ने हिंदी को केवल भावनात्मक जुड़ाव की भाषा न बनाकर शिक्षा, रोजगार, तकनीक, व्यवसाय और व्यक्तित्व-विकास के अवसरों से जोड़ने पर बल दिया। उन्होंने हिंदी साहित्य और ज्ञान-संपदा के डिजिटलीकरण तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से उसके वैश्विक प्रसार की आवश्यकता बताई।

श्री नारायण कुमार (मानद निदेशक, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद) ने विदेशी विद्वानों के योगदान और परिवार में भारतीय भाषाओं के प्रयोग पर जोर दिया।

विनोद कुमार मिश्र (पूर्व महासचिव, विश्व हिन्दी सचिवालय ) ने हिंदी को कूटनीति और जनजीवन की प्रभावी भाषा बनाने की आवश्यकता व्यक्त की, जबकि प्रो. हरमन वर्नर वेसलर ने विदेशी विद्यार्थियों के लिए हिंदी शिक्षण हेतु विशेष प्रशिक्षण और संस्थागत योजनाओं की जरूरत बताई।

श्री अनिल शर्मा जोशी (अध्यक्ष, वैश्विक हिन्दी परिवार) ने कहा कि हिंदी को नई पीढ़ी के लिए आकर्षक, उपयोगी और अवसरों से जुड़ी भाषा बनाना आवश्यक है। उन्होंने हिंदी के साथ सभी भारतीय भाषाओं के समन्वित वैश्विक विकास पर बल दिया। उनके अनुसार, भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान, संस्कृति और सभ्यता का आधार है। उन्होंने हिंदी शिक्षण में तकनीक, अनुवाद, आधुनिक ज्ञान और रोजगारपरक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता बताई।

अमेरिका से अनूप भार्गव ने कहा कि वहाँ हिंदी सीखने का प्रमुख आधार भारतीय संस्कृति और परंपरा से जुड़ाव है। रेखा राजवंशी (साहित्यकार) ने ऑस्ट्रेलिया में सामुदायिक विद्यालयों, मुख्यधारा के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में हिंदी शिक्षण की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए हिंदी को भारतीय पहचान का आधार बताया। सिंगापुर से संध्या सिंह ने हिंदी के विद्यालयी शिक्षण, पुस्तकों के प्रकाशन और नई पीढ़ी में भाषा के वास्तविक प्रयोग से जुड़ी चुनौतियों को रेखांकित किया।

कार्यक्रम के अंत में शिखा जी, थाईलैंड ने औपचारिक आभार व्यक्त किया। वक्ताओं ने सामूहिक रूप से कहा कि हिंदी के वैश्वीकरण के लिए सांस्कृतिक भावना के साथ-साथ आधुनिक ज्ञान, तकनीक, अनुवाद, रोजगार, युवाओं की भागीदारी और भारतीय भाषाओं के समन्वित विकास पर ध्यान देना आवश्यक है। कार्यक्रम का समापन “जय हिंदी, जय भारत” के उद्घोष के साथ हुआ।

रिपोर्ट : अजय शर्मा

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