वैश्विक हिन्दी परिवार का “गांधी, भारत की स्वतंत्रता और हिंदी भाषा” पर संगोष्ठी
०४ अक्टूबर, २०२६ । केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन-यूके तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार के साप्ताहिक कार्यक्रम के अंतर्गत ‘गांधी, भारत की स्वतंत्रता और हिंदी भाषा’ विषय पर ऑनलाइन संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी में गांधी जी के स्वतंत्रता आंदोलन, स्वराज, भारतीय भाषाओं और हिंदी संबंधी विचारों पर विद्वानों ने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का स्वागत लेखिका स्वरांगी साने ने किया। कार्यक्रम की प्रस्तावना करते हुए वैश्विक हिंदी परिवार, दिल्ली इकाई के अध्यक्ष श्री ऋषि कुमार शर्मा ने कहा कि वैश्विक हिंदी परिवार 70 देशों में हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार एवं संवर्धन के लिए कार्य कर रहा है। हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना, संवेदना और अस्मिता की अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि गांधी जी के लिए हिंदी राष्ट्रीय एकता, जनजागरण और स्वाधीनता की चेतना को जन-जन तक पहुँचाने का माध्यम थी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह विमर्श गांधी जी के भाषा संबंधी विचारों को समझने और हिंदी के भविष्य के लिए नई दिशाएँ एवं संकल्प देने में सहायक होगा। उन्होंने अपने नगर पिलखुवा की खादी परंपरा का उल्लेख करते हुए गांधी विचारों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. रविंद्र कुमार, सुप्रसिद्ध इतिहासकार एवं पूर्ण कार्यकारी कुलपति, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ने गांधी जी के ‘अभय’ और कर्मप्रधान दर्शन पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गांधी जी का अभय केवल स्वयं निर्भय होने तक सीमित नहीं था, बल्कि ऐसा ज्ञान और आचरण विकसित करना भी था जिससे दूसरा व्यक्ति भयभीत न हो। उन्होंने ‘जात-मेहनत’ (Bread Labor) को आत्मनिर्भरता, सामाजिक समानता और सच्ची स्वतंत्रता का आधार बताया।
सुप्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक श्री भगवान सिंह ने कहा कि गांधी जयंती को केवल रस्म अदायगी तक सीमित न रखकर गांधी जी के सादा जीवन, श्रम और पर्यावरण संरक्षण जैसे मूल्यों को व्यवहार में उतारना आवश्यक है। उन्होंने अपनी भाषा के प्रति घटते स्वाभिमान और अंग्रेजी पर बढ़ती निर्भरता को मानसिक गुलामी का एक रूप बताया। उन्होंने उपभोक्तावाद और प्रकृति के बढ़ते दोहन के दौर में गांधी जी की जीवन-पद्धति को टिकाऊ समाधान बताया।
प्रो. जीतन श्रीवास्तव, कवि, आलोचक एवं कुलसचिव, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ने कहा कि गांधी जी का विरोध अंग्रेजी भाषा से नहीं, बल्कि शासन और शिक्षा में उसके वर्चस्व तथा औपनिवेशिक प्रभाव से था। उन्होंने हिंदी को मराठी, गुजराती, बंगाली, तमिल आदि भारतीय भाषाओं का प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि उनकी सहोदर और संपर्क सूत्र के रूप में देखा। उन्होंने कहा कि नए भारत के ऐतिहासिक और मानवीय संदर्भों को समझने के लिए गांधी जी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष श्री अनिल जोशी ने कहा कि हिंदी को जन-जन तक पहुँचाने और स्वतंत्रता आंदोलन को राष्ट्रव्यापी स्वरूप देने में महात्मा गांधी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। गांधी जी ने हिंदी की शक्ति को पहचानते हुए इसे देश की एकता और जनसंचार का माध्यम बनाया। उनकी भाषा-दृष्टि सरल, सहज और सभी भारतीय भाषाओं से ग्रहण करने वाली थी। उन्होंने कहा कि आज भी गांधी जी के विचारों को समझते हुए हिंदी और भारतीय भाषाओं को केंद्र में रखना आवश्यक है तथा विकसित भारत की संकल्पना में भारतीय भाषाओं को केंद्रीय स्थान देना होगा।
अधिवक्ता एवं गांधीवादी विचारक, इंदौर श्री अनिल त्रिवेदी ने कहा कि महात्मा गांधी सत्यनिष्ठ जीवन और सहज मानवीय संवाद के प्रतीक थे। उन्होंने हिंदी को भारत की लोकभाषा मानते हुए जन-जन से उनकी अपनी भाषा में संवाद करने पर बल दिया। दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार के गांधी जी के प्रयासों और हिंदी सेवकों की प्रतिबद्धता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी को पूरे देश की संवाद भाषा बनाने का अभियान अभी अधूरा है। नई पीढ़ी में हिंदी के प्रति आत्मविश्वास जगाना सभी की जिम्मेदारी है।
डॉ. मुन्नालाल गुप्ता, सहायक प्रोफेसर, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ने कहा कि गांधी जी ने हिंदी को राष्ट्रीय एकता, जनसंवाद और स्वराज का सशक्त माध्यम माना। ‘हिंद स्वराज’ में उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा को गुलामी का आधार बताते हुए मातृभाषा और भारतीय भाषाओं के महत्व पर बल दिया। दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत तक उन्होंने हिंदी को विभिन्न भाषा-भाषी लोगों को जोड़ने वाली संपर्क भाषा के रूप में विकसित करने का प्रयास किया। उन्होंने देवनागरी के प्रचार के साथ प्रांतीय भाषाओं के संरक्षण की भी वकालत की।
डॉ. राजीव रंजन गिरी, गांधीवादी चिंतक, दिल्ली विश्वविद्यालय ने कहा कि गांधी जी की भाषा-कल्पना उनकी स्वतंत्रता और स्वराज की व्यापक दृष्टि से जुड़ी थी। राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ मानसिक और भाषाई स्वराज भी आवश्यक है। उन्होंने हिंदी को विभिन्न भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली संपर्क भाषा के रूप में देखा और हिंदी-उर्दू के सहज शब्दों से बनी हिंदुस्तानी की कल्पना की। उनके लिए भाषा का प्रश्न एक समावेशी और स्वतंत्र भारत के निर्माण से जुड़ा हुआ था।
प्रीति साहू, शोधार्थी, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर ने कहा कि वास्तविक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब शासन और प्रशासन का कामकाज आम नागरिक की अपनी भाषा में हो। विदेशी भाषा सत्ता और जनता के बीच दूरी पैदा करती है, जिसे जनभाषा के माध्यम से समाप्त किया जा सकता है।
कोमल पाईगुड़े, शोधार्थी, एसएनडीटी विश्वविद्यालय, पुणे ने स्वराज और स्वभाषा के संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि जब तक नागरिक अपनी भाषा का सम्मान नहीं करेंगे, तब तक स्वदेशी और स्वराज की संकल्पना अधूरी रहेगी। उन्होंने हिंदी को आधुनिक ज्ञान, विज्ञान और उच्च अध्ययन की सक्षम भाषा बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
शोधार्थी शिवम त्रिपाठी, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ ने कहा कि गांधी जी हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के प्रबल समर्थक थे। वे हिंदी को सरल, सहज और जनसामान्य के व्यवहार की भाषा बनाकर पूरे देश को जोड़ने के पक्षधर थे। उन्होंने गांधी जी के न्यासिता सिद्धांत और अहिंसा पर आधारित आदर्श समाज की संकल्पना का भी उल्लेख किया।
कार्यक्रम का प्रभावी संचालन श्री वरुण कुमार पूर्व निदेशक, रेल मंत्रालय भारत सरकार ने किया
कार्यक्रम के अंत में दीपा दिनेशनील ने धन्यवाद ज्ञापित किया। संगोष्ठी में देश-विदेश से जुड़े साहित्यकारों, हिंदी सेवियों, शोधार्थियों एवं हिंदी प्रेमियों ने सहभागिता की।
रिपोर्ट : अजय शर्मा

