भाषा, श्रम और अभय: गांधी के भाषाई स्वराज की मानवीय पड़ताल : विजय नगरकर

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यह कार्यक्रम महात्मा गांधी, भारत की स्वतंत्रता और हिंदी भाषा के परस्पर संबंधों पर केंद्रित एक विचारोत्तेजक आभासी संगोष्ठी थी।

  1. प्रोफेसर जीतन श्रीवास्तव
    गांधीजी का विरोध अंग्रेजी भाषा से व्यक्तिगत रूप से नहीं था, बल्कि वे शासन और शिक्षा में उसके ‘वर्चस्व’ और औपनिवेशिक प्रभाव के खिलाफ थे।
    सह-अस्तित्व की भावना के संदर्भ में उन्होंने हिंदी को अन्य प्रांतीय भाषाओं (मराठी, गुजराती, बंगाली, तमिल आदि) के प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं, बल्कि ‘सहोदर’ (बहन) और संपर्क सूत्र के रूप में प्रस्तुत किया।
    शाश्वत प्रासंगिकता और समय बदलने के बावजूद, जब भी नए भारत के ऐतिहासिक व मानवीय संदर्भों की तलाश होगी, उसकी शुरुआत गांधीजी के विचारों से ही करनी होगी।
  2. श्री भगवान सिंह

आचरण बनाम रस्म अदायगी, केवल गांधी जयंती मनाने के बजाय गांधीजी के बुनियादी आचरण—सादा जीवन, पर्यावरण संरक्षण और श्रम की महत्ता—को जीवन में उतारना आवश्यक है।
घटता भाषाई स्वाभिमान के बारे में आधुनिक दौर में अपनी भाषा के प्रति सम्मान कम होने और अंग्रेजी पर अत्यधिक निर्भरता को उन्होंने एक तरह की मानसिक गुलामी बताया।
उपभोक्तावाद पर चिंता व्यक्त करते हुए आज के बढ़ते लोभ और प्रकृति के दोहन के दौर में गांधीजी की जीवन-पद्धति ही टिकाऊ समाधान दे सकती है।

  1. प्रीति साहू

प्रशासन और जन-भाषा, वास्तविक स्वतंत्रता तभी सार्थक हो सकती है जब शासन और प्रशासन का सारा कामकाज आम नागरिक की अपनी भाषा में हो।
दूरी का खात्मा, विदेशी भाषा सत्ता और जनता के बीच खाई बनाती है, जिसे केवल जन-भाषा के माध्यम से ही पाटा जा सकता है।

  1. कोमल पाईगुड़े

स्वराज और स्वभाषा के संदर्भ में जब तक नागरिक अपनी भाषा का सम्मान नहीं करेंगे, तब तक स्वदेशी और स्वराज की संकल्पना अधूरी रहेगी।
उन्होंने बल दिया कि हिंदी को केवल भावनात्मक प्रचार तक सीमित न रखकर उसे आधुनिक ज्ञान, विज्ञान और उच्च अध्ययन की सक्षम भाषा बनाना वर्तमान पीढ़ी का दायित्व है।

  1. प्रोफेसर रविंद्र कुमार (अध्यक्षीय उद्बोधन)

द्विपक्षीय अभय , गांधीजी का ‘अभय’ केवल स्वयं निर्भय होने तक सीमित नहीं था; इसका दूसरा पहलू यह था कि हमारे ज्ञान, सत्ता या आचरण से कोई दूसरा व्यक्ति भयभीत न हो। ज्ञान ऐसा हो जो आतंकित करने के बजाय आत्मीयता से जोड़े।
सक्रियतावादी दार्शनिकता , गांधीजी केवल वैचारिक सिद्धांतों की सुसंगति में नहीं उलझे, बल्कि उन्होंने दर्शन को सीधे ‘कर्म’ और व्यावहारिक जीवन से जोड़ा।
जात-मेहनत (Bread Labor) , अपनी आजीविका और रोटी के लिए शारीरिक श्रम करने को उन्होंने आत्मनिर्भरता, सामाजिक समानता और सच्ची स्वतंत्रता का मूल मंत्र माना।

  1. दीपा दिनेश नील (संयोजन एवं आभार)
    संगोष्ठी के निष्कर्षों को रेखांकित करते हुए सभी वक्ताओं, आयोजकों और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया तथा इस विमर्श को गांधीवादी मूल्यों और भाषाई विमर्श के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक व प्रेरणादायी बताया।

किसी भी समाज में भाषा केवल बातचीत का जरिया नहीं होती; वह मनुष्य के सोचने, उसके श्रम और उसके स्वाभिमान का आईना होती है। जब कोई विदेशी सत्ता किसी मुल्क पर काबिज होती है, तो वह सबसे पहले उस समाज की भाषा और ज्ञान-परंपरा पर चोट करती है। वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा हाल ही में आयोजित आभासी संगोष्ठी इसी बुनियादी मानवीय सवाल को केंद्र में रखकर आगे बढ़ी—स्वतंत्रता, मनुष्यता और महात्मा गांधी का भाषाई नजरिया।
गांधीजी को महापुरुष बनाकर उनकी मूर्ति पर फूल चढ़ाना बहुत आसान है, मगर उनके विचारों को तर्क और रोजमर्रा की जिंदगी की कसौटी पर कसना कहीं अधिक जरूरी है। संगोष्ठी का मुख्य सुर यही था कि गांधीजी के लिए हिंदी या हिंदुस्तानी किसी बंद चौखट का नाम नहीं थी, बल्कि वह आम आदमी तक स्वराज की सांस पहुंचाने वाला एक जीता-जागता औजार थी।

भाषा औजार है, वर्चस्व का प्रतीक नहीं
संगोष्ठी में बोलते हुए प्रोफेसर जीतन श्रीवास्तव ने एक बुनियादी बात रेखांकित की। उन्होंने स्पष्ट किया कि गांधीजी का विरोध अंग्रेजी से नहीं था, बल्कि उस भाषिक साम्राज्यवाद और वर्चस्व से था जो शासक और शासित के बीच खाई पैदा करता है। जब ज्ञान और राजकाज की भाषा आम जनता की समझ से बाहर हो जाती है, तो समाज का एक बड़ा हिस्सा स्वाभाविक रूप से हाशिए पर चला जाता है। प्रीति साहू ने इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि वास्तविक आजादी वही है, जहां शासन और प्रशासन की भाषा देश के अंतिम आदमी की भाषा हो।

गांधीजी ने जब हिंदी (हिंदुस्तानी) की पैरवी की, तो उनका मकसद किसी अन्य प्रांतीय भाषा को दबाना नहीं था। वे हिंदी को तमिल, बंगाली, मराठी या गुजराती के मुकाबले नहीं, बल्कि उनके साथ एक ‘बहन’ की तरह देखते थे। वे जानते थे कि उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक बिखरे भारत को यदि एक सूत्र में बंधना है, तो उसे एक ऐसी सहज भाषा चाहिए जो दफ्तरों के भारी-भरकम शब्दों से मुक्त हो और जिसे खेत-खलिहान में काम करने वाला मजदूर भी अपनी मान सके।

ज्ञान जो डराए नहीं: गांधी का ‘द्विपक्षीय अभय’

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रोफेसर रविंद्र कुमार ने गांधीजी के तात्विक दर्शन को जिस मानवीय और वैज्ञानिक दृष्टि से प्रस्तुत किया, वह आज के दौर के लिए बेहद प्रासंगिक है। उन्होंने गांधी के दर्शन के तीन मूल आधार बताए—अभय, कर्मठता और श्रम।
विशेष रूप से उनका ‘द्विपक्षीय अभय’ का विश्लेषण विचारणीय है। गांधी का अभय केवल इतना नहीं था कि हम किसी सत्ता या ताकतवर से न डरें; इसका दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण पहलू यह था कि हमारे ज्ञान, हमारी सत्ता या हमारे व्यवहार से कोई दूसरा भयभीत न हो।
आज स्थिति इसके ठीक उलट दिखती है। ज्ञान को अक्सर ऐसी दुरूह और आभिजात्य भाषा में लपेट दिया जाता है कि साधारण इंसान खुद को हीन समझने लगता है। प्रोफेसर कुमार के अनुसार, ज्ञान का काम श्रोता या पाठक को आतंकित करना नहीं, बल्कि उसके साथ आत्मीय और बराबरी का रिश्ता बनाना है। जब भाषा दंभ से मुक्त होती है, तभी वह ज्ञान का सच्चा माध्यम बनती है।
जात-मेहनत और खाली रस्मों से मुक्ति
संगोष्ठी में श्री भगवान सिंह का स्वर आत्ममंथन का था। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि आज हम गांधीजी की जयंतियां मनाने में तो आगे हैं, लेकिन उनके बुनियादी मूल्यों—सादा जीवन, श्रम का आदर और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता—से दूर भाग रहे हैं।

उन्होंने चिंता जताई कि अपनी भाषा के प्रति हमारा स्वाभिमान लगातार कमजोर हुआ है और हम एक नए तरह के मानसिक परावलंबन के शिकार हो रहे हैं।
गांधीजी का मानना था कि हर इंसान को अपनी रोटी के लिए शारीरिक श्रम (जात-मेहनत) करना चाहिए। जब तक ज्ञान और भाषा का संबंध मनुष्य के पसीने और उत्पादक श्रम से नहीं जुड़ेगा, तब तक समाज में बराबरी नहीं आ सकती। कोमल पाईगुड़े ने इसी संदर्भ में याद दिलाया कि स्वदेशी और स्वराज केवल राजनीतिक नारे नहीं थे; जब तक हम अपनी भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान और आधुनिक शोध की भाषा नहीं बनाएंगे, तब तक स्वराज अधूरा ही रहेगा।
सह-अस्तित्व ही भविष्य की राह है।

कार्यक्रम के अंत में दीपा दिनेश नील ने सभी वक्ताओं और श्रोताओं का आभार व्यक्त करते हुए चर्चा के निष्कर्षों को समेटा।

इस पूरी संगोष्ठी का मानवीय सार यही निकलता है कि भाषा का चुनाव किसी कट्टरता का विषय नहीं है। गांधीजी हिंदुस्तानी की बात इसलिए करते थे ताकि हिंदू-मुस्लिम या किसी भी भाषाई समूह के बीच अलगाव न पनपे। वह भाषा सरल थी, जिसमें संस्कृत के भारी पांडित्य और फारसी की दुरूहता की जगह जनता की बोलचाल का खुलापन था।

आज जब दुनिया तकनीक और आभासी मंचों से सिमट रही है, तब भाषा का सवाल सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं रह गया है। यह आम आदमी की गरिमा, विज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने और सत्ता को लोकतांत्रित बनाने का सवाल है। गांधी को याद करने का सच्चा अर्थ यही है कि हम भाषा को सत्ता का डंडा बनाने के बजाय, संवाद और आत्मीयता का सेतु बनाएं।

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