हिंदी पखवाड़ा एवं साहित्यकार सम्मान समारोह संपन्न

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वैश्विक हिंदी परिवार एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के संयुक्त तत्त्वावधान में हिंदी पखवाड़ा एवं साहित्यकार सम्मान समारोह का आयोजन 1 अक्टूबर 2026 को प्रवासी भवन, नई दिल्ली में गरिमापूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में हिंदी भाषा, भारतीय भाषाओं, साहित्य, भारतीयता तथा प्रवासी समाज के बीच हिंदी की भूमिका और उसके वैश्विक विस्तार पर सार्थक विमर्श हुआ।


स्वागत उद्बोधन श्री विनयशील चतुर्वेदी, मानद निदेशक, वैश्विक हिंदी परिवार ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का आरंभ उपस्थित अतिथियों का अंगवस्त्र पहनाकर एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर स्वागत करते हुए किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. हितेंद्र मिश्रा, निदेशक, केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने भारत की प्राचीनता, सांस्कृतिक विरासत और भारतीयता की विशिष्टता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत को समझने के लिए भारतीयता को समझना आवश्यक है और इसी प्रकार किसी भाषा को सही अर्थों में समझने के लिए उसे भीतर से जानना आवश्यक है। उन्होंने भाषा के सांस्कृतिक एवं सामाजिक पक्ष को समझने तथा हिंदी के व्यापक स्वरूप को आत्मसात करने की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री दिव्यराज अमिय, शिक्षाविद्, जर्मनी ने हिंदी की वर्तमान स्थिति, उसके महत्व तथा साहित्य की भूमिका पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने यूरोप विशेषकर जर्मनी में हिंदी को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक एवं भाषायी विविधता को उसकी महत्वपूर्ण विशेषता बताते हुए कहा कि हिंदी के वैश्विक विस्तार के मार्ग में आने वाली चुनौतियों का सामना धैर्य, निरंतर प्रयास और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ किया जा सकता है।

श्री नारायण कुमार, मानद निदेशक, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद ने अपने सान्निध्य वक्तव्य में इंडोलॉजी और भारतीय डायस्पोरा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने भारतीय संस्कृति और सभ्यता के वैश्विक प्रभाव तथा भारत की विशिष्ट पहचान को रेखांकित किया। उन्होंने भारतीय भाषाओं को भारत की सांस्कृतिक शक्ति बताते हुए उनके संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम के स्वागताध्यक्ष श्री श्याम परांडे, महासचिव, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद ने अपने संबोधन में भारतीय डायस्पोरा की भूमिका और उसके महत्व को स्पष्ट किया। उन्होंने विश्वभर में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न संस्थाओं एवं हिंदीप्रेमियों की सहभागिता की सराहना की तथा हिंदी और भारतीय संस्कृति के हित में निरंतर कार्य करने का आह्वान किया।

समारोह में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सुश्री सविता चड्ढा, वरिष्ठ लेखिका एवं साहित्यकार; सुश्री इंदिरा मोहन, वरिष्ठ साहित्यकार एवं लेखिका; प्रो. पूरन चंद्र टंडन, वरिष्ठ शिक्षाविद् एवं साहित्यकार; तथा श्री विमलेश कांति वर्मा, शिक्षाविद् एवं साहित्यकार को अंगवस्त्र, स्मृति-चिह्न एवं सम्मान-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।
सम्मानित साहित्यकारों ने अपने साहित्यिक जीवन, लेखन-अनुभव और हिंदी साहित्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से संबंधित विचार साझा किए। उन्होंने साहित्य की वर्तमान भूमिका, बदलते सामाजिक परिवेश और नई पीढ़ी तक साहित्य को पहुँचाने की आवश्यकता पर भी अपने विचार रखे।

कार्यक्रम के विमर्श सत्र में विभिन्न वक्ताओं ने भारतीयता, हिंदी, साहित्य और वैश्विक संदर्भ में भारतीय संस्कृति के विविध पक्षों पर विचार व्यक्त किए।
डॉ. वरुण कुमार, पूर्व निदेशक, रेल मंत्रालय, भारत सरकार ने भारतीय संस्कृति की मूल भावना ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ को केंद्र में रखते हुए भारतीयता की व्यापक अवधारणा को स्पष्ट किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति की समावेशी दृष्टि और विश्वबंधुत्व की भावना पर प्रकाश डाला।
श्री शिव कुमार निगम, संयुक्त निदेशक ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों एवं सम्मानित साहित्यकारों के योगदान की सराहना की। उन्होंने उनके साहित्यिक एवं सामाजिक कार्यों की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए हिंदी और साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान की प्रशंसा की।
श्री मनोज अनाम, सह-संपादक, साहित्य सप्तक ने अपने वक्तव्य में मुख्य अतिथि श्री दिव्यराज अमिय के विचारों को आगे बढ़ाते हुए आधुनिक समय में बढ़ते अकेलेपन, बदलते सामाजिक संबंधों तथा साहित्य की मानवीय भूमिका जैसे विषयों पर अपने विचार रखे। उन्होंने साहित्य को संवेदना, संवाद और मानवीय जुड़ाव का प्रभावी माध्यम बताया।

कार्यक्रम का प्रभावी संचालन श्री ऋषि कुमार शर्मा, अध्यक्ष, वैश्विक हिंदी परिवार, दिल्ली इकाई ने किया।

कार्यक्रम के अंत में श्री अनिल जोशी, अध्यक्ष, वैश्विक हिंदी परिवार ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों, वक्ताओं एवं उपस्थित हिंदीप्रेमियों के प्रति औपचारिक आभार व्यक्त किया। उन्होंने अपने संबोधन में हिंदी के वैश्विक प्रसार, भारतीय भाषाओं के संरक्षण तथा साहित्य और संस्कृति के माध्यम से विश्वभर में भारतीयता की भावना को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया।

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