प्रवासी साहित्य की दशा व दिशा (रिपोर्ट)

इस सत्र की अध्यक्षता श्री अनिल जोशी  अध्यक्ष वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा की गई। अनिल जोशी जी ने प्रवासी साहित्य को ग्लोबल विंडो टू इंडिया बताया। उनका केंद्र बिंदु यह रहा कि प्रवासी साहित्य मुख्यधारा का हिस्सा है और इसे अलग-थलग भाव से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने प्रवासी साहित्य की दशा व दिशा पर जोर दिया कि आज यह साहित्य विश्वविद्यालयों में पढ़ा जा रहा है, शोध का विषय बन रहा है और विश्व दृष्टि प्रदान कर रहा है। जोशी जी की सोच में प्रवासी साहित्य सिर्फ ‘देश की याद’ नहीं, बल्कि वैश्विक अनुभव, नई संवेदनाएं एवं बहुसंस्कृतियों का संवाद प्रस्तुत करता है। उनके अनुसार प्रवासी साहित्य भारत की भाषा, संस्कृति और साहित्यिक पहचान को विश्व स्तर पर विस्तृत रूप से प्रस्तुत करता है और हिंदी परिवार को एक आत्मीय वैश्विक समुदाय बनाता है। उन्होंने यह भी कहा कि तकनीकी परिवर्तन, इंटरनेट पत्रिकाओं और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों से प्रवासी साहित्य को नई पहचान मिली है। वह यह ध्यान दिलाते हैं कि अब सिर्फ ब्रिटेन-अमेरिका तक सीमित नहीं, बल्कि अन्य देशों- ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व सिंगापुर आदि में हिंदी प्रवासी लेखन का विस्तार हुआ है। इसके माध्यम से वह साहित्य की दिशा, अर्थात् कई-पीढ़ियों के अनुभव, प्रवास की राजनीति, भाषा-अभिव्यक्ति और पहचान संघर्ष की आगामी चुनौतियों पर भी प्रकाश डालते हैं। पर्यावरण से  जोड़ते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्व  बदलते परिवेश में प्रवासी साहित्य द्वारा ही संभव है, कहते हैं।

मुख्य अतिथि प्रो. विमलेश कांत वर्मा ने ‘प्रवासी साहित्य’ और ‘प्रवासी शब्द’ के प्रयोग पर गंभीर प्रश्न उठाए। उनके अनुसार प्रवासी का अर्थ केवल स्थान परिवर्तन नहीं हो सकता; यदि ऐसा होता, तो हर व्यक्ति प्रवासी हो जाता – जैसे बहू, जो एक स्थान से दूसरे स्थान जाती है। वर्मा जी ने यह स्पष्ट किया कि प्रवासी साहित्य की पहचान विशिष्ट भाषा-संस्कृति के मेल से होती है, और इसे भारतीय हिंदी के अकेले मानकों पर नहीं मापा जा सकता। उन्होंने फिजी-हिंदी, सरनामी-हिंदी व दक्षिण अफ्रीकी हिंदी जैसी विदेशी हिंदी शैलियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन्हें मूलधारा के भारतीय हिंदी मानकों से अलग आंकना अनुचित है। वर्मा ने चेताया कि आत्म-प्रचार और व्यक्तिगत शोध-प्रबंध साहित्य को स्थायित्व नहीं देते और विश्वविद्यालयों में चयन प्रक्रिया पर भी विवेचना की आवश्यकता जताई। उनका मानना था कि साहित्य का मूल्य समय तय करता है, कम से कम 100-150 वर्षों बाद इसका सही आकलन हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रवासी साहित्य को व्यापक ‘विदेश में रचा गया साहित्य’ के अंतर्गत रखा जाना चाहिए जिसमें प्रवासी मन, अनुभव और भाषा की प्रामाणिकता हो। वर्मा जी की दृष्टि में प्रवासी साहित्य केवल स्थान परिवर्तन का प्रतिबिंब नहीं, बल्कि भाषाई विविधता, पहचान और वैश्विक संवाद का साहित्य है – जिसमें भारतीय मूल और वैश्विक संदर्भ एक साथ चलते हैं।

बीज वक्तव्य में डॉ. धनंजय कुमार ने कहा कि प्रवासी साहित्य का संकीर्ण नामकरण ठीक नहीं-उनका विचार था कि अच्छा साहित्य बस ‘अच्छा साहित्य’ होता है, चाहे वह कहीं भी रचा गया हो। उन्होंने प्रवासी साहित्य को भाषा विज्ञान, वैश्विक संदर्भ और भारतीय ज्ञान-परंपरा के दृष्टिकोण से समझाया। धनंजय जी ने कहा कि हिंदी को वैश्विक मान्यता देते हुए भी हमें संस्कृत को हिंदी विमर्श से अलग नहीं करना चाहिए, क्योंकि संस्कृत भारतीय भाषाई परंपरा की ‘मां’ है और अत्यंत सटीक भाषा।  यह भी व्यक्त करते हैं दशा में विस्तार हुआ, दिशा में नहीं क्योंकि  कि आज समाज में हिंदी-हीनता और अंग्रेजी-उत्कृष्टता की सोच एक समस्या बन गई है-लोग अंग्रेजी बोलने को ही श्रेष्ठ मानते हैं और हिंदी को शर्मिंदगी से देखते हैं। उन्होंने यह चिंता जताई कि ज्ञान का अर्थ केवल सूचना नहीं, बल्कि ज्ञाता, ज्ञान और पद्धति का संतुलन होना चाहिए-जो भारतीय ज्ञान-परंपरा का मुख्य आधार रहा है। वह प्रवासी साहित्य को वैश्विक विस्तार, भाषा-स्वीकृति और भारतीय ज्ञान-परंपरा के एकीकरण के रूप में देखते हैं।

मुख्य वक्ता प्रो. सत्यकेतु सांकृत ने प्रवासी साहित्य की पृथकता को उसकी सबसे बड़ी शक्ति बताया। उनके अनुसार प्रवासी साहित्य जन्मस्थान पर नहीं, बल्कि अनुभूति की संवेदना पर आधारित होता है। सांकृत जी ने कहा कि प्रवासी साहित्य को किसी संकीर्ण चौखटे में बांधना उसे सीमित कर देता है। उन्होंने आलोचना के क्षेत्र में वैचारिक स्पष्टता, शोध-अनुशासन और आलोचनात्मक वृत्ति की आवश्यकता पर जोर दिया, क्योंकि रचनाकार ही आलोचक बन जाए तो विमर्श का दिग्भ्रम होता है। सांकृत ने यह बताया कि प्रवासी साहित्य में यह आवश्यक नहीं कि लेखक प्रवासी हो – कई ऐसे लेखक हैं जो विदेश नहीं गए पर उनकी रचनाओं में प्रवासी अनुभूति प्रकट होती है (जैसे प्रेमचंद, जैनेंद्र)। उन्होंने गिरमिटिया साहित्य और दूसरी पीढ़ियों के रचनाकारों के बीच ध्रुवीकरण को षड्यंत्र करार दिया। उनके विचार में प्रवासी साहित्य की पहचान अनुभूति, संवेदना और विश्व-दृष्टि में निहित है और इसे व्यापक शोध-आधारित दृष्टि से आंका जाना चाहिए।

विशिष्ट वक्ता डॉ. अर्चना पैन्युली ने प्रवासी साहित्य कोवैश्विक दृष्‍टि, पहचान संघर्ष, भाषा विस्तार, समकालीन, वैश्विक और बहुसांस्कृतिक दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत किया। जो न पूरी तरह देशज न पूरी तरह विदेशी। उन्होंने कहा कि प्रवासी जीवन अब केवल स्मृतियों का संग्रह नहीं, बल्कि नयाभाषा-संपर्क, पहचान संघर्ष, सांस्कृतिक टकराव, नस्लवाद, अकेलापन और सामंजस्य का साहित्य है। उनके अनुसार वैश्वीकरण, डिजिटल युग और प्रवास ने साहित्य को भारत की सीमाओं से हटकर एक वैश्विक दायरे में स्थापित किया है, जहां हिंदी अन्य भाषाओं (जैसे डेनिश, स्पेनिश आदि) के साथ संवाद कर रही है। पैन्युली जी ने यह बताया कि प्रवासी साहित्य नई भाषिक शैलियों, हाइब्रिड पहचान, सांस्कृतिक तुलनाओं और पूर्वाग्रहों के तोड़ को दर्शाता है, यह सिर्फ स्मृति-भाव से आगे बढ़कर पुनर्सर्जन का साहित्य बन चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रवासी साहित्य ने हिंदी को नई पहचान यानि नए वस्त्र  प्रदान किए हैं – भाषा अब लचीली, बहुभाषिक और वैश्विक दृष्टि से समावेशी हो रही है। इसके अलावा, उन्होंने प्रवासी साहित्य की समकालीनता पर जोर देते हुए कहा कि यह साहित्य आज के समय के वैश्वीकरण, डिजिटल परिवर्तन और सामाजिक आर्थिक संघर्ष का सजीव दस्तावेज है। पैन्युली ने चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला – जैसे उपन्यासों की कमी, आलोचना का अभाव, दूसरी-तीसरी पीढ़ी पर साहित्य की कमी आदि पर लेखन की आवश्यकता।

सुश्री रेखा राजवंशी ने अपने वक्तव्य में प्रवासी साहित्य कोप्रवासी जीवन की अनुभूति, पहचान और सांस्कृतिक विमर्श, और मन की संवेदना के रूप में प्रस्तुत किया। रेखा जी ने कहा प्रवासी साहित्य की शुरुआत में जो नॉस्टेल्जिया थी, वह अब अधिक व्यापक होती जा रही है – यह न केवल देश की याद है बल्कि सांस्कृतिक संघर्ष, बहुसांस्कृतिक अनुभव, पहचान का पुनर्निर्माण और विश्व साहित्य से संवाद भी बन चुका है। उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि प्रवासी साहित्य को प्रायः ‘दूसरे दर्जे’ का क्यों माना जाता है?, जबकि वही रचनाएँ अनुवाद में अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी पा रही हैं। इंटरनेट पत्रिकाओं, अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक मंचों, हिंदी फिल्मों और प्रवासी हिंदी शिक्षण कार्यक्रमों को उन्होंने प्रेरणास्त्रोत बताया। रेखा जी का जोर यह था कि प्रवासी साहित्य हिंदी की नई भाषा-धाराओं को जन्म दे रहा है, जिसमें स्थानीय बोली, अंतरराष्ट्रीय शब्द और संस्कृति-संतुलन की संवेदना शामिल है। उन्होंने गिरमिटिया इतिहास, फीजी व मॉरीशस आदि जगहों पर हुए प्रवासी अनुभवों का उल्लेख करते हुए प्रवासी साहित्य की ऐतिहासिक निरंतरता पर बल दिया।

सुश्री नूतन पांडे ने मुख्य रूप से संयोजन, मंच-प्रस्तुति और प्रवासी साहित्य विमर्श को सजग रूप से संयोजित करने की भूमिका निभाई। धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र समाप्ति की गई।

रिपोर्ट प्रस्तुति- डॉ. संध्या सिलावट

सत्र – प्रवासी साहित्य की दशा व दिशा

स्थान – दर्शनम्‌ – 1 सभागार – इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली

दिनांक -09 जनवरी,  2026

समय- 02:00 से 03:30 बजे तक

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