संघ की राजभाषा एवं देवनागरी लिपि: स्थिति एवं चुनौतियाँ (रिपोर्ट)

सत्र के अध्यक्ष श्री मनोज श्रीवास्तव, मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने विचार रखते हुए कहा कि हिंदी ने प्राचीन भारतीय सभ्यता से अपनी सांस्कृतिक निरन्तरता लिपि के रूप में देवनागरी चुनकर सुनिश्चित की है। देवनागरी लिपि हिंदी ध्वन्यात्मक संगति से भरपूर है और शिरोरेखा इस लिपि की शब्द सीमा को निर्धारित एवं मुखरित करती है। आजकल 13-24 वर्ष के 68% हिंदी यूजर्स व्हाट्सअप और इंस्टाग्राम में रोमन लिपि प्रयुक्त कर रहे हैं। मोबाइल, कंप्यूटर एवं तकनीकी के युग से चुनौतियाँ पैदा हो रही है परंतु देवनागरी में अंग्रेजी की तरह कैपिटलाइजेशन का महत्व नहीं है और ना ही अपर केस का और लिखित शब्द का उच्चारण वहीं है जो लिखा गया है। उन्होंने हिंदी भाषा एवं लिपि के विभिन्न देशों के उदाहरण के माध्यम से सार्थक तथ्य रखें।

बीज वक्तत्व देते हुए श्री वरुण कुमार, पूर्व निदेशक रेल मंत्रालय ने राजभाषा हिंदी के ऐतिहासिक परिदृश्य पर बोलते हुए कहा कि संविधान सभा द्वारा हिंदी राजभाषा के रूप में 15 वर्षों के लिए अधिकृत किया गया था । परंतु अब इस स्थिति से उबरने की जरूरत है । हिंदी राजभाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार्यता दिलाने में संवैधानिक संकल्प की जरूरत है । हिंदी ने जहाँ अन्य भाषाओं से शब्द उदारतापूर्वक अधिग्रहण किया है तो वहीं वह सभी भाषाओं की शब्ददात्री भी है। हिंदी अपने सहज और समावेशी स्वभाव के कारण जनभाषा के रूप में स्वीकृत हो रही है । लेकिन नई पीढ़ी हिंदी लिखने में उतनी सहज नहीं है।  सोशल मीडिया माध्यमों पर हिंदी को रोमन लिपि में लिखना पसंद करते है । यदि हम हिंदी का समुन्नत भविष्य चाहते है तो इस तथ्य को नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते है। राजभाषा हिंदी में देवनागरी लिपि स्वीकृत की गई। लेकिन देवनागरी अंकों की जगह देवनागरी अंकों के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को ग्रहण किया गया है। परिणामत: परंतु नई पीढ़ी इसे धीरे-धीरे लिखना भूल रही है। तकनीकी रूप से हिंदी के कुंजी पटल को अपनाने पर ज़ोर देना चाहिए । व्यवहार रूप में बोलने के लिए हिंदी और लिखने के लिए अंग्रेजी यह अनुप्रयोग हिंदी के लिए घातक है । हिंदी के विकास के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग अनिवार्य है । मातृभाषा में शिक्षा और शिक्षण को प्रोत्साहित करना होगा । हिंदीतर प्रदेशों में राजभाषा हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए मानकीकरण के साथ-साथ उसे सरलीकृत करने की आवश्यकता है। राजभाषा हिंदी के समक्ष अगर चुनौतियाँ है तो उसका समाधान भी प्रशासन और जनता दोनों को मिलकर करना होगा। विशिष्ट वक्ता के रूप में उपस्थित आईजीएनसीए के राजभाषा निदेशक श्री अजित कुमार ने कहा कि राजभाषा हिंदी के समक्ष चुनौतियाँ अनुप्रयोगात्मक रूप से है । जैसे हमारे सरकारी संस्थानों के सभी वेबसाइट पहले अंग्रेजी में खुलती है और बाद में हिंदी में जबकि हिंदी में पहले खुलनी चाहिए। अत: यदि विकल्प ही देना है तो पहला विकल्प अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी का होना चाहिए। हालांकि देश भर में कुछ संस्थान पहले विकल्प में हिंदी दूसरे में अंग्रेजी को रखते हैं। आवश्यकता है आज इसे समान रूप से लागू करें। हिंदी को विकल्पात्मक रूप से उभारने की आवश्यकता है। हिंदी को  सर्वमान्य रूप से लागू करें। राजभाषा हिंदी को सुगमता से प्रयोग करने के लिए प्रभावी हिंदी सॉफ्टवेयर को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। राजभाषा हिंदी केवल अनुवाद के लिए ही नहीं है अपितु वह भारत का मानस पटल भी है। हिंदी भाषा का एक सांस्कृतिक पक्ष भी है जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

विशिष्ट वक्ता के रूप में आकाशवाणी से जुड़े पूर्व सहायक निदेशक श्री अरुण कुमार पासवान ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि जिस तरह हिंदी की चुनौती अंग्रेजी है, वैसे ही भाषिक अनुप्रयोग के स्तर पर देवनागरी लिपि की चुनौती रोमन लिपि है। यह अभ्यास युवाओं को हिंदी भाषा के प्रति लापरवाह कर रही है। हिंदी राष्ट्र का गौरव है । इसे उन्हें समझाने और राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ने की आवश्यकता है। प्रशासनिक स्तर पर हम सभी को पहल करने की आवश्यकता है ।

नीदरलैण्ड से पधारे विशिष्ट अतिथि श्री रामा तक्षक ने कहा कि हिंदी को विदेशों में पैदा हुए दूसरी पीढ़ी तक सही मायने में पहुँचाने की आवश्यकता है। अन्यथा हिंदी में प्रवासी लेखन और साहित्य दोनों का अस्तित्व संकटग्रस्त हो जाएगा। विदेशों में हिन्दी शिक्षण देने आए भारतीय हिंदी शिक्षक उन्हें रोमन लिपि के स्थान पर देवनागरी लिपि सिखाए। हिंदी की सभी भारतीय भाषाएँ भारत से बाहर अपनी लिपि में ही सिखाई जाएं। लिपि के द्वारा भाषा का संवहन होता है और भाषा द्वारा भारतीयता की मूलभूत पहचान सुनिश्चित होती है। देवनागरी लिपि के दार्शनिक पक्ष पर बात नहीं होती। जबकि इस पर बात अवश्य होनी चाहिए। भारतीय दर्शन, ज्ञान, योग आयुर्वेद की हमारी समृद्ध परम्परा देवनागरी में ही है। भारतीय दर्शन और संस्कृति की कुंजिका देवनागरी लिपि है। अत: इसके महत्व को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते है। देवनागरी तथा अन्य भारतीय लिपियों का स्वाभिमान कैसे बचाये रखें- इस विषय पर हमारा ध्यान आकृष्ट होना चाहिए। विदेशों में रह रहे नयी पीढ़ी में मातृभाषा का व्यवहार धीरे-धीरे गायब हो रहा है। इसे बचाये रखने की दिशा में सकारात्मक पहल करना ही होगा।

विशिष्ट अतिथि श्री कुमार पाल शर्मा, संयुक्त निदेशक, राजभाषा विभाग ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी बोलने में सहज है इसीलिए हिंदीतर भाषी भी इसे समझते है। ये कहना कि देवनागरी लिपि लिखने में कठिन है एवं शिरोरेखा लगाने में समय लगता है तो ऐसा सोचने वालों के लिए हम कह सकते हैं कि लिपि का संकट मानसिक ज़्यादा और व्यवहारिक कम है। चीनी भाषा की लिपि देवनागरी लिपि की तुलना में ज़्यादा जटिल है, लेकिन चीनी भाषी तो ऐसा नहीं सोचते। फिर हिंदी वाले ऐसा क्यों सोचते हैं? हिंदी के विकास के लिए हमें तीन ‘क’ का आदर्श अपनाना होगा- कंठ, क़लम और कम्प्यूटर। हिंदी बोलने में सभी प्रदेशों के लिए सहज है। क़लम की बात करें तो हिंदी को रोमन लिपि में लिखना रोकना होगा। कम्प्यूटर की बात करें तो जिस प्रदेश में राजभाषा हिंदी है; वहाँ भी कम्प्यूटर के कीबोर्ड अंग्रेजी में ही होता है। कम से कम वहां हिन्दी वर्णमाला वाले कीबोर्ड तो होने ही चाहिए। इसका असर तकनीकी प्रयोगधर्मिता पर होता है। अत: हिंदी लिखना है तो अंग्रेजी का विकल्प क्यों देना? इसी तरह तीन ‘स’ समाज, शिक्षा, शासन को अपनाना होगा। इन तीनों के समन्वय से हिंदी की प्रयोजनीयता बढ़ेगी।

नागरी लिपि परिषद् के महामंत्री श्री हरि सिंह पाल ने विशिष्ट अतिथि के रूप में कहा कि आज के भूमंडलीकरण के युग में हिंदी और देवनागरी लिपि का भविष्य उज्ज्वल है। ऐसा हिंदी की वैश्विक स्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है। हिंदी और देवनागरी लिपि से जुड़ने का मतलब है – अपनी जड़ों से जुड़ना और अपनी संस्कृति से जुड़ना। हिंदी और देवनागरी लिपि के विकास व संवर्धन के लिए समुन्नत प्रयास करना हमारी इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है। हमें हिंदी की ताकत को पहचानना होगा। लोगों में हिंदी प्रयोगधर्मिता को लेकर प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं के साथ मिलकर आगे बढ़ाना है। नागरी लिपि परिषद ने हिंदीतर भाषी बच्चों से देवनागरी लिपि में लिखवाया है और उन्हे पुरस्कृत किया है। इसके उत्साहवर्धक नतीज़े हमें देखने को मिला।

सभी के व्यक्तव्य के पश्चात् नीदरलैंड से आए साहित्यकार एवं साझा संसार के अध्यक्ष डॉ रामा तक्षक की पुस्तक ‘साहित्य का विश्वरंग’ एवं त्रैमासिक पत्रिका ‘राठ रंग’ और नागरी लिपि परिषद् के प्रधान संपादक डॉ. हरिसिंह पाल की मुख पत्रिका ‘नागरी संगम’ एवं अखिल विश्व हिंदी समिति, न्यूयॉर्क की वैश्विक हिंदी त्रैमासिक पत्रिका ‘सौरभ’ का लोकार्पण किया गया।

इस सत्र का प्रारंभ राजभाषा विभाग के उपनिदेशक श्री रघुबीर शर्मा ने सभी अतिथि गणों के स्वागत से किया गया था। कार्यक्रम के संयोजक भारतीय लेखापरीक्षा और लेखाविभाग की सुश्री नर्मदा कुमारी, वरिष्ठ अनुवादक एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. राजेश गौतम के कुशल संयोजन से प्रभावशाली रूप से समय पर संपन्न हुआ।

रिपोर्टिंग – डॉ० पूनम सिंह

सत्र – संघ की राजभाषा एवं देवनागरी लिपि: स्थिति एवं चुनौतियाँ

स्थान – समवेत सभागार – इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली

सत्र दिनांक – 10 जनवरी, 2026 समय – 9:30 से11:30 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »