“पुष्पा सिन्हा के उपन्यास ‘जेल समाधि’ का गरिमामय विमोचन”

दिनांक 16.05.2026 को नई दिल्ली के आईटीओ क्षेत्र में स्थित हिन्दी भवन के सभागार में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा सम्मानित प्रकाशक सामयिक प्रकाशन के तत्वावधान में उन्हीं के द्वारा प्रकाशित वरिष्ठ साहित्यकार पुष्पा सिन्हा के नवीनतम उपन्यास “जेल समाधि” के लोकार्पण का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता का दायित्व वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सविता चडढा के सशक्त हाथों में रहा। मुख्य अतिथि की भूमिका का निर्वहन शिक्षाविद् एवं पत्रकार डॉ. वर्तिका नंदा ने किया। विशिष्ट अतिथियों की श्रेणी में वरिष्ठ साहित्यकार, समीक्षक एवं आलोचक डॉ. महेश दर्पण, हिन्दी अकादमी के पूर्व उपसचिव ऋषि कुमार शर्मा तथा प्रसिद्ध एवं बहुचर्चित लेखक विवेक मिश्र सहित वरिष्ठ साहित्यकार एवं लेखिका पुष्पा सिन्हा मंचासीन रहे। कार्यक्रम के संचालन का दायित्व डॉ. कविता सिंह ‘प्रभा’ समूह संस्था की अध्यक्षा एवं कवयित्री डॉ. कविता सिंह ‘प्रभा’ के सशक्त हाथों में रहा। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की प्रतिमा के सम्मुख मंचासीन गणमान्य विभूतियों के कर-कमलों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित करने के साथ-साथ डॉ. कविता सिंह ‘प्रभा’ के मुखारविंद से मां सरस्वती वंदना की सुमधुर प्रस्तुति के माध्यम से किया गया। तत्पश्चात्, सामयिक प्रकाशन के सर्वेसर्वा महेश भारद्वाज के कर-कमलों द्वारा सभी मंचासीन गणमान्य विभूतियों को क्रमबद्ध तरीके से अंगवस्त्र ओढ़ाकर एवं पुस्तकों का एक-एक सैट भेंट स्वरूप प्रदान करके सम्मानित किया गया। अगले चरण में, कार्यक्रम को गति प्रदान करते हुए संचालिका डॉ. कविता सिंह ‘प्रभा’ ने सभी मंचासीन गणमान्य विभूतियों को पुष्पा सिन्हा द्वारा रचित नवीनतम उपन्यास “जेल समाधि” के लोकार्पण हेतु आमंत्रित किया गया, जिसे उनके कर-कमलों द्वारा भव्य अंदाज में इस लोकार्पण समारोह को क्रियान्वित किया गया। तत्पश्चात्, संचालिका डॉ. कविता सिंह ‘प्रभा’ ने मुंशी प्रेमचंद एवं हजारी प्रसाद द्विवेदी इत्यादि सुप्रसिद्ध उपन्यास रचयिताओं की सृजनात्मक उत्कृष्ट उपलब्धियों को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से साहित्य सृजन की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए “जेल समाधि” उपन्यास की लेखिका पुष्पा सिन्हा को अपने आरंभिक उदबोधन के लिए आमंत्रित किया गया। पुष्पा सिन्हा ने अपने वक्तव्य में अवगत कराया कि वर्ष 2017 में इसकी पृष्ठभूमि तैयार की गई थी। यह उपन्यास दिनांक 16.12.2005 को अपराधियों द्वारा अंजाम दिए गए अत्यंत घिनोनें और दुर्दांत निर्भया बलात्कारी कांड के अभियुक्त की जिंदगी पर आधारित काल्पनिक आत्मकथा है। इसके सृजन में दो वर्ष लगे। इसमें 40,000 शब्द हैं, जिसमें 20,000 शब्द उसके अपराध से संबंध हैं और 20,000 उसके पश्चाताप के हैं। मेरे इस उपन्यास का कथानक इसके मुख्य अभियुक्त अभय के उपेक्षित जीवन की कहानी पर आधारित है। प्रो. डॉ. वर्तिका नन्दा ने उपन्यास के विशिष्ट बिंदुओं पर स्पष्टीकरण के साथ अपने उदबोधन का आरंभ करते हुए रेखांकित किया कि जेल एक जगह का नाम नहीं है। हम जहां है, वहीं जेल है। जेल जाने के बाद व्यक्ति के अंतर्मन में संन्यास का भाव जाग्रत होता है और उसमें बदलाव आना स्वाभाविक है। उन्होंने बारिकियों से सामाजिक परिप्रेक्ष्य में लाए जाने वाले बदलाव के प्रकरणों को रेखांकित किया कि कोरोना महामारी के दौरान से घरों के बंद कमरों में अपराधी पनप रहे हैं। अपराध की अंधी दुनिया में फंसाता समय ही है। झूठ का सहारा लेना भी अपराध का एक प्रतिरूप है। किसी भी पुस्तक के माध्यम से भले ही समाज में क्रांति नहीं लाई जा सकती है, लेकिन कुछ लौ तो जरूर जगाई जा सकती है। अपने डासना जेल के प्रवास का उदाहरण प्रस्तुत करके विस्तार देते हुए अपने तथ्यों को व्याख्यायित करके अपनी वाणी को विराम दिया। डॉ. महेश दर्पण ने हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की विविध कृतियों तथा बाणभट्ट की आत्मकथा जैसी पुस्तकों का स्मरण कराते हुए अवगत कराया कि यह उपन्यास एक ऐसी विशिष्ट सृजित कृति है, जो हमें परिवारों की स्थिति पर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पारित करने पर विवश कर देता है। रूस के बहुचर्चित उपन्यासकार दोस्तोवस्की को स्मरण करते हुए विषय को विस्तार तो दिया ही, साथ-ही-साथ गणेशशंकर विद्यार्थी की पुस्तक का जिक्र करते हुए भी इस उपन्यास की विषय-वस्तु पर ध्यानाकर्षण प्रस्तुत किया। उन्होंने पुनः स्मरण कराया कि जेल में खेती बाड़ी होती है, बागबानी होती है, आमों को पेड़ों से तोड़ कर इकट्ठा किया जाता है। पहले जेल में छत नहीं होती थी। जेल में रहने के बाद व्यक्ति में बदलाव अवश्य आता है। लेखिका पुष्पा सिन्हा ने काल्पनिक प्रकरण के माध्यम से इस सार्थक उपन्यास संरचना की है, जो आसान काम नहीं है। अपराध की कड़ियों को क्रमबद्ध तरीके से बांधते हुए वर्णित करना बहुत ही प्रशंसनीय कार्य किया है। किस दर्द के साथ लिखा है, यह प्रत्यक्षदर्शी है। समाज की बातों से कोई सरोकार नहीं है। इस लेखिका ने वह जिम्मेदारी उठाने का सफल प्रयास किया है। इन्होंने अपराधी के भीतरी मन में जागृत परिवर्तन को समाज के समक्ष प्रस्तुत करने का सफल प्रक्षेपण किया है। पराकाष्ठाओं के उदहरणों से डॉ. महेश दर्पण ने अवगत कराया कि विष्णु प्रभाकर ने अपना देहदान किया हुआ था, जबकि सभी लोग उनके अंतिम संस्कार की चिंताओं में संलग्न प्रतीत हो रहे थे। अंतिम संस्कार तो होना ही नहीं था। अपने राजीव गांधी अस्पताल भ्रमण के प्रकरण का उदाहरण देते हुए स्पष्टीकरण सहित अभिव्यक्त किया कि लेखिका ने अविवादित भाषा शैली के माध्यम से उपन्यास में सभी पक्षों को समाज के समक्ष प्रस्तुत किया है, इन्हीं शब्दों के साथ उन्होंने मंच पर अपना स्थान ग्रहण किया। ऋषि कुमार शर्मा ने अपने वक्तव्य में रेखांकित किया कि पुष्पा सिन्हा कितनी शिद्दत के साथ इस उपन्यास के लोकार्पण के लिए कब से प्रयासरत रही हैं। यह पुस्तक कांटों के बीच गुलाब है। सामयिक प्रकाशन ने बहुत-सी चर्चित लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित की हैं। चार वर्षों तक मैं विभिन्न जेलों के भ्रमण पर जाता रहा हूं। हर जेल में हिन्दी अकादमी का पुस्तकालय है, लेकिन तिहाड़ जेल में नहीं है। मैंने अपने समय में अथक प्रयासों के माध्यम से अधिक-से-अधिक पुस्तकें लगभग 20,000 मंडावली जेल में भिजवाई थी। हम जहां हैं, वहीं तो प्रयास करेंगे। लेखिका ने पात्र बदले हैं। अपराध जन्म लेते रहते हैं। रोटी चुराने से आरंभ होता है। माता-पिता बच्चों से मात्र सात मिनट ही बात करते हैं। बच्चों के हिन्दी का अध्यापक भी उनसे ज़्यादा बच्चों से बात करता है। नैतिकता की बातें बच्चों को पढ़ानी और बतानी चाहिए, यह वर्तमान समय की मांग है, जो समाज में बदलाव की बयार का पर्याय बन पाने में सक्षमता के साथ समर्थ होगी, ऐसा मेरा विश्वास है। इन्हीं शब्दों सहित अपनी वाणी को विराम देता हूं। विवेक मिश्र ने अपने वक्तव्य मे अपनी पुस्तकों के प्रकाशन से संबंधित जानकारियां साझा करते हुए अवगत कराया कि बहुत-सी घटनाएं समाज में घटित हो रही होती हैं। उससे संबंधित आम राय समाज के बीच अवश्य पहुंचनी चाहिए। यह उपन्यास ऐसे कार्यों को क्रियान्वित करने में सहायक सिद्ध हो सकता है, ऐसा मुझे स्वीकार्य है। साहित्य इसमें सहायक होता है। वह अपने आप से भाग नहीं सकते। उनका अंतर्मन उन्हें निरंतर धिक्कारता है। नेटफ्लिक्स पर प्रदर्शित किशोरावस्था पर आधारित वेब सीरीज ‘एडोलसेंट सीरीज’ का उदाहरण देते हुए अभिव्यक्त किया कि इसमें 10 से 19 वर्ष (टीनएजर्स) के बच्चों की उम्र के बदलाव, उनकी भावनाओं, समस्याओं और उनके जीवन से जुड़ी कहानियों को दिखाया जाता है। हर बच्चा अपराध के लिए तैयार हो रहा है। वह गैप देखकर परेशान हो रहा है, इसी के लिए यह मोबाइल उन्हें प्रतिपादित कर रहा है। कलकत्ता, हिमाचल प्रदेश इत्यादि में घटित अपराधों के प्रकरणों को उदृधत करते हुए बच्चों की मानसिकता को व्याख्यायित करके स्मरण कराया कि आइसोलेशन में रहने वालों की साईकी नहीं बदलती। वह एसिड और बलात्कार से कितनी बच्चियों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करता है, यही अपराध बोध है। स्वतंत्रता से वंचित करना सुधार लाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। अंतर्मन में सुधार का भाव भी तो होना चाहिए, तभी सुधार आएगा। कहा तो ओर भी बहुत कुछ जा सकता है, लेकिन समय सीमा को ध्यान में रखते हुए अपनी वाणी को यहीं विराम देता हूं। पुलिस अधिकारी ज्योति स्वरूप गौड़ ने अपने अतिसंक्षिप्त उदबोधन में स्पष्टता से उदृधत किया कि वह गत तीन वर्षों से तिहाड़ जेल में पदस्थ हैं। उन्होंने पुलिस विभाग में अपनी व्यक्तिगत जीवन से जुड़े प्रकरणों को सभागार के पटल पर रेखांकित करते हुए अवगत कराया कि इसके लिए माता-पिता को बच्चों पर बहुत अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। इससे अधिक कुछ ओर कहने की स्थिति में नहीं हूं। अपने अध्यक्षीय उदबोधन में डॉ. सविता चडढा ने अपने वक्तव्य में अवगत कराया कि मेरे पिता भी पुलिस में थे। हमारे पड़ोसी आए और मेरे पिताजी से बोले कि आप मेरे बच्चे को एक रात के लिए जेल में बंद कर दो। उन्होंने साफ मना कर दिया। बाद में वह फिर बड़ा होकर बहुत बड़ा हलवाई बना। मित्र वीना अरोड़ा के साथ की किस्सागोई से संबंधित तिहाड़ जेल के संस्मरणों को स्मरण करते हुए अपने वक्तव्य को विस्तार दिया। बैंक की ओर से जेलों में गीता के व्याख्यान देने का अवसर मिला था। इस उपन्यास का नायक अपने भीतर की आत्मग्लानि से भर गया और अंत में उसने अपनी आत्मकथा लिखने का प्रण लिया, यह इस उपन्यास की बहुत बड़ी उपलब्धि है। ऐसा लगता ही नहीं कि लेखिका ने इसमें कल्पना का सहारा लिया है। माता-पिता सही कर्मों का ज्ञान देते रहें, तो अपराधों से बचा जा सकता है। अंत में सुधरने के प्रकरण को उपन्यास से पढ़कर श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत करने के पश्चात् अपनी वाणी को विराम दिया। श्रोता-दीर्घा में विराजित हिन्दी साहित्य जगत के प्रमुख हस्ताक्षरों में हीरालाल नागर, पुनीता सिंह, अंजू क्वात्रा, शकुंतला मित्तल, वीणा अग्रवाल, पुलिस अधिकारी ज्योति स्वरुप गौड़ तथा आकाशवाणी दूरदर्शन कलाकार, सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी, अधिवक्ता एवं लेखक कुमार सुबोध रहे। अंतिम पड़ाव पर सामयिक प्रकाशक के मुखिया श्री महेश भारद्वाज द्वारा कार्यक्रम में देश-विदेश के विभिन्न शहरों एवं क्षेत्रों से पधारकर उपस्थित रहे सभी प्रबुद्धजनों विद्वतजनों एवं आगंतुकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए धन्यवाद और आभार ज्ञापित करने के साथ यह भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ।

रिपोर्ट :— कुमार सुबोध

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