“जर्मनी में भारतीय समाज, हिंदी भाषा, साहित्य एवं शिक्षण पर वैश्विक संगोष्ठी संपन्न”

दिनांक 05 जुलाई 2026, को विश्व हिंदी सचिवालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार की एक महत्वपूर्ण ऑनलाइन संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया संगोष्ठी का विषय था—”जर्मनी में भारतीय समाज : हिंदी भाषा, साहित्य और शिक्षण”। कार्यक्रम का शुभारंभ लेखिका सुश्री स्वरांगी साने द्वारा सभी अतिथियों, विद्वानों एवं प्रतिभागियों के औपचारिक स्वागत से हुआ। उन्होंने अपनी प्रभावपूर्ण कविता के माध्यम से कार्यक्रम की भावभूमि तैयार की। संगोष्ठी की अध्यक्षता श्री दिव्यराज अमिय (हिंदी व्याख्याता, ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय, जर्मनी एवं ज्यूरिख विश्वविद्यालय, स्विट्जरलैंड) ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि भाषा का उद्देश्य समाज में लोकप्रियता और व्यापक संवाद स्थापित करना होना चाहिए। उन्होंने गीतों और उदाहरणों के माध्यम से अपनी बात रखते हुए जर्मन समाज की समकालीन चुनौतियों, जैसे—अकेलापन, बढ़ती आयु, स्त्री-संबंधी प्रश्न तथा सामाजिक विविधताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने भारतीय संस्कृति की विशिष्टताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय भाषाएँ समकालीन ज्ञान-विज्ञान की संवाहक हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के क्षेत्र में भारत अग्रणी भूमिका निभाएगा तथा मानवता के भविष्य में भारतीय ज्ञान-परंपरा का महत्वपूर्ण योगदान रहेगा। मुख्य अतिथि डॉ. गौतम लियु (हिंदी रीडर, हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय, जर्मनी) ने जर्मनी में हिंदी शिक्षण की वर्तमान स्थिति और चुनौतियों पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि हिंदी सीखने में लगभग चार वर्षों का समय लग जाता है, जिसके कारण विद्यार्थियों की संख्या सीमित रहती है। उन्होंने पाठ्यक्रम, व्याकरण तथा भाषा-अध्ययन की व्यावहारिक कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए नए प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया। बीज वक्ता डॉ. राम भट्ट (रीडर एवं सीनियर रिसर्च एसोसिएट, हेम्बर्ग विश्वविद्यालय) ने भारतीय ज्ञान-परंपरा, शिक्षा के उद्देश्य तथा भाषा और अस्मिता के गहरे संबंधों पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कविता के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की व्याख्या करते हुए कहा कि हिंदी का विकास समाज और समय की आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। सान्निध्य वक्तव्य में श्री अनिल शर्मा ‘जोशी’ (अध्यक्ष, वैश्विक हिंदी परिवार) ने जर्मनी के भाषाई इतिहास को पुनर्जागरण से जोड़ते हुए हिंदी के वैश्विक विकास में जर्मनी की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपनी चर्चित कविता “भटका हुआ भविष्य” का प्रभावशाली पाठ किया। उन्होंने युवाओं की सक्रिय भागीदारी, प्रवासी भारतीय समुदाय (डायस्पोरा) की भूमिका, द्विभाषिक पुस्तकों की उपयोगिता तथा विदेशों में हिंदी सीखने के बढ़ते उत्साह का विशेष उल्लेख किया।

काव्य-पाठ सत्र में सुश्री रश्मि त्रिवेदी (लेखिका, बीसबाडन) ने अपनी संवेदनशील कविता “मन दरवेश हो गया है” प्रस्तुत की। सुश्री प्रतिभा मंत्री (साहित्यनुरागी, कोलोन) ने मराठी एवं जर्मन भाषा में “मन” विषयक कविता प्रस्तुत कर मन की चंचलता का सुंदर चित्रण किया। सुश्री पंखुरी भटनागर (लेखिका, फ्रैंकफर्ट) ने “स्त्री प्रतिबिंब” तथा “चाँद से प्रेम” शीर्षक कविताओं का भावपूर्ण पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। डॉ. कविता सिंह ‘प्रभा’ (संस्थापक एवं संपादक, कविता प्रभा राष्ट्रीय साहित्य समूह, दिल्ली) ने उर्दू की लोकप्रिय विधा ‘मुकरी’ का रोचक पाठ प्रस्तुत किया, जिसमें दो सखियों के संवाद के माध्यम से हास्य और व्यंग्य का सुंदर समन्वय देखने को मिला। उन्होंने कुछ प्रेरक दोहे भी सुनाए। श्री नारायण कुमार (मानक निदेशक, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद) ने अपने संबोधन में हिंदी के विकास से जुड़ी पुरानी स्मृतियों को साझा करते हुए वैश्विक स्तर पर हिंदी के निरंतर विस्तार की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम का प्रभावी संचालन सुश्री शिप्रा शिल्पी (शिक्षाविद्, फ्रीडनशूले, कोलोन) ने अत्यंत कुशलता के साथ किया। अंत में श्री ऋषिकुमार शर्मा (पूर्व उपसचिव, हिंदी अकादमी) ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, कवियों एवं प्रतिभागियों के प्रति औपचारिक धन्यवाद ज्ञापित करते हुए संगोष्ठी का समापन किया।
रिपोर्ट:— अजय शर्मा
