वनमाली की 114वीं जयंती पर कहानी और कथेतर पाठ का आयोजन

नई दिल्ली। सुप्रसिद्ध कथाकार एवं शिक्षाविद् जगन्नाथ प्रसाद चौबे ‘वनमाली’ की 114वीं जयंती के अवसर पर 4 अगस्त को वनमाली सृजन पीठ, नई दिल्ली के तत्वावधान में नेहरू प्लेस स्थित सृजन पीठ कार्यालय में साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में कहानी पाठ, कथेतर रचना पाठ और वनमाली जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर चर्चा हुई।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए अशोक मिश्र ने वनमाली जी के साहित्यिक और शैक्षिक योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि 1940 से 1960 के दशक के बीच वनमाली हिंदी कथा साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे। उनकी पहली कहानी ‘जिल्दसाज’ वर्ष 1934 में कलकत्ता से प्रकाशित ‘विश्वमित्र’ मासिक में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद लगभग 25 वर्षों तक उनकी रचनाएं ‘सरस्वती’, ‘कहानी’, ‘विश्वमित्र’, ‘विशाल भारत’, ‘लोकमित्र’, ‘भारती’, ‘माया’ और ‘माधुरी’ जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं।
वनमाली जी की कहानियों में अनुभूति की तीव्रता, नाटकीय प्रभाव, सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक समझ और विश्लेषण की क्षमता प्रमुख विशेषताएं थीं। उनकी रचनाओं को पाठकों और आलोचकों दोनों से व्यापक सराहना मिली। आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने अपने श्रेष्ठ कहानियों के संकलन में उनकी कहानी ‘आदमी और कुत्ता’ को भी स्थान दिया था। मध्य प्रदेश के अनेक विद्यालयों और महाविद्यालयों में करीब दो दशकों तक उनकी कहानियां पढ़ाई जाती रहीं। उन्होंने सौ से अधिक कहानियों, व्यंग्य लेखों और निबंधों की रचना की। उनकी कहानियों का आकाशवाणी इंदौर से भी नियमित प्रसारण होता रहा।
वनमाली जी का योगदान केवल कथा साहित्य तक सीमित नहीं था। वे अविभाजित मध्य प्रदेश के प्रमुख शिक्षाविदों में शामिल थे। महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने कई वर्षों तक प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में कार्य किया। शिक्षक, प्रधानाध्यापक और उपसंचालक के रूप में उन्होंने बिलासपुर, खंडवा और भोपाल में सेवाएं दीं। शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार तथा राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद की समिति के सदस्य के रूप में भी उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 1962 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के हाथों उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
जगन्नाथ प्रसाद चौबे ‘वनमाली’ का जन्म 1 अगस्त 1912 को आगरा में हुआ था। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन मध्य प्रदेश में बिताया और 30 अप्रैल 1976 को भोपाल में उनका निधन हुआ। उनकी साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए निधन के बाद भी उनकी रचनाओं का प्रकाशन निरंतर होता रहा। उनका पहला कथा-संग्रह ‘जिल्दसाज’ 1983 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद ‘प्रतिनिधि कहानियां’ सहित ‘वनमाली समग्र’, ‘वनमाली स्मृति’, ‘वनमाली सृजन’ तथा उनकी रचनाओं और व्यक्तित्व पर केंद्रित कई महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुईं। हाल के वर्षों में महेश दर्पण, संतोष चौबे, ज्योति रघुवंशी और डॉ. लता अग्रवाल के संपादन/लेखन में वनमाली जी के साहित्य पर केंद्रित कृतियां भी प्रकाशित हुई हैं।
कार्यक्रम के साहित्यिक सत्र में सुपरिचित कथाकार एवं कथेतर लेखक ज्ञानचंद बागड़ी ने जल, जंगल, जमीन और आदिवासी समुदाय को केंद्र में रखकर लिखी अपनी विचारपरक कथेतर रचना का पाठ किया। इसके बाद सुप्रसिद्ध कथाकार हीरालाल नागर ने अपनी कहानी ‘जैक बहादुर’ का पाठ किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कथाकार एवं ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के संपादक बलराम ने भी कथेतर रचना का पाठ किया। उन्होंने भेंटवार्ता विधा के स्वरूप पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान समय में कथेतर रचनाएं विशेष रूप से लोकप्रिय हो रही हैं। उन्होंने साहित्य अकादेमी द्वारा वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया को दिए गए पिछले वर्ष के सम्मान का भी उल्लेख किया।
राजस्थान से आए कवि गोविन्द माथुर के सान्निध्य में संपन्न इस कार्यक्रम में प्रस्तुत रचनाओं को सार्थक और महत्वपूर्ण बताया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई, मनोहर बाथम, हरियश राय, जानकी प्रसाद शर्मा, जनार्दन मिश्र, राजीव शुक्ल, अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’, फजल इमाम मल्लिक, अवधेश सिंह सहित अनेक साहित्यकारों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत आईसेक्ट इंडिया के उपाध्यक्ष अरविंद चतुर्वेदी ने किया। अंत में सुप्रसिद्ध कवि लीलाधर मंडलोई ने धन्यवाद ज्ञापन किया। साहित्यिक पाठ और विमर्श के माध्यम से आयोजित यह कार्यक्रम वनमाली जी के साहित्यिक एवं शैक्षिक अवदान को स्मरण करने और उनकी रचनात्मक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की महत्वपूर्ण पहल रहा।
