नई दिल्ली में ‘भक्तामर और भारतीय चित्रांकन’ का लोकार्पण

जैन संत विशुद्धसागर महाराज ने किया विमोचन, भारतीय और जैन चित्रांकन परंपरा को समर्पित है कृति
नई दिल्ली। नई दिल्ली में आयोजित एक विशाल धर्मसभा में लेखक की नवीनतम कृति ‘भक्तामर और भारतीय चित्रांकन’ का लोकार्पण सुप्रसिद्ध तपोनिष्ठ जैन संत पूज्य महाराजश्री विशुद्धसागर जी ने किया। इस अवसर पर महाराजश्री ने साहित्यकार के सृजनधर्म और स्वतंत्र चिंतन को रेखांकित करते हुए कहा कि साहित्यकार किसी बंधन में बंधकर नहीं रहता, उसे निरंतर प्रवाहित होते रहना चाहिए। उन्होंने लेखक को निरंतर सृजन करते रहने का आशीर्वाद दिया तथा अपनी कृति ‘विचार’ भी भेंट की।
‘भक्तामर और भारतीय चित्रांकन’ भक्तामर स्तोत्र और उससे जुड़ी भारतीय चित्रांकन परंपरा का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करने वाली कृति है। पुस्तक में भक्तामर स्तोत्र के रचनाकार आचार्य मानतुंग, स्तोत्र की रचना, उसके 48 श्लोकों तथा सदियों से विभिन्न कला शैलियों में होते रहे उसके चित्रांकन का परिचय दिया गया है।
कृति में भारतीय चित्रांकन परंपरा, जैन चित्रांकन परंपरा और भक्तामर के चित्रांकन की ऐतिहासिक परंपरा पर विस्तार से चर्चा की गई है। इसके साथ ही भक्तामर स्तोत्र की विषयवस्तु, आचार्य मानतुंग की जीवनी, सभी श्लोक, स्तोत्र का महात्म्य तथा जैन दर्शन के विभिन्न आयामों को भी अलग-अलग अध्यायों में प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक में भक्तामर के लघुचित्रों की परंपरा को विशेष महत्व दिया गया है। बताया गया कि सत्रहवीं सदी से विभिन्न चित्रशैलियों में भक्तामर के श्लोकों का चित्रांकन होता रहा है। आधुनिक समय में सांगानेर में इन श्लोकों को शिल्पित किए जाने का भी उल्लेख कृति में है। सुप्रसिद्ध जैन चिंतक एवं पूर्व सत्र न्यायाधीश देवेंद्र जैन की कृति ‘मनःप्रणाम’ में प्रकाशित इन चित्रों को भी पुस्तक में स्थान दिया गया है।
भक्तामर के चित्रांकनों पर अमेरिका की जैन कला विशेषज्ञ डॉ. फ़िलिस ग्रेनाफ़ तथा डॉ. सरयू दोषी के कार्य और उनके साथ हुए विमर्श से भी पुस्तक को महत्वपूर्ण सामग्री प्राप्त हुई। लेखक द्वारा विभिन्न अंचलों से एकत्र की गई अन्य छवियों और सामग्री को शामिल करते हुए इस कृति का प्रकाशन डीसेंट ग्राफिक्स, इंदौर द्वारा किया गया है।
कृति की भूमिका पूज्य महाराजश्री विशुद्धसागर जी ने लिखी है, जबकि उनके विद्वान शिष्य सुव्रतसागर महाराजश्री ने पुस्तक के विभिन्न अध्यायों की विस्तृत समीक्षा की है।
लोकार्पण समारोह में सुप्रसिद्ध समाजसेवी तेजकुमार वेद तथा श्रीमती मंजू वेद विशेष रूप से उपस्थित रहे। उनके सहयोग और समर्पण को पुस्तक के प्रकाशन में महत्वपूर्ण बताया गया। कार्यक्रम में ग्वालियर से श्री केदार जैन सपत्नीक शामिल हुए। उन्होंने जैन भित्तिचित्रों का बड़ी संख्या में छायांकन किया है।
इस अवसर पर उपस्थित साहित्यप्रेमियों, जैन समाज के श्रद्धालुओं और कला-संस्कृति से जुड़े लोगों ने कृति को भारतीय एवं जैन कला परंपरा के दस्तावेजीकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम के उपरांत लोकार्पण समारोह और पुस्तक से संबंधित विभिन्न चित्र भी साझा किए गए।
