ब्रिटेन से हिंदी-अध्ययनरत विद्यार्थियों एवं शिक्षकों का स्वागत एवं सम्मान समारोह संपन्न

नई दिल्ली, 17 अगस्त 2026। वैश्विक हिंदी परिवार एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के संयुक्त तत्वावधान में 17 अगस्त 2026 को भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) में ब्रिटेन से हिंदी का अध्ययन कर रहे विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के स्वागत एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया गया। इसके पश्चात् डॉ. नीलम वर्मा, हृदय रोग विशेषज्ञ, ने स्वागत उद्बोधन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों का औपचारिक स्वागत किया। इस अवसर पर डॉ. नीलम वर्मा की पुस्तक समयांतर का लोकार्पण भी किया गया। कार्यक्रम का कुशल एवं प्रभावशाली संचालन मनोज श्रीवास्तव ‘अनाम’, संपादक, साहित्य सप्तक, ने किया।
डॉ. राजेश रंजन, उप महानिदेशक, ICCR, ने कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए कहा कि हिंदी भाषा सभी को जोड़ने का कार्य करती है। उन्होंने हिंदी के विकास में ICCR की भूमिका तथा पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रवासी भारतीयों एवं विदेशों में हिंदी सीख रहे विद्यार्थियों को भारत से जुड़े विषयों पर लेखन के लिए प्रोत्साहित किया तथा कहा कि ऑनलाइन माध्यम से विश्व के किसी भी कोने से हिंदी के विकास में योगदान दिया जा सकता है। अंत में मैथिलीशरण गुप्त की पंक्ति “जो भरा नहीं है भावों से…” का पाठ करते हुए अपने वक्तव्य को विराम दिया।

अध्यक्षीय उद्बोधन में सुशील सिंघल वरिष्ठ उपाध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, ने यूके हिंदी समिति के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि विदेशों में भारतीय भाषाओं और संस्कृति के संरक्षण में प्रवासी भारतीयों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने वैश्विक हिंदी परिवार की संगठनात्मक क्षमता की प्रशंसा करते हुए हिंदी के वैश्विक विकास और विस्तार के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।
मुख्य वक्ता कवयित्री अलका सिन्हा ने अपनी बात राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध पंक्ति “जो भरा नहीं है भावों से…” से आरंभ की। उन्होंने भाषा को व्यक्ति की पहचान और संस्कृति का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि घर-परिवार में हिंदी एवं मातृभाषा के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए। उन्होंने भाषा के विस्तार के साथ भारतीय संस्कृति के संरक्षण पर भी बल दिया। चाँदनी चौक की स्मृतियों और अनुभवों के माध्यम से उन्होंने अपने विचारों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया तथा हिंदी को हिंदी की सहजता और स्वाभाविकता के साथ बोलने का संदेश दिया।
नारायण कुमार, मानक निदेशक, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, ने अपनी पुरानी स्मृतियों से वक्तव्य की शुरुआत करते हुए भारतीय संस्कृति और रामायण की विशेषताओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन में बसे भारतीयों के प्रयासों से हिंदी के विकास को नई दिशा मिली है। उन्होंने परिवार में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने का आह्वान किया।
गोपाल अरोड़ा, सचिव, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, ने साहित्य एवं भाषा के प्रति विद्यार्थियों और शिक्षकों के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि भाषा का अपना अर्थशास्त्र और अर्थविज्ञान होता है तथा भाषा ज्ञान आर्थिक और व्यावसायिक अवसरों के द्वार भी खोलता है। उन्होंने विद्यार्थियों को भाषा एवं साहित्य के अध्ययन के साथ सोशल नेटवर्क और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसे आधुनिक माध्यमों के सदुपयोग का संदेश दिया।
डॉ. रमा, प्राचार्य, हंसराज कॉलेज, ने ब्रिटेन से आए विद्यार्थियों को हिंदी के प्रेरणास्रोत बताते हुए कहा कि वे विदेशों में हिंदी के स्रोत और संवाहक हैं। उन्होंने भारत को देवभूमि बताते हुए विद्यार्थियों की भारत यात्रा की सफलता की कामना की और हिंदी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करने का संदेश दिया।
आभासी पटल के माध्यम से वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष अनिल शर्मा जोशी ने अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भाषा के प्रति रुचि संस्कृति को समझने का माध्यम बनती है। भारत की यात्रा हिंदी और भारतीय संस्कृति को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ऐसे प्रयासों से हिंदी को वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूती मिलेगी।
ऋषि कुमार शर्मा, अध्यक्ष, वैश्विक हिंदी परिवार, दिल्ली इकाई, ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने सुरेखा चौंफला के हिंदी के प्रति समर्पण की प्रशंसा करते हुए कहा कि अच्छे कार्यों के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने ब्रिटेन में हिंदी की स्थिति एवं विरासत का उल्लेख करते हुए हिंदी के विकास के लिए “संकल्प बना रहे, विकल्प न रहे” का संदेश दिया और डॉ. कुंवर बेचैन की पंक्तियों के साथ अपने वक्तव्य को विराम दिया।
शिव कुमार निगम, सचिव, वैश्विक हिंदी परिवार, दिल्ली इकाई, ने कहा कि भारतीय संस्कृति और हिंदी की विरासत अगली पीढ़ी तक पहुँचनी चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों की भारत यात्रा को उनके अनुभवों और ज्ञान के विस्तार की महत्वपूर्ण कड़ी बताया।
सुमित कुमार मीणा, सहायक आचार्य, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, ने सभी अतिथियों एवं विद्यार्थियों का हृदय से स्वागत करते हुए वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को मजबूत करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हिंदी के माध्यम से भारत से जुड़ाव भारतीय संस्कृति के विस्तार में सहायक होगा।
विवेक शर्मा, सहायक आचार्य, दिल्ली विश्वविद्यालय, ने आगामी 24 अगस्त के कार्यक्रम एवं आगमन का उल्लेख करते हुए सभी को आमंत्रित किया तथा हिंदी के विकास के लिए किए जा रहे प्रयासों के प्रति आभार व्यक्त किया।
सुरेखा चौंफला, अध्यापिका, ने अपने संस्मरण साझा करते हुए विदेश में हिंदी सीखने और सिखाने के अनुभवों को प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 1994 से हिंदी सीखने का प्रयास आरंभ हुआ और मंदिरों से हिंदी से जुड़ने की उनकी यात्रा आगे बढ़ी। उन्होंने कविता की पंक्तियों के साथ अपने वक्तव्य का समापन किया।
हरीश पोपटानी, अध्यापक, ने अपनी जीवन-यात्रा एवं हिंदी के प्रति अपने योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने ब्रिटेन में हिंदी की वर्तमान स्थिति तथा हिंदी के विकास की यात्रा पर अपने विचार रखे।
अंजना उप्पल, अध्यापिका, ने सुरेखा जी के साथ अपने अनुभव साझा करते हुए हिंदी शिक्षण और हिंदी के विकास में उनके योगदान की सराहना की।
कार्यक्रम में ब्रिटेन से आए विद्यार्थियों ने भी उत्साहपूर्वक अपनी हिंदी-यात्रा, अनुभव और प्रतिभा प्रस्तुत की।
तविसा वशिष्ठ ने बच्चों को हिंदी पढ़ाने के अपने अनुभव साझा किए तथा एक गीत प्रस्तुत कर अपने वक्तव्य का समापन किया।
आर्या उप्पल ने हिंदी सीखने के अनुभव और अपनी जिज्ञासाओं को साझा करते हुए कविता प्रस्तुत की।
पार्थ वशिष्ठ ने बताया कि वे पिछले छह वर्षों से हिंदी सीख रहे हैं। उन्होंने अपनी हिंदी-यात्रा साझा करते हुए क्रिकेट और तबला के प्रति अपनी रुचि व्यक्त की। उन्होंने भारत को जानने में अपनी रुचि बताते हुए ‘शब्द’ शीर्षक से कविता प्रस्तुत की।
इरा शर्मा ने ‘तेरी मिट्टी में मिल जावाँ’ गीत प्रस्तुत किया और हिंदी सीखने तथा हिंदी से अपने जुड़ाव के अनुभव साझा किए।
अक्षज रावल ने क्रिकेट के प्रति अपनी रुचि व्यक्त की तथा रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता प्रस्तुत करते हुए हिंदी के प्रति अपने लगाव को स्पष्ट किया।
आरुषि उप्पल ने अपनी हिंदी-यात्रा का वर्णन किया और बताया कि वे शनिवार की सुबह हिंदी पढ़ती हैं। उन्होंने सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता की पंक्तियाँ “वीरों का कैसा हो वसंत” प्रस्तुत कीं।
स्वास्तिक कुमार ने हिंदी सीखने के अपने अनुभव और हिंदी के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करते हुए हिंदी से प्राप्त ज्ञान एवं अनुभवों को साझा किया।
हेमान्या ने हिंदी सीखने और पढ़ने के अनुभव साझा किए तथा पद्मेश गुप्त की कविता प्रस्तुत की।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. शिवम शर्मा, राजभाषा विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, ने सभी अतिथियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं आयोजकों के प्रति औपचारिक धन्यवाद ज्ञापित किया।
रिपोर्ट : अजय शर्मा
