‘अगम बहै दरियाव’ का नायक पूरा बनकट गाँव है : प्रो. श्रद्धा सिंह

हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. श्रद्धा सिंह ने कहा कि शिवमूर्ति के पात्र संकट का शिकार होने के बावजूद संघर्ष करते हुए जीवित रहने का माद्दा रखते हैं। इस उपन्यास के आवरण चित्र में प्रयुक्त रंग विरोधाभासी रंग हैं। लाल रंग पीड़ा, आक्रोश और संघर्ष का प्रतीक है। इसमें छपा किसान जीवन की दृढ़ता और जिजीविषा का प्रतीक है। दरिया किसान की अनवरत मुश्किलों का प्रतीक है, जिसका कोई किनारा नहीं है। पूरा आवरण किसान संस्कृति का विडंबनापूर्ण चित्र प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास की स्त्रियाँ बहुत मजबूत हैं। इस उपन्यास की कथा सिर्फ़ बनकट गाँव ही नहीं, पूरे उत्तर भारत का प्रतिनिधित्व करती है। इस कथा का नायक पूरा बनकट गाँव है।” यह बातें उन्होंने हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित कथाकार शिवमूर्ति के उपन्यास ‘अगम बहै दरियाव’ के लोकार्पण-सह-परिचर्चा के दौरान कहीं।
बुधवार, 2 सितंबर, 2026 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा शिवमूर्ति के उपन्यास ‘अगम बहै दरियाव’ पर लोकार्पण-सह-परिचर्चा का आयोजन आचार्य रामचंद्र शुक्ल सभागार में किया गया। परिचर्चा का शुभारंभ मालवीय जी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि एवं कुलगीत गायन के साथ किया गया। इसके पश्चात मंचस्थ अतिथियों को स्वागतस्वरूप तस्वीर, उत्तरीय, गुलाब का फूल और पौधा दिया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता वरिष्ठ कवि एवं आलोचक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि “शिवमूर्ति ने ग्रामीण जीवन के सघन अंतरलोक को बहुत बारीकी से बुना है। बादल की गड़गड़ाहट से शुरू होकर यह उपन्यास नगाड़े की धुन पर समाप्त होता है। यह भय से भरोसे की यात्रा है। यह उपन्यास पुरातात्त्विक एवं समाजशास्त्रीय महत्त्व का उपन्यास है। इस उपन्यास के ढेर सारे केंद्रबिंदु हैं। नसबंदी, चकबंदी और नाकेबंदी इस उपन्यास के केंद्रीय सूत्र हैं। इस उपन्यास के पात्र बीज, बिजली और बाज़ार के लिए संघर्ष करते हुए दिखाई देते हैं। यह उपन्यास सुने हुए को देखे गए से और देखे गए को भोगे हुए से जोड़ता है।”
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग के प्रो. कुमार वीरेंद्र ने अपने विशिष्ट वक्तव्य में कहा कि इस उपन्यास में चौतरफा घेरेबंदी का परिवेश है। शिवमूर्ति को यह उपन्यास लिखने में पाँच साल लगे। इसमें इमरजेंसी से मायावती के मुख्यमंत्री बनने तक का परिवेश दर्ज है। शिवमूर्ति ने इस उपन्यास में कचहरी को बड़े ही जबरदस्त ढंग से आलोचित किया है। यह परिवेश उनके जीवन से आता है। शिवमूर्ति के यहाँ पुरुषों के बजाय स्त्रियाँ आंदोलनरत दिखती हैं। इस मामले में शिवमूर्ति अपने पूर्ववर्ती रेणु से आगे निकल जाते हैं। शिवमूर्ति ने स्त्रियों की एकजुट लड़ाई की वकालत की है। इनके पात्रों में स्वाभाविक दुर्बलताएँ दिखती हैं और उनके नाम बड़े रोचक हैं। इस मामले में शिवमूर्ति रेणु और प्रेमचंद के करीब दिखाई पड़ते हैं। इनके पात्रों का चरित्र-निर्माण परिस्थितियों, चुनौतियों और संघर्ष से हुआ है। इस उपन्यास में गाँव की स्वाभाविक दुश्मनी का भी बड़ा ही दिलचस्प चित्रण है। समाज में सौमनस्य कायम करने और ग्रामीण संवेदनाओं का प्रामाणिक चित्रण इस उपन्यास में दिखाई पड़ता है।”
इस लोकार्पण-सह-परिचर्चा में उपन्यासकार शिवमूर्ति की उपस्थिति भी रही। अपने लेखकीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि “मेरे लिए प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन में नया मोड़ बनकर आईं। यहीं से मैं भी कहानियाँ लिखने की तरफ़ प्रेरित हुआ। मेरे लिए प्रेमचंद और रेणु गुरु की तरह हैं। रेणु से क्राफ्ट और प्रेमचंद के यहाँ मौजूद विविध संवेदनाओं को आधार रूप में ग्रहण किया। इस तरह अपनी लेखकीय यात्रा में ‘अगम बहै दरियाव’ तक लिख पाया हूँ। आगे भी एक उपन्यास लिख रहा हूँ।”
आसनसोल से आए युवा आलोचक डॉ. कृष्ण कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि “मैं इस उपन्यास के प्रेम-संबंधों पर बात करना चाहूँगा, जिसमें सूरे और छब्बी, झनाका और दलसिंगार, भगवत पांडेय और अनारो, बोधा और दिलजानी के प्रेम-संबंध ट्रैजिक प्रेम के उदाहरण हैं। शिवमूर्ति लोकगीतों के भी धनी हैं, जिसका असर उपन्यास में दिखाई देता है।”
हिंदी विभाग, बीएचयू के सहायक आचार्य डॉ. विंध्याचल यादव ने कहा कि शिवमूर्ति की रचनात्मकता का महत्तम समापवर्तक ‘अगम बहै दरियाव’ है। इसमें उत्पीड़न, शोषण, संघर्ष के साथ ही अवध की किसान-मज़दूर जनता के फिर से जी उठने की छवियाँ भी अंकित हैं। शिवमूर्ति का कोई भी पात्र समझौता नहीं करता। वह संघर्ष करता है। उसमें वर्ग-चेतना आ चुकी है। यह उपन्यास पूर्वांचल में सामंतशाही और लोकतंत्रशाही की जकड़न को उधेड़ता है।
स्वागत वक्तव्य देते हुए इस लोकार्पण-सह-परिचर्चा के संयोजक डॉ. महेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने कहा कि “मैं शिवमूर्ति के उपन्यास पर यह कार्यक्रम बीते डेढ़ सालों से करवाना चाहता था, लेकिन किन्हीं कारणों से इसे टाला जाता रहा है। आज यह संभव हो पाया है। शिवमूर्ति हमारे समय के उन कथाकारों में से हैं, जिन्हें सभी पीढ़ी के लोग पसंद करते हैं।”
इस लोकार्पण-सह-परिचर्चा का संचालन हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. रविशंकर सोनकर और धन्यवाद ज्ञापन शोधार्थी दीक्षा मिश्रा ने किया। इस कार्यक्रम में प्रो. अवधेश प्रधान, प्रो. बलराज पांडेय, प्रो. मनोज कुमार सिंह, प्रो. आशीष त्रिपाठी, प्रो. नीरज खरे, प्रो. कमलेश वर्मा, प्रो. प्रभाकर सिंह, प्रो. किंगसन सिंह पटेल, डॉ. प्रीति जायसवाल, डॉ. प्रभात कुमार मिश्र, डॉ. प्रियंका सोनकर, डॉ. राज कुमार मीणा, डॉ. सत्यप्रकाश सिंह, डॉ. राजीव कुमार, डॉ. अमित कुमार पांडेय, मनीष खत्री आदि के साथ ही काफ़ी संख्या में शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।
