‘बेशर्ममेव जयते’ के मंचन ने लेखक को दिया रचनात्मक सुख

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मुंबई में प्रेम जनमेजय के व्यंग्य-संग्रह ‘बेशर्ममेव जयते’ पर आधारित नाटक का पहली बार मंचन किया गया। गोदान कुमार और तरुण दत्त पाण्डेय के निर्देशन में अभ्यास मंच की प्रस्तुति ने दर्शकों को व्यंग्य और समकालीन सामाजिक सरोकारों से रूबरू कराया। मंचन के दौरान कई बार गूँजी तालियों ने लेखक को विशेष रचनात्मक आनंद दिया।

‘हमाम में सब नंगे हों तो कपड़े पहनने वाले को शर्म आती है’ की केंद्रीय अवधारणा पर आधारित यह नाटक राजनीति, शिक्षा, इतिहास, मीडिया और सामाजिक संबंधों सहित विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त बेशर्मी को रेखांकित करता है। वर्ष 1978 में प्रकाशित व्यंग्य-संकलन ‘बेशर्ममेव जयते’ की पाँच व्यंग्य रचनाओं का नाट्य रूपांतरण कर गोदान कुमार और तरुण दत्त पाण्डेय ने उन्हें वर्तमान समय के संदर्भ में प्रासंगिक बना दिया है।

मुंबई की रंगशाला में दर्शकों की भारी उपस्थिति रही और तिल रखने की भी जगह नहीं थी। प्रसिद्ध रंगकर्मी जयंत देशमुख और विभा रानी की उपस्थिति ने लेखक का उत्साह बढ़ाया। सभी कलाकारों के प्रभावशाली अभिनय को नाटक की सफलता की प्रमुख वजह माना गया।

इससे पहले ‘बेशर्ममेव जयते’ का मंचन भोपाल, दिल्ली और आगरा सहित विभिन्न शहरों में हो चुका है। इप्टा द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय नाट्य समारोह में भी इसका मंचन प्रस्तावित था, लेकिन विजय तेंदुलकर के ‘जाति ही पूछो साधु की’ और प्रेम जनमेजय के ‘बेशर्ममेव जयते’ के मंचन के विरोध के कारण पूरा समारोह ही रद्द कर दिया गया। विरोध करने वालों ने इन दोनों नाटकों के बिना समारोह आयोजित करने की बात कही थी, जिसे इप्टा ने स्वीकार नहीं किया।

दशकों पहले लिखी गई रचना का नए समय और नए माध्यम में पुनर्पाठ होते हुए दर्शकों तक पहुँचना लेखक के लिए बड़ी रचनात्मक उपलब्धि है। मंच से उठती तालियों ने यह विश्वास भी दिलाया कि व्यंग्य की प्रासंगिकता आज भी कायम है।

लेखक प्रेम जनमेजय के लिए ‘बेशर्ममेव जयते’ का मंचन किसी बड़े पुरस्कार से भी बढ़कर रचनात्मक उपलब्धि है।

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