काजल सूरी की पुस्तक-नाटक ‘सस्सी पुन्नू’ का विमोचन

Report (46)

रुबरू थिएटर की ओर से काजल सूरी द्वारा लिखित पुस्तक-नाटक ‘सस्सी पुन्नू’ का विमोचन किया गया। यह पुस्तक हंस प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। कार्यक्रम में साहित्य, रंगमंच, शिक्षा, मीडिया और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व उपस्थित रहे।

पुस्तक विमोचन में शामिल विशिष्ट अतिथियों में डॉ. प्रताप सहगल, सुप्रसिद्ध लेखक एवं संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार, ने ‘सस्सी पुन्नू’ को भारतीय उपमहाद्वीप की महत्वपूर्ण लोक प्रेमगाथाओं में से एक बताते हुए कहा कि ऐसी कथाएँ अपने भीतर प्रेम और विरह के साथ-साथ समाज, लोकजीवन और सांस्कृतिक स्मृतियों को भी सहेजे रहती हैं। उन्होंने काजल सूरी के इस प्रयास की सराहना की कि उन्होंने रंगमंचीय प्रस्तुति को पुस्तक के रूप में भी पाठकों तक पहुँचाने का कार्य किया है। उन्होंने ‘सस्सी पुन्नू’ जैसी लोकगाथाओं के साहित्यिक और सांस्कृतिक महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसी रचनाएँ केवल प्रेम-कथाओं तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि अपने समय के समाज, संस्कृति, लोकजीवन और मानवीय संवेदनाओं को भी अपने भीतर समेटे रहती हैं।

इस अवसर पर उपस्थित विशिष्ट अतिथियों में ऋषि कुमार शर्मा, पूर्व उप सचिव, हिंदी अकादमी, दिल्ली, ने पुस्तक और नाटक के सांस्कृतिक पक्ष पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि ‘सस्सी पुन्नू’ जैसी लोकगाथाएँ हमारी साझा सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं। उन्होंने पुस्तक में लोक परंपरा और रंगमंच के समन्वय को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसी कृतियाँ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और लोक साहित्य से जोड़ने का महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं। उन्होंने काजल सूरी के इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि लोककथा को नाटक और पुस्तक, दोनों माध्यमों में सामने लाना उसे व्यापक पाठक और दर्शक वर्ग तक पहुँचाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है।

डॉ. सुमन केशरी, सुप्रसिद्ध कवयित्री, नाटककार एवं पूर्व सिविल सेवक, ने पुस्तक की साहित्यिक संवेदना और नाटकीय संभावनाओं पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि ‘सस्सी पुन्नू’ की कथा में प्रेम, विरह, संघर्ष, त्याग और मानवीय जिजीविषा जैसे अनेक स्तर मौजूद हैं। उनके अनुसार, काजल सूरी ने इस लोकगाथा को पुस्तक के माध्यम से जिस तरह प्रस्तुत किया है, वह पाठकों को कथा के भावनात्मक और सांस्कृतिक दोनों पक्षों से जोड़ता है।

डॉ. माधुरी सुबोध, सुप्रसिद्ध शिक्षाविद्, नाटककार एवं समाजसेवी, ने कहा कि लोककथाएँ समाज की सामूहिक स्मृति और जीवन-मूल्यों की वाहक होती हैं। उन्होंने पुस्तक और नाटक के माध्यम से प्रेम, समर्पण, मानवीयता और सांस्कृतिक एकता जैसे मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के प्रयास की सराहना की। उन्होंने विशेष रूप से इस बात को महत्त्वपूर्ण बताया कि साहित्य और रंगमंच मिलकर सांस्कृतिक शिक्षा को अधिक जीवंत और प्रभावशाली बना सकते हैं।

निरुपमा वर्मा, रंगमंच कार्यकर्ता एवं मीडियाकर्मी, ने पुस्तक के प्रकाशन और नाटक के मंचन को रंगमंच तथा साहित्य के बीच एक सार्थक संवाद बताया। उन्होंने कहा कि ‘सस्सी पुन्नू’ जैसी कहानियों को समकालीन मंच पर प्रस्तुत करना हमारी लोक विरासत को केवल संरक्षित करने का प्रयास नहीं, बल्कि उसे वर्तमान पीढ़ी के अनुभवों से जोड़ने की प्रक्रिया भी है। उन्होंने रुबरू थिएटर द्वारा काजल सूरी की पुस्तक के प्रकाशन के प्रयास को सराहनीय बताया।

पुस्तक के प्रकाशन की चर्चा करते हुए हंस प्रकाशन की ओर से हरिदर तिवारी जी ने कहा कि लोककथाएँ किसी समाज की सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। ‘सस्सी पुन्नू’ जैसी कालजयी प्रेमगाथा को पुस्तकाकार प्रकाशित करना इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह कथा केवल मंच पर देखने वाले दर्शकों तक सीमित न रहकर पाठकों की नई पीढ़ी तक भी पहुँचती है। प्रकाशक की ओर से यह भी रेखांकित किया गया कि काजल सूरी की पुस्तक साहित्य और रंगमंच के बीच एक सेतु का काम करती है। ऐसी रचनाओं का प्रकाशन लोक साहित्य और रंगपरंपरा को संरक्षित करने के साथ-साथ उन्हें समकालीन संदर्भ में पुनः पढ़ने और समझने का अवसर देता है।

पुस्तक की प्रस्तावना डॉ. माधुरी सुबोध तथा मीडियाकर्मी सुखनंदन बिंद्रा ने लिखी है। दोनों ने अपनी प्रस्तावना में ‘सस्सी पुन्नू’ की कथा, उसके सांस्कृतिक महत्त्व और आज के समय में उसकी प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किए हैं।

डॉ. माधुरी सुबोध, सुप्रसिद्ध शिक्षाविद्, नाटककार एवं समाजसेवी, ने प्रस्तावना में लोककथाओं की जीवंतता और उनके मानवीय पक्ष को रेखांकित किया है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि ‘सस्सी पुन्नू’ केवल दो प्रेमियों की कहानी नहीं, बल्कि प्रेम, संघर्ष, समर्पण, साहस और सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध मानवीय संवेदना की कथा है। उनके अनुसार, ऐसी लोकगाथाओं को साहित्य और रंगमंच के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुँचाना सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य है।

मीडियाकर्मी सुखनंदन बिंद्रा ने अपनी प्रस्तावना में पुस्तक और नाट्य प्रस्तुति के बीच के संबंध को रेखांकित करते हुए कहा है कि लोककथा जब रंगमंच पर आती है, तो वह केवल कथा नहीं रहती, बल्कि संगीत, अभिनय, दृश्य, भाषा और भावनाओं के माध्यम से जीवंत अनुभव में बदल जाती है। उन्होंने काजल सूरी के लेखन और रुबरू थिएटर के प्रयास को लोक संस्कृति को समकालीन दर्शकों तक पहुँचाने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बताया है।

कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों ने सामूहिक रूप से इस बात को रेखांकित किया कि लोककथाएँ केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की सांस्कृतिक चेतना को दिशा देने वाली जीवंत धरोहर हैं। अतिथियों ने इस बात पर बल दिया कि साहित्य और रंगमंच का यह संगम लोककथाओं को लंबे समय तक जीवित रखने और व्यापक समाज तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

‘सस्सी पुन्नू’ अविभाजित पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान की साझा सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी प्रसिद्ध प्रेमगाथा है। पुन्नू एक राजकुमार होते हुए भी सस्सी के प्रेम को पाने के लिए अपनी राजसी पहचान तक त्याग देता है। दोनों के प्रेम के सामने सामाजिक और पारिवारिक बंधन बाधा बनते हैं। अंततः बिछड़ने के बाद दोनों प्रेमी एक-दूसरे की तलाश में कठिन यात्राएँ करते हैं और लोकविश्वास के अनुसार धरती उन्हें अपने भीतर समा लेती है।

काजल सूरी की पुस्तक का हंस प्रकाशन से प्रकाशित होना इस पूरी पहल को एक अतिरिक्त साहित्यिक आयाम प्रदान करता है। मंच पर जीवंत हुई कथा अब पुस्तक के माध्यम से पाठकों तक भी पहुँच रही है। इस प्रकार ‘सस्सी पुन्नू’ केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि लोक संस्कृति, साहित्य, रंगमंच और साझा मानवीय विरासत को जोड़ने वाला एक सांस्कृतिक प्रयास बनकर सामने आती है।

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