‘मुझे हिंदी से प्यार क्यों है?’ विषय पर वैश्विक हिंदी परिवार का विशेष कार्यक्रम सम्पन्न

Report (60)

केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन यूके तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार के साप्ताहिक कार्यक्रम के अंतर्गत ‘मुझे हिंदी से प्यार क्यों है?’ विषय पर विशेष ऑनलाइन विमर्श आयोजित किया गया। कार्यक्रम में भारत के विभिन्न राज्यों के साथ विदेशों से जुड़े हिंदीप्रेमियों, साहित्यकारों, शोधार्थियों और युवाओं ने सहभागिता की। कार्यक्रम में 70 से अधिक देशों से जुड़े प्रतिभागियों की उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं को हिंदी के प्रति अपने लगाव के कारणों को स्वयं तलाशने और हिंदी के विविध सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक तथा वैश्विक आयामों पर विचार रखने का अवसर देना था। स्वागत उद्बोधन स्वरांगी साने (लेखिका)ने किया । उन्होंने कहा कि भाषा के प्रति प्रेम लंबे जुड़ाव और आत्मीयता से विकसित होता है। उन्होंने स्वयं मराठी भाषी होते हुए हिंदी के प्रति अपने लगाव का उल्लेख किया तथा कहा कि वैश्विक हिंदी परिवार सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर आगे बढ़ने का प्रयास करता है।

कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं भारतीय भाषा मंच के राष्ट्रीय समन्वयक राजेश्वर कुमार ने कहा कि भारतीय पुनर्जागरण को केवल एक भाषा के संदर्भ में नहीं देखा जा सकता। बंगाल, महाराष्ट्र और हिंदी क्षेत्र के पुनर्जागरण ने सामाजिक सुधार, सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय चेतना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम और हिंदी क्षेत्र के विभिन्न केंद्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंदी क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति का एक प्रभावी स्वरूप दिखाई देता है। उन्होंने महात्मा गांधी, काका साहब कालेलकर, विनोबा भावे, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, सुनीति कुमार चटर्जी और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों के व्यक्तित्वों के हिंदी के प्रति योगदान का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि हिंदी को मातृभाषा के साथ-साथ राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति और वैश्विक स्तर पर भारतीय ज्ञान एवं संस्कृति को प्रस्तुत करने वाली भाषा के रूप में देखा जा सकता है। भारतीय ज्ञान परंपरा, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि को विश्व तक पहुंचाने में हिंदी की भूमिका पर उन्होंने विशेष बल दिया। उन्होंने हिंदी को शिक्षा, परिवार, संस्कार, व्यापार और वैश्विक संवाद से जोड़ने की आवश्यकता भी बताई।

मुख्य अतिथि डॉ. मंजूनाथ एन. अंबिक, कुलसचिव, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने कहा कि भारत के विभिन्न राज्यों की अपनी-अपनी मातृभाषाएं हैं, लेकिन हिंदी अलग-अलग भाषाई क्षेत्रों के बीच संपर्क स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, बंगाल, पंजाब और दिल्ली सहित विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिभागियों की उपस्थिति को उन्होंने हिंदी की जोड़ने वाली शक्ति का उदाहरण बताया।
उन्होंने हिंदी को केवल राजनीतिक दृष्टि से न देखकर सम्मान और प्रेम की दृष्टि से अपनाने की बात कही। उनके अनुसार हिंदी को सिखाने और सीखने में आग्रह या दबाव के बजाय प्रेम और आत्मीयता का भाव होना चाहिए। उन्होंने हिंदी के व्यवहार, शिक्षा, सिनेमा और विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोग तथा हिंदीतर राज्यों के बीच संपर्क भाषा के रूप में इसकी भूमिका का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है और भारतीय संस्कृति, परंपरा तथा ज्ञान परंपरा को व्यापक स्तर पर पहुंचाने में हिंदी सहायक हो सकती है।

कार्यक्रम के मार्गदर्शक एवं कवि-लेखक अनिल शर्मा जोशी ने युवा वक्ताओं की सराहना करते हुए कहा कि हिंदी से प्रेम के पीछे अनेक भावनात्मक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत कारण हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान, स्व और अस्तित्व है।
उन्होंने भारतीय साहित्य, संगीत और प्रकृति-बोध में हिंदी तथा भारतीय भाषाओं की गहरी उपस्थिति का उल्लेख किया। उन्होंने चेताया कि केवल कामकाज के लिए किसी दूसरी भाषा का प्रयोग करते-करते व्यक्ति अपनी भाषा और सांस्कृतिक पहचान से दूर न हो जाए।
जर्मन भाषा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि किसी समय जर्मन भाषा को कमतर समझा जाता था, लेकिन बाद में उसी भाषा ने ज्ञान, शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय स्थान बनाया। उनके अनुसार किसी भाषा का भविष्य उसके युवा वक्ताओं के आत्मविश्वास, प्रेम और आत्मीयता पर निर्भर करता है।
उन्होंने कहा कि भाषा को जानना अपने को जानना है। भारतीय संस्कृति, परिवार, प्रकृति और जीवन-दृष्टि से जुड़ी अपनी भाषाओं को समझना अपने अस्तित्व को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने युवाओं से अपनी भाषा के प्रति प्रेम और आत्मीयता को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम में प्रीति साहू ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्होंने हिंदी को नहीं चुना, बल्कि हिंदी ने उन्हें चुना। उन्होंने हिंदी को लेकर समाज में मौजूद हीनभावना को दूर करने और अपनी भाषा के प्रति सम्मान विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
ज्योतिरादित्य फडत्रे, कक्षा 11वीं, आर्मी पब्लिक स्कूल, पुणे ने कहा कि हिंदी केवल बोली नहीं जाती, बल्कि महसूस की जाती है। कबीर, प्रेमचंद और दिनकर जैसे साहित्यकारों के माध्यम से हिंदी ने भारतीय समाज, इतिहास और राष्ट्रीय चेतना को स्वर दिया है। उन्होंने कहा कि हिंदी से प्रेम का अर्थ अन्य भारतीय भाषाओं से दूरी बनाना नहीं है।
संस्कृति सिन्हा, क्राइस्ट अकादमी ने हिंदी को भारतीय भावनाओं और अपनी जड़ों से जुड़ने का माध्यम बताया। पत्रकारिता के विद्यार्थी के रूप में उन्होंने कहा कि हिंदी उन्हें भारत के विभिन्न क्षेत्रों की आवाज और कहानियों को समझने तथा अभिव्यक्त करने की शक्ति देती है।
विशाखा चतुर्वेदी, शोधार्थी, जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ने हिंदी को पहचान, संस्कृति, संवेदना और व्यक्तित्व को गढ़ने वाली भाषा बताया। उन्होंने हिंदी की ग्रहणशीलता, देवनागरी की वैज्ञानिकता और हिंदी के संपर्क भाषा के रूप में महत्व पर प्रकाश डाला।
वंशिका मल्होत्रा, डीएमडी कॉलेज, अमृतसर ने हिंदी को विचारों, भावनाओं, पहचान और अपनत्व की भाषा बताया। उन्होंने कहा कि हिंदी को केवल हिंदी दिवस तक सीमित न रखकर दैनिक जीवन में सम्मान और आत्मीयता के साथ प्रयोग करना चाहिए।
सुमित यादव, शोधार्थी, काजी नजरुल विश्वविद्यालय, आसनसोल ने हिंदी को आत्मा की आवाज, पहचान और संस्कृति का दर्पण बताया। उन्होंने हिंदी की सरलता, वैज्ञानिकता, देवनागरी की विशेषता तथा अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करने की क्षमता को हिंदी प्रेम का आधार बताया। उन्होंने कबीर, तुलसी, प्रेमचंद, दिनकर और महादेवी वर्मा के साहित्य को हिंदी की समृद्ध परंपरा का उदाहरण बताया। उनके अनुसार हिंदी भारत की विविधता को एक सूत्र में जोड़ने वाली संपर्क भाषा है।

धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शिवम शर्मा (अनुवाद अधिकारी, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय) ने किया। उन्होंने केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन, भारतीय भाषा मंच, कार्यक्रम के अध्यक्ष राजेश्वर कुमार, अनिल शर्मा जोशी, डॉ. मंजूनाथ एन. अंबिक, डॉ. एस. मंजूनाथ, युवा विमर्शकारों, संचालिका तनवी राक्षे, संयोजकों तथा तकनीकी सहयोगी डॉ. सुरेश कुमार मिश्र सहित देश-विदेश से जुड़े सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने युवाओं से आगामी प्रतियोगिताओं और वैश्विक हिंदी परिवार के कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया।
अंत में तनवी राक्षे ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम के संचालन का समापन किया।

रिपोर्ट : अजय शर्मा

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