दिन विशेष कविता : “स्मृतियों का उजास” – दिब्येंदु कर्मकार
सायक* था सदा मौन, अकेला, निराला,
दफ़्तर में बीते वर्षों का जाला।
न बोला अधिक, न किसी से मिला,
जीवन का पथ वह चुपचाप चला।
फिर आई सिमरन,उजली, सुहानी,
चाल थी उसकी जैसे लहरों की कहानी।
सिर झुका हल्का, आँखों में शांति,
हँसी में बसी थी मधुर सी कांति।
सायक ने देखा, बस चुपचाप,
न चाहा कुछ,न दिया कोई जवाब।
पर लोगों ने समझा नज़र को गलत,
फुसफुसाहटें उठीं, शिकायतें बनीं सख्त।
एचआर सायक को पहचानता,
पर नियमों का बंधन मानता।
दिल से निलंबन करना न चाहता,
पर कर्तव्य निभाना उसे ही आता।
सिमरन हुई व्याकुल, मन में ग्लानि,
न उसने कहा, पर महसूसी ज़िम्मेदारी।
इस्तीफ़ा लिखा, छोड़ने को ठानी,
पर तभी आयी चिट्ठी, तस्वीर पुरानी।
तस्वीर में माँ थी, चिबुक पर तिल,
मुस्कान में छिपी थी कोमल खिल।
पत्र में लिखा “मैंने कुछ न चाहा,
बस तेरे चेहरे में अतीत को देखा।
तेरी आँखों में माँ की झलक,
तेरी मुस्कान में स्मृति की चमक।
न प्रेम, न चाह, बस यादें पुरानी,
मौन में बसी श्रद्धा की कहानी।”
सिमरन ने पढ़ा, आँखें हुई नम,
गलतफ़हमी का बोझ हुआ कम।
इस्तीफ़ा छोड़ा, एचआर को बताया,
सत्य का स्वर उसने सबको सुनाया।
सायक लौटा, मेज़ वही रही,
आँखों में शांति और गहराई सही।
सिमरन ने कहा “सर, मुझे खेद है,”
सायक ने उत्तर दिया— “मौन श्रद्धा की भाषा है।
आप हैं स्मृति का सजीव उजास,
चेहरों में जीती है यादों की साँस।”
*सायक- एक कवि का नाम*

