दिन विशेष युवा लेखन में रोहित कुमार की कविताएँ

Rohit kumar

नाम- रोहित कुमार ,रिसर्च स्कॉलर, हिन्दी एवम आधुनिक भारतीय भाषा विभाग,इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज । मेल- rohitkumar7271639@gmail.com

१. ‘शहर के उस छोर पर’

शहर के उस छोर पर
उस छोर से दूर बसता है एक गाँव
जहाँ चहचहाती हैं नन्हीं- मुन्हीं परियाँ
खेतों में बसते हैं तर- बतर किसान
अपने सपनों का अरमान संजोए
हमें सुनाई देती है उनसब की आवाज
जो कौतूहल मचा देती है मेरे मृतप्राय पड़े स्थूल शरीर को
जिजीविषा के साथ उठ पड़ता हूँ और चल पड़ता हूँ शून्य की ओर…।

२. “वो आए और चले गए “

उनका ‘आना’ एक व्यवहारिक क्रिया है
जिसमें निहित था उनका ‘जाना’
जैसा मजदूर जाते हैं काम पर
साँझ होते ही लौटते हैं घर की ओर
मैने समझा था कि
उनका आना ‘कभी न वापस जाने का प्रतीक है।’
लेकिन ये मेरा ‘यूटोपिया’ था जो मात्र यूटोपिया बन रह गया
जैसे कबीर का ‘अमरदेस’, रैदास का ‘बेगमपुरा’ और तुलसी का ‘रामराज्य’ ।

३. अन्त

मनुष्य का अंत,
विचारधारा का अंत,
ईश्वर का अंत,
इन सब का अंत तो सुना था ,
लेकिन आज,
विश्वास का अंत ,
समर्पण का अंत,
प्रेम का अंत,
उसके बंधन का अंत हो गया…।

हाँ, इन सब को मैंने देखा,
सुना और महसूस किया कि,
“अगर अंत नहीं है, तो व्यक्ति के अहम्, स्वार्थ और दोहरेपन का “।

अंत है उन सब मूल्यों का,
जो मनुष्य को ऊपर उठाती हैं ;
अगर अंत नहीं है तो मनुष्य के अहम् का ,
जो व्यक्ति के संपूर्ण संबंधों मे विनाश का कारण बनती है ….!

४. तुम्हारे जाने के बाद

तुम्हारे जाने के बाद
मैं उस पेड़ के पास लौटता हूँ…
जहाँ कभी तुम्हारी हँसी
एक पत्ती पर आकर ठहरी थी।
अब भी उसकी एक टहनी
हर बार मेरी ओर झुकती है,
जैसे उसे मालूम हो
कि मैं तुम्हें नहीं,
तुम्हारे न होने को देखने आया हूँ।
मैंने उसकी छाल पर
तुम्हारा नाम नहीं लिखा…
नाम लिख देना तो
प्रेम को पत्थर बना देना है।
मैंने बस अपनी हथेली रख दी थी,
और उसकी खुरदरी त्वचा ने
मेरी उँगलियों की उदासी पढ़ ली।
उसकी जड़ों में
मुझे अपना एकतरफा प्रेम मिलता है…
धरती के भीतर लगातार उतरता हुआ,
बिना यह पूछे
कि ऊपर कभी फूल आएँगे भी या नहीं।
वह पेड़ भी कितना अजीब है…
हर वसंत में
अपने पुराने पत्तों की जगह
नई हरियाली उगा लेता है;
पर मेरी तरह
पुरानी स्मृतियों को
झाड़ नहीं पाता।
कभी-कभी हवा आती है
और उसकी शाखों को उलट-पुलट जाती है।
तब लगता है,
जैसे कोई भीतर दबा हुआ पत्र
बार-बार पढ़ा जा रहा हो।
उसके तने पर एक पुराना घाव है..
मैं उसे छूता नहीं।
कुछ घावों को सहलाना
उन्हें फिर से खोल देना होता है।
मैंने जाना है—
पेड़ प्रेम नहीं जताते,
वे प्रेम को जीते हैं।
वे किसी के लौटने के लिए
दरवाज़ा नहीं खोलते,
बस अपनी जगह खड़े रहते हैं;
और लौटने वाला अगर न आए,
तो भी रास्ते पर
अपनी छाया छोड़ जाते हैं।
शायद इसी कारण
मुझे वह पेड़ तुमसे अधिक अपना लगता है…
तुमने मुझे चाहा नहीं,
उसने मुझे रोका नहीं;
फिर भी तुम दोनों की तरह
वह मेरे भीतर
एक ऐसी जगह उगा है
जिसे काटकर भी
मैं खाली नहीं कर सकता।
अब मेरा प्रेम भी
उस पेड़ की तरह है—
ऊपर से बिल्कुल शांत,
अंदर से जड़ों का
एक अंतहीन अँधेरा।
और उस अँधेरे में
आज भी एक छोटी-सी हरियाली है…
जिसे मैं प्रेम कहता हूँ,
और जिसे तुमने
कभी देखा ही नहीं।

५. नाव की तलाश

मुझे एक नाव की तलाश है
उस पार जाने के लिए नही ,
बल्कि मझधार में उतरने के लिए
उसकी गहराई को जानने के लिए ।
जहाँ मानवीय अज़ाब हैं
जो मानव को बंधनों – प्रथाओं के आगोश में जकड़ रखा है।
मैं इस जकड़न को तोड़ देना चाहता हूँ
जो उन्हें तार्किक होने से रोकती हैं
जो मानव-मानव में भेद करती हैं
जो मनुष्य होने से रोकती है
मैं इस गफ़लत को खत्म करना चाहता हूँ ।

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