दिन विशेष कहानी : “गहरे तालाब की विरासत” – अलका सिन्हा

Alkaa sinha

कविता की अंतिम पंक्ति तक आते-आते सारा रूपक स्पष्ट हो गया – “तेरा अपराधी हूँ मेरी कविता, जो लिखा उसे जी न सका।” मुझे महसूस हो रहा था, जैसे मेरे कलेजे पर कोई बड़ा-सा पत्थर रखा था जो इसे पढ़ने के बाद मोम की तरह पिघलता जा रहा था। मेरे भीतर का विद्रोह धीरे-धीरे विलीन होता जा रहा था। मैंने पत्रिका बंद कर रख दी। लगा, जैसे अपनी कविता के रूप में अवधेश जी स्वयं अपराधी की तरह खड़े हों, सर झुकाए, दोष स्वीकार कर, दंड भोगने को तैयार! मेरा आक्रोश शायद उन्हें ऐसी ही किसी स्थिति में देखने की चाह रखता था, मगर जब सचमुच उन्हें ऐसा देखा तो मन तड़प गया। बल्कि, पिछले दिनों उनके प्रति अपने कड़े रुख को लेकर मुझे खुद पर ग्लानि हुई और अनायास ही उनके प्रति सहानुभूति उमड़ आई, ”सिद्धांत के किये के लिए आप खुद को ज़िम्मेदार क्यों मानते हैं सर?”
जबकि सच तो यह था कि इस कविता को पढ़ने से पहले तक मैं भी अवधेश जी को ही सिद्धांत के किये का दोषी मान रही थी। जो हमेशा आदर्शों की बात करते रहे, अपनी कविताओं से देश की मिट्टी को माथे से लगाते रहे, सिद्धांत उसी मिट्टी को ठोकर मारकर विदेशी नागरिक स्टेला से ब्याह कर विदेश में जा बसा।
पिछले कुछ समय से मैं यह महसूस कर रही थी कि अवधेश जी मेरा सामना करने से कतराते थे जबकि पहले हमारे बीच बहुत-सी बातें होती थीं। उनके लिए मैं उनके पुत्र की मित्र भर नहीं थी और मेरे मन में भी उनके लिए अपार श्रद्धा थी। एक कारण तो यह था कि वे सिद्धांत के पिता थे, मगर उससे बड़ा कारण उनका स्वयं का व्यक्तित्व था, उनके आदर्श थे। वे हमारे कॉलेज में हिंदी के प्रोफ़ेसर थे। हालाँकि मैं उनसे कभी पढ़ी नहीं, मगर पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ बराबर पढ़ती रहती थी। उनकी रचनाओं को पढ़कर हरदम कुछ सीखने को मिलता था। मन उल्लास से भर उठता था कि जीवन ऐसे भी जिया जा सकता है। मेरे लिए वे आदर्श व्यक्ति थे, गरिमामय, मर्यादा-पुरुषोत्तम। वे या तो क्लास में पढ़ाते हुए दिखते, या फिर लाइब्रेरी में कुछ पढ़ते हुए। कॉलेज में अवधेश जी का इतना आदर था कि मैं सोचती, काश! मैंने भी हिंदी एक विषय रखा होता। मुझे याद है कि उनकी इतनी तारीफ सुनी थी कि एक बार मैं चुपके से उनकी क्लास में जाकर बैठ गई। किसी सन्दर्भ में वे राजा हरिश्चंद्र के बारे में बताने लगे। मैंने सत्यवादी हरिश्चंद्र की कहानी पहले भी सुनी थी, मगर बस एक कहानी की तरह। अवधेश जी के बताने में न जाने ऐसा क्या था कि मन उसे सच मान बैठा, “ऐसा भी हो सकता है क्या?” मैं हैरानी से बोल पड़ी।
“तुम तो इस क्लास की स्टूडेंट नहीं हो?” उनका ध्यान मेरी ओर आकर्षित हुआ।
मैं अर्थशास्त्र की स्टूडेंट थी। उन्होंने समझाया था कि इस तरह उनकी क्लास में आने पर मेरी अर्थशास्त्र की क्लासें छूटेंगी, जो ठीक नहीं है। उन्होंने ही मुझे खाली पीरियड में लाइब्रेरी में आने की छूट दी। फिर तो मैं अक्सर ही उनसे मिलने चली जाया करती। उनकी सलाह पर मैंने भगवतीचरण वर्मा की चित्रलेखा और धर्मवीर भारती की कनुप्रिया पढ़ी. धीरे-धीरे साहित्य की तरफ़ मेरा झुकाव बढ़ने लगा। अच्छे मार्गदर्शक का व्यक्तित्व के विकास में अमूल्य योगदान होता है। वे बहुत-से छात्रों के आदर्श थे, चाहे उन्होंने उन्हें सीधे-सीधे न भी पढ़ाया हो।

कॉलेज के बाद जीवन-संघर्ष में भी मैं जब-तब उनसे सलाह लेने चली जाया करती। उनका घर मेरे घर से नज़दीक ही था। उस छोटे-से घर की सादगी मुझे उनके व्यक्तित्व की तरह ही आकर्षित करती। सिद्धांत और अवधेश जी सोते तो एक ही कमरे में थे, मगर रहते अलग-अलग कमरों में। अवधेश जी या तो बगीचे में होते या फिर अपनी लाइब्रेरी में, जबकि सिद्धांत अक्सर अपना कमरा बंद कर म्यूजिक सुन रहा होता। हालाँकि, सिद्धांत अपने पिता की तरह नहीं था, फिर भी, मैं उसे अवधेश जी के रूप में ही देखना चाहती थी। अब लगता है कि कमी मेरे ही परखने में रही, वरना वह तो आजकल के लड़कों जैसा ही सामान्य लड़का था। उसकी विशेषता तो उसके पिता थे, जिस कारण उसने मेरे मन में एक विशेष स्थान हासिल कर लिया था। फिर भी, मैं यह हरगिज़ नहीं मानती कि मेरे लिए उसका प्रेम महज एक दिखावा था।
खैर! पत्रिका में प्रकाशित इस कविता को पढ़ने के बाद मैं उनके घर पूर्ववत जाने लगी। मगर उनके भीतर की वह ठसक अब गायब हो चुकी थी। आत्मविश्वास से भरी वह आवाज़ खोखली पड़ने लगी थी, जैसे कोई गहरा तालाब दिन-ब-दिन सूखता जा रहा हो.उनकी तबियत लगातार ख़राब रहने लगी थी, मगर वे अपने स्वास्थ्य के प्रति बेहद उदासीन थे। बल्कि यह कहना गलत नहीं होगा कि उनके आदर्श उन्हें आत्महत्या नहीं करने दे रहे थे और वे मजबूरी में अपने बाकी दिनों की सजा काट रहे थे।

“आप ठीक से अपना ट्रीटमेंट क्यों नहीं कराते,सर?”
“ठीक ही तो हूँ मैं।” मेरे प्रश्न के जवाब में बस ऐसी ही दृष्टि से उन्होंने मेरी ओर देखा था। मैंने पाया था कि वे कहीं भीतर से दरक गए थे।
“सर, आपने दवाई नहीं खाई?”मैंने नाराज़गी से पूछा।
वे होमवर्क न करके आने वाले विद्यार्थी की तरह देखने लगे।
“कहाँ है दवाई? अब से मैं खुद खिला कर जाया करुँगी।”
“अब बस! हो गया बेटी!” उन्होंने उसांस भरकर कहा तो मेरे भीतर की सारी झल्लाहट पिघल कर पानी हो गई।
“ऐसा क्यों कहते हैं सर?”
कब तक जियूँगा ऐसे, किसके लिए जिऊंगा,क्यों जिऊंगा — ऐसा वे नहीं कहते,मगर उनकी आँखें कहतीं। मैं बार-बार अनसुना करती, वे बार-बार कहतीं।

एक रोज़ वे कुछ बेचैनी-सी महसूस कर रहे थे। मैं उन्हें हड़बड़ाकर नजदीक के ‘वालिया नर्सिंग होम’ में ले गई। ईको टेस्ट की रिपोर्ट बहुत ठीक नहीं थी। डॉक्टर ने साफ़-साफ़ कह दिया ‘एंजोप्लास्टी’ करनी होगी। लगभग अस्सी हज़ार रुपये लगेंगे। पैसा जमाकर एडमिट करा दीजिये। हम घर लौट आए. रास्ते भर ख़ामोशी बनी रही। मैंने उन्हें एडमिट होने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहने को कहा तो वे हौले-से मुस्करा दिए। उनकी यह मुस्कराहट मुझे भीतर तक बींध गई। एक आदर्शवादी कवि, प्राध्यापक, अपनी सारी कमाई देर से पैदा हुई इकलौती संतान पर न्योछावर कर चुका था। इतने पैसे थे कहाँ उनके पास।
“मैं आज ही सिद्धांत को ई-मेल करती हूँ।” मैंने सुझाव दिया।
“सिद्धांत के पैसों से मेरा इलाज चले और मैं जियूं, ऐसी ज़िन्दगी नहीं चाहिए मुझे।”
मैंने देखा, उनके भीतर का तालाब आँखों की कोरों तक उमड़ आया था, मगर पल भर में ही सूख भी गया। भीतर कहीं बहुत शुष्कता थी। सारा जल समाहित हो गया, छलक तक नहीं पाया। मैंने ज़िन्दगी को बहुत प्रैक्टिकल तौर पर लिया था और इसीलिए जी भी पा रही थी मगर इस आदर्शवादी कवि का क्या करती। मुझसे पैसे वे लेंगे नहीं, मैं जानती थी, बेटे के कराये इलाज से मर जाना बेहतर समझते थे।
“सर, ज़िन्दगी के परचे में जो विकल्प दिए हैं, उन्ही में से तो कुछ चुनना होगा न?”
“चौथा विकल्प होता है न, इनमे से कोई नहीं,मैं उसी पर टिक करता हूँ।” वे हंसने लगे,खोखली हंसी। मैंने देखा सूखते तालाब में दरारें दिखने लगी थीं।

आखिर कुछ सोचकर मैंने अपने पी.एफ़. से एक लाख रुपये निकाले और अगले रोज़ अवधेश जी के हाथ पर रख दिए,
“सर,ये आपके पैसे हैं,अपने पैसे, अब खुले मन से अपना इलाज कराइए।”
“मेरे पैसे…?”वे हैरानी से मेरी ओर देख रहे थे।
“बैंक से लोन लिया है आपके नाम।”
“मुझे कोई क़र्ज़ क्यों देगा?”वे अपने आप में बुदबुदा रहे थे। मैं पूरी तैयारी के साथ गई थी,
“यह आपकी लाइब्रेरी है न, उसी को बंधक रख छोड़ा है,सर।” मैंने कुछ कागज़ उनके आगे रख दिए। वे अवाक रह गए,
“क्या कह रही हो?”
“यह लाइब्रेरी रहेगी आप ही के पास,”उनके आश्चर्य से मैं घबरा गई.लाइब्रेरी ही तो इनका जोड़ा-अर्जा है, इस पर इन की आत्मीयता सगे-सम्बन्धियों से बढ़कर थी।
“नहीं, नहीं,” तब तक वे संभल चुके थे। “मैं तो हैरान हूँ,कि क्या मेरी लाइब्रेरी बैंक के लिए भी इतनी कीमती है कि इस पर लोन उठाया जा सकता है?”
“आसानी से तो नहीं हुआ सर, फिर भी आपके आशीर्वाद से मैं उन्हें यह समझा पाई कि सोने-चांदी,मकान- दुकान से ज्यादा कीमती किताबें हैं।” मेरी बात से अवधेश जी के चेहरे पर रौनक आ गई,पर अगले ही पल अविश्वास से भरकर बोल पड़े,
“ऐसा कैसे संभव है? जिसका मूल्य मैं अपने बेटे को नहीं समझा पाया, उसे ये व्यापारी लोग कैसे समझ सकते हैं?” उनके चेहरे पर मायूसी की एक परत चढ़ गई।
“मैंने उन्हें याद दिलाया कि क्या हमने कभी सोचा था कि हल्दी और दालों पर भी इन्वेस्ट किया जा सकता है, मगर देखिये, आजकल घर बैठे हल्दी,मिर्ची और दाल-चावल तक पर इन्वेस्ट किया जा रहा है, फिर किताबों पर क्यों नहीं?”अवधेश जी हैरानी से मेरी ओर देख रहे थे,
“दाल-चावल…?”वे कुछ समझ नहीं पा रहे थे।
“जी सर! मैंने उन्हें मॉडर्न इन्वेस्टमेंट की जानकारी दी, जिसमे मोबाईल के जरिये प्याज-टमाटर तक पर इन्वेस्ट करके पैसे कमाए जा रहे हैं। मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि एक बार इन्वेस्टर्स का ध्यान इस तरफ़ चला जाए, फिर देखिये कितने लोग कूद पड़ेंगे किताबों पर पैसे लगाने को.बस,फिर क्या था, बैंक मैनेजर को मेरी बात क्लिक कर गई।” मेरी बात पर अवधेश जी बच्चों की तरह ताली बजाकर हंसने लगे,
“वाह बेटी,मुझे नाज़ है तुम पर. तुमने लिखे-पढ़े को सार्थक कर दिया।” मारे ख़ुशी के वे कुर्सी से उठ खड़े हुए,
“कल मैं नहीं रहूँगा, मगर यह परंपरा रहेगी…, उन पुस्तकों का मूल्य रहेगा,जिनसे हमारा जीवन मूल्यवान बना है…, कल को तराजू के एक पलड़े पर जेवर-जेवरात और मकान-दुकान के कागजात रखे होंगे, तो भी, दूसरी ओर किताबों का पलड़ा भारी पड़ेगा…” उनके चेहरे पर विजय का गर्व छलक रहा था, “अब मुझे इलाज की कोई ज़रूरत नहीं बेटी,मैं बिलकुल स्वस्थ हो गया,” उनकी आवाज़ में गहरी संतुष्टि थी।
“सुनो बिटिया, आज खीर खाने का मन कर रहा है।” वे बच्चों की तरह बोल पड़े।
“सेलिब्रेशन?” मैं हंस पड़ी। वे भी हंसने लगे।
“जानती हो, हमारे पिताजी त्योहारों के मौकों पर खीर बनवाया करते थे।” उनकी ऑंखें कहीं दूर देख रहीं थीं। “मैं बचपन में मीठा बहुत खाता था।” उनकी आवाज़ का उल्लास छलक पड़ रहा था। वे लगातार अपने बचपन की बातें बताते रहे। बताते रहे कि वे शुरू से ही बहुत जिद्दी थे। जो तय कर लेते थे,वही करते थे। “गाँव में छोटा स्कूल था, आगे की पढाई के लिए कम-से-कम आठ मील पैदल जाना पड़ता था। पिताजी चाहते थे कि मैं अपनी पढ़ाई का उपयोग कर मुखिया के घर बही संभालूं, मगर मेरी आँखों में कोई और ही सपना था।”
अवधेश जी अपने गाँव में बी.ए. तक की पढाई करने वाले पहले व्यक्ति थे। उनके पिताजी गर्व से छाती चौड़ी कर सबको बताया करते थे। इससे आगे भी पढाई होती है, इतना पिताजी नहीं समझते थे, वे तो चाहते थे कि अवधेश जी को अगर मुखिया के यहाँ नौकरी पसंद नहीं थी तो वे गाँव वालों के लिए वहीँ कोई बड़ा स्कूल खोल देते। मगर अवधेश जी और पढने की रट लगाए रहे। जब पिताजी हरगिज़ नहीं माने तब एक रोज़ मुंहअँधेरे वे घर से निकल गए। जाते हुए माँ को बता गए थे।
“पिताजी बहुत समय तक रुष्ट रहे मुझ पर, कॉलेज की नौकरी लगने पर भी उनकी नाराज़गी दूर नहीं हुई…” पल भर को ख़ामोशी-सी छा गई। मैं महसूस कर पा रही थी,पिता-पुत्र के बीच का अबोलापन, अजीब सी टूटन, मंजिल पा लेने के बाद भी बेचैनी…
“मगर माँ ने संभाल लिया,खीर बनाकर उत्सव मनाया और हम दोनों के बीच सुलह करा दी… कठिन से कठिन समय को भी माँ बड़ी सादगी से निभा देती थी।” उनकी आवाज़ में बड़ी तृप्ति थी।
“अब आप भी सिद्धांत से सुलह कर लीजिये सर।” मैंने खीर की प्लेट उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा तो लगा, जैसे वे अचानक ही किसी दूसरी दुनिया में जा पहुंचे हों। जैसे, गहरे तालाब में भंवर-सी उठने लगी हो… वे कुछ नहीं बोले, बस उठकर चल दिए, खीर वैसी ही पड़ी रही। सारा वातावरण बदल गया, अजीब-सी मुर्दनी छा गई. शायद मैंने अनाधिकार चेष्टा की थी।
“आज माँ होतीं, तो क्या अब तक सुलह न करा चुकी होतीं?” मैंने धीरे से कहा और भारी मन के साथ बाहर निकल आई।
घर पहुँच कर भी मन में उथल-पुथल बनी रही। सर के आगे किसी को बहस करने की हिम्मत नहीं थी, मैंने भी हमेशा उनसे सुना ही था, आज कैसे इतनी बड़ी बात बोल गई, मैं खुद नहीं जानती। बल्कि मैंने क्यों सिद्धांत की पैरवी की, यह भी नहीं जानती। तो क्या मैं सिद्धांत को माफ़ कर चुकी थी? शायद हाँ, या फिर मुझे महसूस हो रहा था कि अवधेश जी के कलेजे पर रखा बोझ, सिद्धांत को माफ़ किये बिना दूर नहीं किया जा सकता था। देर रात तक जगी रही। अवधेश जी के चेहरे का उल्लास और फिर अचानक आई तटस्थता आँखों में घूमती रही। न मालूम कब आँख लग गई। सपने में देखा कि भोर का समय है, पूरी तरह उजाला भी नहीं हुआ। गाँव की पगडंडियों से होकर मैं एक ऐसी जगह पहुंची हूँ जहाँ झिलमिलाते पानी का एक तालाब है… मैं रुक कर देख रही हूँ… तालाब की सतह पर चाँदी का वर्क लगा पानी… पता नहीं कैसे, मगर मुझे पता है कि इसमें स्नान कर, व्यक्ति हर तरह के दुःख – तकलीफ से बरी हो जाता है, वह शुद्ध हो जाता है, चाँदी की तरह स्वच्छ और शीतल…, मैं देख रही हूँ, वहाँ दूर, उस पार एक आदमी तालाब में उतर रहा है, धीरे-धीरे वह उसमें समाता जा रहा है, चाँदी बनता जा रहा है उसका शरीर… तालाब की सतह पर अब बस एक सफ़ेद चादर है जिस पर बिखरे हुए हैं गेंदे के कुछ पीले फूल…

“मैंने उसे माफ़ कर दिया बिटिया…, सुलह कर ली…” कोई आवाज़ मेरे कानों से टकराती है, “और सुनो, बैंक के पैसे वापस लौटा देना, इस लाइब्रेरी की कीमत बैंक वाले नहीं आंक सकेंगे। मुझे ख़ुशी है कि यह अनमोल विरासत मैं अपनी योग्य बेटी के नाम छोड़े जा रहा हूँ…” एक अदृश्य संवाद जिसे मैंने साफ़-साफ़ सुना।
मैं चौंक कर उठ गई। कोई मेरे पास था अभी, एकदम पास,मैंने उसे महसूस किया… मगर आँखों की परिधि में कोई दिखाई नहीं दिया। खिड़की के पार अँधेरा है अभी… घड़ी में चार बजकर दस मिनट हुए हैं।
सवेरा होने पर, मैं सीधा अवधेश जी के घर पहुंची। दरवाजा नहीं खुला तो,बगीचे वाले रास्ते से भीतर आई, खिड़की में हाथ डाल कर दरवाजा खोला, अवधेश जी अपनी लाइब्रेरी में आराम-कुर्सी पर लेटे थे। उनके चेहरे पर गहरी तृप्ति का भाव था।
मैंने उन्हें हिलाया तो कुर्सी पर टिका हाथ एक ओर झूल गया। कलाई पर बंधी उनकी घड़ी में चार बजकर दस मिनट हो रहे थे..!

(वागर्थ में प्रकाशित)

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