“दोहों की गहराई और छंदों की लय से सजी साहित्यिक दोपहर”

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हिन्दी राइटर्स गिल्ड कनाडा के तत्वावधान में 17 अक्टूबर, 2026 को ब्रैम्पटन की स्प्रिंगडेल ब्रांच लाइब्रेरी में ‘हिंदी साहित्य के दोहे और छंद’ विषय पर एक सरस साहित्यिक गोष्ठी आयोजित हुई। प्रतिष्ठित कवियों की स्वरचित रचनाओं और काव्य-पंक्तियों से सजे इस आयोजन में भक्ति, जीवन-दर्शन, मातृस्नेह और सामाजिक चेतना के विविध स्वर सुनाई दिए।

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जलपान के पश्चात कार्यक्रम के संचालक योगेश ममगाईं ने उपस्थित सभी साहित्यकारों एवं साहित्य प्रेमियों का सादर अभिनंदन करते हुए प्रतिभागियों से स्वरचित अथवा अपने प्रिय रचनाकारों के दोहे और छंद प्रस्तुत करने तथा अन्य कवियों की रचनाओं के साथ उनके नाम का उल्लेख करने का अनुरोध किया। प्रत्येक वक्ता के लिए छ: मिनट की समयसीमा निर्धारित की गई।
गिल्ड की संस्थापक निदेशक एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. शैलजा सक्सेना ने सभी का स्वागत करते हुए दोहा, सोरठा और कुंडलिया जैसे छंदों के विधान पर उपयोगी जानकारी दी। उन्होंने दोहे में मात्रा-गणना को लघु-गुरु के रूप में सरल ढंग से समझाया। गिरधर कविराय की प्रसिद्ध कुंडलिया ‘लाठी में गुन बहुत हैं…’ तथा तुलसीदास के दोहों के उदाहरणों से उन्होंने छंद के शिल्प और उसकी भाव-संपदा को स्पष्ट किया। इस आरंभिक चर्चा ने काव्य-पाठ के आस्वाद के साथ छंदों को समझने की सुंदर भूमिका भी तैयार की।
प्रस्तुतियों का शुभारंभ भुवनेश्वरी पांडेय ने शिव-स्तुति”नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्। और ‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः…’ के पाठ से किया। इंदिरा वर्मा ने “सदा न संग सहेलियाँ सदा न राजा देस वै
सदा न जग बिचि जीवनां सदा न कारे केस वै “जैसी जीवन की अनित्यता का बोध कराने वाली पंक्तियों तथा गोस्वामी तुलसीदास के सवैये से साहित्यिक परंपरा के रंग बिखेरे। सरस दरबारी ने अपने स्वरचित दोहों एवं छंदों में मानवीय प्रवृत्तियों पर विचार रखा। उनके दोहे—
“क्रोध लोभ मद मोहवश, दुखिया सब संसार।
दीमक से हैं चाटते, गले पड़े यह हार॥”
ने मनुष्य के भीतर पलते विकारों की ओर ध्यान खींचा। शूरवीर तोमर ने रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ‘रश्मिरथी’ के तृतीय सर्ग से कर्ण-संवाद का अंश प्रस्तुत कर कार्यक्रम में ओज का स्वर जोड़ा।
डॉ. शैलजा सक्सेना ने अपने काव्यपाठ में माँ के विविध रूपों और उसके स्नेह की ऊष्मा को दोहों के माध्यम से अभिव्यक्त किया। उनके स्वरचित माँ पर सुंदर दोहा “ माँ गर्मी में छाँव सी और सर्दी में धूप, माँ मलहम है चोट पर माँ के रूप अनेक”और “बातों की तलवार से , करते घायल लोग। हिंदी की बिंदी लगा यश का करते भोग॥“ जैसे दोहे में हिंदी के नाम पर यश अर्जित करने वालों पर करारा प्रहार भी किया। सुषमा रानी ने कबीर, रहीम एवं अन्य संत कवियों के दोहे सुनाए। ‘ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय…’ के माध्यम से मधुर वाणी का संदेश एक बार फिर सार्थक हुआ।
डॉ. बंदिता सिन्हा ने रहीम, हरिओम, बिहारी और कबीर आदि की रचनाओं से श्रोताओं को आनंदित किया। बिहारी के प्रसिद्ध दोहे “कनक-कनक तें सौ गुनी, मादकता अधिकाय।उहिं खाएँ बौराइ जग, इहिं पाएँ “ के माध्यम से बिहारी जी की शब्दों की अर्थ-छटा और दोहे की अभिव्यक्ति-क्षमता का सुंदर वर्णन किया।प्रियंका ने “सतगुरु मिले जु सब मिले, न तो मिला न कोय। माता-पिता सुत बाँधवा, ये तो घर-घर होय॥” से गुरु-महिमा का स्मरण कराया। आरजे कूल के नाम से परिचित कुलदीप ने कबीर के दोहे प्रस्तुत किए और कुछ दोहों जैसे “ बड़े बढ़ाई न करे ….” को गाकर गोष्ठी में सुरों की मिठास घोली।
संचालक योगेश ममगाईं ने सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री रामेश्वर दयाल काम्बोज ‘हिमांशु’ के दोहों का पाठ किया। “नेता ऐसा चाहिए, डाकू तक घबराय।
धुआँधार भाषण करे, ले सबको बहकाय॥” जिसमें राजनीतिक व्यंग्य का स्वर था और
“साँस-साँस में हो रहा, मुझको यह आभास।
सारे जग की सम्पदा, कविता मेरे पास॥” में कांबोज जी का कविता को जीवन की अनमोल निधि मानने का भाव मुखर हुआ।
पहली बार आयोजन में आए अभिषेक गुप्ता को परिचय देने के लिए आमंत्रित किया गया। उन्होंने परिचय के साथ अपनी कविता” उम्र अभी है केवल बारह, करने को है हमें काम बहुत सारा “ पढ़ कर सुनाई”, जिसमें बालमन और उस पर बढ़ती अपेक्षाओं की झलक थी। ब्रैम्पटन लाइब्रेरी की पदाधिकारी रमनीक ने भी आयोजन का आनंद लेने की बात कही।
गोष्ठी के अंतिम चरण में साहित्यिक आत्मीयता एक सुखद उत्सव में बदल गई। डॉ. बंदिता सिन्हा, निकिता के जन्मदिन के लिए सरप्राइज़ केक लेकर आई थीं। मंच पर केक काटने के निमंत्रण से निकिता सुखद आश्चर्य से भर उठीं और उपस्थित सभी लोगों ने उन्हें हार्दिक शुभकामनाएँ दीं।
अंत में गिल्ड की निदेशक डॉ. बंदिता सिन्हा ने जलपान की व्यवस्था के लिए पूनम ममगाईं, सहयोग के लिए लाइब्रेरी पदाधिकारी तथा सभी वक्ताओं और श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। दोहों की संक्षिप्तता में समाए गहन जीवन-सत्यों और छंदों की लयात्मक सुंदरता से सजा यह आयोजन सीखने, सुनने और साहित्यिक संबंधों को सहेजने का आत्मीय अवसर बना।

रिपोर्ट : योगेश ममगाईं

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