डी.ए.वी कॉलेज अमृतसर में ‘भारतीय ज्ञान परम्परा की संवाहक : नागरी लिपि’ विषय पर एक दिवसीय आभासी अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित

अमृतसर, 16 सितम्बर 2026: डीएवी कॉलेज, अमृतसर (पंजाब) के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग एवं IQAC द्वारा प्राचार्य डॉ. अमरदीप गुप्ता के निर्देशन में नागरी लिपि परिषद, नई दिल्ली के साथ हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के अंतर्गत Zoom Platform पर एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी का मुख्य विषय “भारतीय ज्ञान परम्परा की संवाहक : नागरी लिपि” रहा।

इस कार्यक्रम में अमेरिका, मारिशस, नीदरलैंड, त्रिनिदाद इत्यादि देशों सहित भारत के छतीसगढ़, बिजनौर, बिहार, इंदौर, उत्तराखंड, कश्मीर, दिल्ली बहुत से प्रदेशों के विद्वानों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने सहभागिता और प्रतिभागिता की। नागरी लिपि परिषद, नई दिल्ली के महामंत्री डॉ. हरिसिंह पाल के सानिध्य में कार्यक्रम की अध्यक्षता सेंट्रल विश्वविद्यालय, बठिंडा (पंजाब) के कुलाधिपति और प्रतिष्ठित प्रतिभा डॉ. जगबीर सिंह ने की। कार्यक्रम के आयोजक प्राचार्य डॉ. अमरदीप गुप्ता जी द्वारा वक्ताओं के सादर औपचारिक अभिनंदन किया और कहा कि नागरी लिपि न केवल भारत की साँस्कृतिक धरोहर है बल्कि यह वैश्विक स्तर पर भारतीय ज्ञान परम्परा को जोड़ने वालीं एक सशक्त कड़ी भी है। अमेरिका से भारतीय संस्कृति की संवाहक डॉ. मृदुल कीर्ति ने बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए नागरी लिपि की वैज्ञानिकता और भारतीय ज्ञान परंपरा में इसके ऐतिहासिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। डॉ. मृदुल कीर्ति ने कहा हिंदी भाषा देव भाषा संस्कृत से निःसृत है परंतु हिंदी की लिपि देवनागरी है। संक्रमण काल में हिंदी की सत्ता बनाए रखना एक चुनौती है, विशेष रूप से देवनागरी लिपि के प्रति एक प्रहरी की तरह सजग होना पड़ेगा क्योंकि लिपि के सहारे से ही अतीत का ज्ञान वर्तमान में प्रवेश और भविष्य को हिंदी का ज्ञान देते हैं। लिपिबद्ध ना हुए तो भाषा केवल बोली बन कर रह जाती हैं जो बोलने वाले के साथ चली भी जाती हैं। भाषा का स्वत्व और अस्तित्व प्रबल शक्ति रखता है।
नीदरलैंड्स से आए प्रसिद्ध कवि, लेखक, अनुवादक, संपादक एवं ‘साँझा संसार फाउंडेशन’ के अध्यक्ष डॉ. रामा तक्षक ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नागरी लिपि और हिन्दी भाषा के प्रसार पर अपने विचार साझा किए और। उन्होने कहा वैश्विक स्तर पर आध्यात्मिक पिपासा का शमन नागरी लिपि करती है। उन्होंने विदेशी चिंतकों इलियट, मैक्समुलर, आर्मस्ट्रांग की भारतीय भाषाओं और देवनागरी लिपि के प्रति लगाव, अध्ययन और श्रद्धा की जानकारी तार्किक रूप से दी। डॉ. रश्मि चौबे ने नागरी लिपि को परम्पराओं की तिजोरी बताया।
मॉरीशस से नागरी लिपि परिषद इकाई के संयोजक डॉ. सोमदत्त काशीनाथ विश्व हिंदी सचिवालय मारिशस और हिंदी स्पीकिंग इंडियंस समिति का नागरी लिपि प्रसार सरंक्षण में महत्वपूर्ण सक्रियता की जानकारी प्रदान की। नागरी लिपि परिषद नयी दिल्ली के महा मंत्री डॉ. हरिसिंह पाल जी ने अपने सानिध्य उद्बोधन में बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि नागरी लिपि के संवर्धन से तात्पर्य बाकी भारतीय भाषाओं के साथ स्पर्धा नहीं बल्कि उनमें संवाद पैदा करना है नयी पीढ़ी का अपनी लिपि और भाषा के साथ जुड़ना अनिवार्य है। कार्यक्रम में कॉलेज के विद्यार्थियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपने विचार रखे, जिनम वंशिका ने नागरी लिपि और भारतीय ज्ञान परम्परा ग्रंथो के साधारणीकरण पर प्रकाश डाला। रेशमा ने लिपि के उद्भव पर और अनीश ने गुरु शिष्य परम्परा के सशक्तिकरण में नागरी लिपि का महत्वपूर्ण योगदान पर विचार रखे। कार्यक्रम के अध्यक्ष कुलाधिपति प्रोफेसर डॉ. जगबीर सिंह भाषा विचारों को जन्म देती है तो लिपि विचारों को सुरक्षित रखती है। नागरी लिपि का आज तकनीक के साथ जुड़ना अनिवार्य है। नागरी लिपि का डिजिटल अवतार भारतीय परंपराओं को कालजयी बना रहा है। यह अध्ययन लिपि के संरक्षण और संवर्धन के नए आयाम स्थापित करेगा।
कार्यक्रम संयोजक: डॉ. किरण खन्ना अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग ने कार्यक्रम का सफ़ल संचालन किया सह-संयोजक: डॉ. जे. जे. मोहिंदरू (समन्वयक, IQAC) संगोष्ठी के अंत मे ने आए हुए सभी अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय अतिथियों, वक्ताओं तथा प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। डॉ. अतुला भास्कर, डॉ. संगीता, डॉ. अमित कुशवाहा, डॉ. मुदस्सर, प्रोफेसर सुरिन्दर कुमार, डॉ. साक्षी शर्मा, डॉ. सविता रामपाल, डॉ. ऋतु अरोरा, डॉ. गगनदीप रायजादा उपस्थित रहे।
