साहित्य संवाद में नीलिमा टिक्कू के साहित्यिक व्यक्तित्व और कहानी-कला पर हुई सार्थक चर्चा

‘वातायन’,गृहस्वामिनी, क्रिएटिव कल्चर और वैश्विक हिंदी परिवार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन कार्यक्रम ‘साहित्य संवाद’ में साहित्यकार नीलिमा टिक्कू के विविध साहित्यिक आयामों पर विस्तार से चर्चा हुई। नीलिमा टिक्कू कहानी, व्यंग्य, उपन्यास, लघुकथा और बाल साहित्य सहित अनेक विधाओं में सक्रिय हैं। उनके प्रकाशित साहित्य में कहानी-संग्रह, व्यंग्य-संग्रह, उपन्यास और बाल साहित्य की कृतियाँ शामिल हैं। वे साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्य समर्था’ का संपादन भी करती हैं। राजस्थान साहित्य अकादमी की सरस्वती सभा की सदस्य तथा ‘स्पंदन’ संस्थान की संयोजक एवं अध्यक्ष के रूप में भी वे साहित्यिक गतिविधियों से जुड़ी हुई हैं।
कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण नीलिमा टिक्कू द्वारा अपनी कहानी ‘चक्रव्यूह’ का प्रभावशाली वाचन रहा। उनके सधे हुए वाचन ने कहानी के कथ्य, पात्रों की मनःस्थितियों और घटनाक्रम को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। कहानी की मनोवैज्ञानिक गहराई, सहज भाषा और अंत तक बनी रहने वाली रोचकता ने श्रोताओं को विशेष रूप से प्रभावित किया। वाचन के पश्चात संवादकर्ता डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जो एक लेखक, आलोचक, अनुवादक, शिक्षाविद्, प्रसारक और ब्लॉगर हैं उनका व्यापक अनुभव और प्रश्नाकुल दृष्टि संवाद को अधिक जीवंत और अर्थपूर्ण बनाने में सहायक रही।
समीक्षक चंद्रकांता एवं डॉ. रेखा गुप्ता की साहित्यिक दृष्टि, अनुभव और विश्लेषण ने नीलिमा जी के साहित्य को आलोचनात्मक दृष्टि से समझने के नए संदर्भ प्रदान किए और उसके अंतर्निहित अर्थों को उद्घाटित किया। परिचर्चा के दौरान नीलिमा टिक्कू की कहानी के मनोवैज्ञानिक पक्ष, कथानक की रोचकता, रहस्य के निर्वाह, समकालीन जीवन, सामाजिक परिस्थितियों, मानवीय मनोविज्ञान और स्त्री-अनुभवों की अभिव्यक्ति और सहज भाषा पर विशेष चर्चा हुई। संवादी और समीक्षकों ने उनकी रचनात्मक दृष्टि और साहित्यिक अभिव्यक्ति के विभिन्न पहलुओं को रेखांकित किया।
कार्यक्रम को अपनी सहज, प्रभावी और गरिमामय संचालन शैली से सूत्रधार आचार्य राजेश कुमार ने समृद्ध किया। इस आयोजन की संकल्पना और उसे साकार वातायन यूरोप की संस्थापक और वातायनम् पत्रिका की संपादक एवं प्रसिद्ध साहित्यकार दिव्या माथुर ने किया। गृहस्वामिनी की संपादक अर्पणा संत सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा साहित्य केवल पुस्तक के पन्नों पर अंकित शब्द नहीं है; वह जीवन को देखने की दृष्टि, समय से संवाद करने का माध्यम और मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाला सेतु है। साहित्य संवाद वहीं सेतु है। तकनीकी सहयोग शिवि श्रीवास्तव और डॉ. मोहन बहुगुणा ने प्रदान किया।
पाठकों और साहित्यकारों की प्रतिक्रियाएँ
इस अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक आयोजन में जापान से पद्मश्री प्रो. तोमियो मिज़ोकामी, कनाडा से डॉ शैलजा सक्सेना,ब्रिटेन से तितिक्षा शाह,नीदरलैंड्स से डॉ. ऋतु शर्मा नन्नन तथा भारत से डॉ. जयशंकर यादव, शिशुपाल कुमार और डॉ. रश्मि वार्ष्णेय सहित अनेक साहित्यकार एवं साहित्यप्रेमी इस कार्यक्रम से जुड़े।
वंदना यादव ने कहानी को मनोवैज्ञानिक स्तर पर प्रभावशाली बताया, जबकि डॉ. शैलजा सक्सेना ने इसे एक अच्छी मनोवैज्ञानिक कहानी कहा। डॉ. ऋतु शर्मा ने कहानी की सरल, आम बोलचाल की भाषा और शुरू से अंत तक बने रहने वाले रहस्य की प्रशंसा की।
दिव्या माथुर ने कहानी की नाटकीय संभावनाओं को रेखांकित करते हुए कहा कि इस पर एक अच्छा नाटक बन सकता है। आभा सिंह ने संग्रह की कहानियों को सुंदर और सार्थक विचारों से युक्त बताते हुए नीलिमा जी के व्यंग्य लेखन की भी सराहना की। कनचना सक्सेना ने उन्हें बहुमुखी प्रतिभा की धनी और साहित्य के क्षेत्र में एक सशक्त हस्ताक्षर बताया। वहीं, आशा बर्मन (कनाडा) ने कहानी और उसके वाचन को अत्यंत सुंदर कहा। टीना साहनी, भाग्यम शर्मा, रेणु माथुर, शोभा गोयल और सुषमा शर्मा सहित अन्य साहित्यप्रेमियों ने भी नीलिमा जी के साहित्यिक योगदान की प्रशंसा करते हुए उन्हें बधाई दी।
अगला संवाद प्रो. अल्पना मिश्र से 7 नवंबर को रात आठ बजे भारतीय समयानुसार होगी जिसमें प्रो अनामिका, विवेक मिश्र और रेखा राजवंशी शामिल होंगी। सभी से अनुरोध है कृपया अवश्य जुड़े और प्रो. अल्पना मिश्र से संवाद का हिस्सा बनें।
