युवाओं और भाषा के बीच सेतु : प्रतियोगिता का आयोजन एवं दिशा विषयक ऑनलाइन संगोष्ठी आयोजित

18 अक्टूबर, 2026 को केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन-यूके तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार के साप्ताहिक कार्यक्रम के अंतर्गत ‘युवाओं और भाषा के बीच सेतु : प्रतियोगिता का आयोजन एवं दिशा’ विषय पर ऑनलाइन संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम का स्वागत लेखिका स्वरांगी साने ने किया। कार्यक्रम में भाषा, युवा पीढ़ी, भारतीय संस्कृति तथा हिंदी के प्रचार-प्रसार में प्रतियोगिताओं और आधुनिक तकनीक की भूमिका पर विचार-विमर्श हुआ।

अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. मंजूनाथ एन. अंबिक, कुलसचिव, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा आयोजित प्रतियोगिता की सराहना करते हुए कहा कि हिंदी विभिन्न भारतीय भाषाओं और संस्कृतियों के बीच एक सशक्त सेतु है। उन्होंने लगभग नौ हजार युवाओं की सहभागिता को उत्साहजनक बताते हुए कहा कि ऐसे आयोजन युवाओं को भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने के साथ राष्ट्रीय एकता को भी सुदृढ़ करते हैं। उन्होंने भविष्य में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की ओर से ऐसे आयोजनों में सहयोग देने का आश्वासन दिया।
विशिष्ट अतिथि डॉ. विनोद कुमार मिश्र, पूर्व महासचिव, विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस ने कहा कि भाषा हमारी पहचान, संस्कृति और विचारों की आधारशिला है। युवाओं को हिंदी एवं भारतीय भाषाओं से जोड़ने में प्रतियोगिताएँ और आधुनिक तकनीक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे आयोजन युवाओं के ज्ञान, शब्द-भंडार, रचनात्मकता और आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं। उन्होंने कहा कि प्रतियोगिता में केवल जीतना ही नहीं, बल्कि सहभागिता और सीखने की भावना भी महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ऐसी पहलें हिंदी और भारतीय भाषाओं के उज्ज्वल भविष्य को सुनिश्चित करने में सहायक होंगी।
सन्निधि वक्तव्य में कवि-लेखक एवं वैश्विक हिंदी परिवार के संस्थापक श्री अनिल शर्मा ‘जोशी’ ने कहा कि प्रतियोगिता का उद्देश्य केवल पुरस्कार देना नहीं, बल्कि युवाओं को हिंदी, भारतीय भाषाओं, साहित्य और संस्कृति से जोड़ना है। उन्होंने इस वर्ष प्रतियोगिता में हजारों युवाओं की सहभागिता को उत्साहजनक बताया। उन्होंने भविष्य में प्रतियोगिता के दूसरे चरण के आयोजन तथा युवाओं को निरंतर साहित्यिक और भाषायी गतिविधियों से जोड़ने की योजना पर प्रकाश डाला। उन्होंने सभी सहयोगियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि तकनीक के माध्यम से युवा पीढ़ी में भाषा के प्रति रुचि और सांस्कृतिक चेतना का विस्तार किया जा सकता है।
विशिष्ट वक्तव्य में बाबासाहेब आंबेडकर एजुकेशन यूनिवर्सिटी की पूर्व कुलपति एवं लेखिका डॉ. सोमा बंद्योपाध्याय ने प्रतियोगिता की उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए युवाओं को हिंदी और भारतीय भाषाओं से जोड़ने की पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन युवाओं की भाषायी समझ, ज्ञान और सांस्कृतिक चेतना विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने भविष्य में भी इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करने तथा अधिकाधिक युवाओं को भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति से जोड़ने पर बल दिया।
तकनीकी विशेषज्ञ एवं अमेजन, नीदरलैंड से जुड़े श्री मनीष पाण्डेय ‘मनु’ ने प्रतियोगिता के तकनीकी पक्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक के प्रभावी उपयोग से देशभर के युवाओं को एक साझा मंच पर जोड़ना संभव हुआ। उन्होंने ऑनलाइन पंजीकरण, प्रश्नोत्तरी के संचालन और परिणामों की प्रक्रिया में तकनीकी सहयोग के महत्त्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि तकनीक और भाषा का समन्वय युवाओं को हिंदी एवं भारतीय भाषाओं से जोड़ने तथा उनकी सहभागिता बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
अनुवादक एवं भाषाकर्मी सुश्री नर्मदा कुमारी ने प्रतियोगिता के आयोजन और संयोजन में युवाओं की सक्रिय भागीदारी को महत्त्वपूर्ण बताते हुए कहा कि ऐसी पहलें हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रति रुचि बढ़ाने का प्रभावी माध्यम हैं। उन्होंने प्रतियोगिता के आगामी चरणों की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए युवाओं को भाषा, साहित्य और संस्कृति से निरंतर जोड़ने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन युवाओं की भाषायी समझ विकसित करने और उन्हें भारतीय भाषाओं की समृद्ध विरासत से परिचित कराने में सहायक हैं।
विमर्श सत्र में सेवानिवृत्त सहायक महाप्रबंधक, तेलंगाना, डॉ. वेंकटेश्वर राव ने कहा कि भाषा-केंद्रित प्रतियोगिताएँ युवाओं की प्रतिभा पहचानने और उन्हें हिंदी तथा भारतीय भाषाओं से जोड़ने का प्रभावी माध्यम हैं। उन्होंने युवाओं में हिंदी के प्रति जागरूकता बढ़ाने, अभिभावकों और शिक्षकों को प्रोत्साहित करने तथा हिंदी के अध्ययन से जुड़े रोजगार के अवसरों की जानकारी देने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि अनुवाद और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भी हिंदी के जानकार युवाओं के लिए अनेक संभावनाएँ हैं।
डॉ. रमाकांत राय, सह-आचार्य, हिंदी विभाग, पंचायत राज राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटावा, उत्तर प्रदेश ने कहा कि वैश्विक हिंदी परिवार भाषा और युवाओं के बीच सेतु का कार्य कर रहा है। आधुनिक तकनीक और बदलती जीवनशैली के कारण युवा अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने भारतेंदु हरिश्चंद्र के विचारों का उल्लेख करते हुए अपनी भाषा में संवाद, लेखन और साहित्य-सृजन को प्राथमिकता देने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हिंदी के माध्यम से युवाओं को भारतीय संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से जोड़ना आवश्यक है। उन्होंने प्राचीन साहित्य के संरक्षण, नए साहित्य के सृजन और युवाओं को अपनी भाषा में अभिव्यक्ति के लिए प्रोत्साहित करने का आह्वान किया।
मणिपुर विश्वविद्यालय, इम्फाल की प्रो. कंचन शर्मा ने प्रतियोगिता के आयोजन की सराहना करते हुए बताया कि मणिपुर के विद्यार्थियों ने नेटवर्क संबंधी कठिनाइयों के बावजूद उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रतियोगिता के प्रश्न हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति, इतिहास और सामान्य ज्ञान की दृष्टि से उपयोगी रहे तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भी सहायक हो सकते हैं। प्रमाण-पत्र प्राप्त होने से विद्यार्थियों में विशेष उत्साह देखा गया। उन्होंने निबंध, कविता और अन्य रचनात्मक प्रतियोगिताएँ आयोजित करने का सुझाव दिया तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र की नेटवर्क और आर्थिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए भविष्य के आयोजनों की योजना बनाने का आग्रह किया।
वैश्विक हिंदी परिवार की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष श्री ऋषि कुमार शर्मा ने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान का आधार है। युवा जब अपनी भाषा से जुड़ते हैं, तो संस्कृति का भविष्य सुरक्षित होता है। उन्होंने बताया कि प्रतियोगिता में प्रतिभागियों की संख्या पिछले वर्ष लगभग पाँच हजार से बढ़कर इस वर्ष नौ हजार के आसपास पहुँचना एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। प्रतियोगिता का उद्देश्य केवल हिंदी का ज्ञान परखना नहीं, बल्कि युवाओं में भाषिक दक्षता, आत्मविश्वास और अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान विकसित करना भी था। उन्होंने कहा कि प्रतिभागियों को केवल प्रतियोगिता तक सीमित न रखकर अच्छे पाठक, लेखक, वक्ता और अनुवादक के रूप में विकसित करना आवश्यक है। उनके अनुसार, प्रतियोगिता की वास्तविक सफलता पुरस्कारों या प्रतिभागियों की संख्या में नहीं, बल्कि हिंदी से जीवनभर जुड़े रहने वाले युवाओं की संख्या में निहित है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अनुवाद अधिकारी डॉ. शिवम शर्मा ने हिंदी भाषी क्षेत्रों में प्रतियोगिता के संयोजन से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि युवा भाषा का उपयोग दैनिक जीवन, प्रतियोगी परीक्षाओं, शिक्षण और सोशल मीडिया जैसे विभिन्न क्षेत्रों में करना चाहते हैं। प्रतियोगिता के माध्यम से ऐसे अनेक युवा सामने आए, जो हिंदी को अपने अध्ययन और करियर का माध्यम बनाना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि आयोजन में लगभग 100 से 150 लोगों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग किया तथा लगभग दस हजार युवाओं ने पंजीकरण कराया। उन्होंने भविष्य में प्रतियोगी परीक्षाओं, कविता-गोष्ठियों और अन्य भाषायी गतिविधियों के आयोजन पर बल दिया, ताकि अधिकाधिक युवा हिंदी से जुड़ सकें।
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर की शोधार्थी प्रीति साहू ने कहा कि भाषा हमारी विरासत, विचार और भविष्य के निर्माण का आधार है। युवाओं को हिंदी से जोड़ने के लिए भाषा को उनके भविष्य और अवसरों से जोड़ना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि युवाओं को केवल हिंदी का संरक्षक नहीं, बल्कि उसका सृजनकर्ता बनाना होगा। भाषा का भविष्य नारों से नहीं, नवाचार से बनता है और उसका सम्मान सृजन के माध्यम से बढ़ता है। ऐसी हिंदी का विकास होना चाहिए, जो परंपरा से जुड़ी, आधुनिकता से समृद्ध और विश्व से संवाद करने में सक्षम हो। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जब युवा अपनी भाषा में भविष्य के सपने देखने लगेंगे, तब हिंदी केवल जीवित ही नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य का नेतृत्व भी करेगी।
कार्यक्रम का प्रभावी संचालन डॉ. गंगाधर वानोडे, सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं क्षेत्रीय निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद केंद्र ने किया। अंत में डॉ. किरण खन्ना ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। संगोष्ठी में वक्ताओं ने एकमत से युवाओं को हिंदी एवं भारतीय भाषाओं से जोड़ने, तकनीक के सार्थक उपयोग तथा भाषा-साहित्य संबंधी गतिविधियों को निरंतर आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।
रिपोर्ट : अजय शर्मा
