“कुमार गंधर्व के जीवन को पढ़ने का अनूठा प्रयोग” : स्वरांगी साने

शरद पूर्णिमा अभी बीती ही थी। सांझ के झुरमुट को चाँद का आलोक प्रकाशित कर रहा था। पुणे के श्रीराम लागू रंग-अवकाश सभागार में कुमार गंधर्व के व्यक्तित्व और उनकी सांगीतिक यात्रा पर आधारित एक कार्यक्रम था। पर बात केवल इतनी ही नहीं थी। उनके जीवन-चरित को बिटवीन द लाइन्स की तरह पढ़ा गया। यह एक नया प्रयोग था, इसलिए श्रोताओं को अंदाजा नहीं था कि कुमारजी के जीवन के सारे सुख और सारे दुःख भी सामने आने वाले हैं। वे ‘शोक’ नाम से क्यों लिखते थे, उस शोकांतिका का भी जिक्र होना था। ‘कुमार गंधर्व : एक दृष्टिकोण—घटित एवं रचित’ पुस्तक के अंशों का अभिवाचन किया गया। कार्यक्रम की समाप्ति पर मंच से पुस्तक के लेखक विनय हर्डीकर ने कहा कि श्रोताओं की इतनी बड़ी संख्या कुमारजी के चाहने वालों की है। उनका कहना सही भी था, क्योंकि मराठी के गढ़ कहे जाने वाले पुणे के ठेठ देसी इलाके में कुमारजी पर हिंदी में कार्यक्रम हो रहा था, जिसमें निर्गुण कबीर भी थे और मालवा की मिठास भी। फिर भी बड़ी संख्या में लोग जमा थे। न शास्त्रीय संगीत की गूढ़ता उन्हें बाँधने में बाधक थी, न ‘बेगा-बेगा’ जैसे ठेठ शब्द आड़े आ रहे थे। सोमवार की उस शाम सात बजे यह प्रयोग होना था। सात बजकर दस मिनट के आसपास कार्यक्रम शुरू हो भी गया। सभागार खचाखच भरा था। स्थिति यह थी कि कई लोग आगे दरियों पर बैठ गए थे और कई खड़े-खड़े सुनते रहे। वे कुमार गंधर्व, संगीत, निर्गुण और कबीर को गुनते रहे। उनके जन्म से लेकर रामू भैया दाते के साथ हुई मुलाकातों और ‘उड़ जाएगा हंस अकेला’ की तरह देवास की धरती से अकेले ही इस दुनिया से विदा होने तक की यात्रा का अभिवाचन में समावेश था।

अभिवाचन की परंपरा महाराष्ट्र में गहरी है। इसे हिंदी में ‘कहन’ या ‘वाचन’ के रूप में समझ सकते हैं। किसी नाटक या पुस्तक का नाटकीय पाठ जब एक या कुछ लोग मिलकर करते हैं, तो उसे अभिवाचन कहते हैं। सुव्रत मंच पर कुमार गंधर्व के जीवन को पढ़ रहे थे। निर्देशन, रंग-निर्मिति, साउंड और विजुअल डिजाइन की जिम्मेदारी संदीप देशपांडे ने संभाली थी। संदीप ने संवाददाता को बताया कि उन्होंने कुमार गंधर्व के कई दुर्लभ रिकॉर्ड जुटाएँ। कई पुराने रिकॉर्ड की गुणवत्ता अच्छी नहीं थीं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। कुमारजी द्वारा गाए पद ‘अवधूता गगन घटा’ की तरह उनके जन्म-वर्ष 1924 से लेकर मृत्यु-वर्ष 1992 तक के कालखंड को एक-डेढ़ घंटे में समेटना मानो पूरे गगन को समेटने जैसा था। इसके लिए दृश्य-श्रव्य माध्यम, संगीत और दृश्यों का समायोजन अर्णित रत्नमाला जोशी और सारंग करंदीकर ने भी उतनी ही मेहनत से किया।
कुछ देर तक मंच पर वाचन होता और फिर कुमारजी के कुछ प्रसिद्ध पद तथा उनकी चर्चित रचनाएँ सुनाई जातीं। सभागार के अँधेरे को चीरती उनकी वाणी को दृश्य-श्रव्य माध्यम से सुनना एकांत में अपने भीतर उतरने और स्वयं को पाने जैसा अनुभव दे रहा था। प्रकाश-योजना गौरव जोशी की थी। इस प्रस्तुति के निर्माण में लगने वाले आर्थिक व्यय, समय और धैर्य से जुड़े दायित्व अनिल घेरडे और निखिल चिंचकर ने संभाले। निर्माण-प्रबंधन की जिम्मेदारी मुक्ता गोडबोले ने उठाई। दर्शकों में दाद देने वालों में मराठी की जानी-मानी अभिनेत्री शुभांगी गोखले भी शामिल थीं।
कर्नाटक के छोटे-से गाँव सुलेभावी में शिवपुत्र सिद्धरामय्या के नाम से उनका जन्म हुआ। उन्हें न मराठी आती थी, न हिंदी। उन्होंने कोई विधिवत स्कूली शिक्षा भी नहीं ली थी। मुंबई के देवधर स्कूल में वे शिक्षक अवश्य थे, क्योंकि वे तानसेन से पहले कानसेन थे। अपने गुरु बी. आर. देवधर से उन्होंने जो सीखा, उसमें अधिकतर सुनकर सीखा था। सुनने की यही कला उनके काम आई, जब डॉक्टरों ने उन्हें सात साल तक गाने से मना कर दिया था। तब वे मालवा में रच-बस गए थे। वहाँ वे लोगों को सुनते—फेरीवालों से लेकर मंदिरों में भजन गाने वालों तक, खेतों में काम करते हुए गाती महिलाओं से लेकर चिड़ियों के कलरव तक। जितना वे सुनते गए, उतना ही स्वयं को तैयार करते गए।
वे किसी परंपरागत घराने के गायक नहीं थे। लोकसंगीत और मालवा के संगीत को उन्होंने अपनी गायकी में पिरोया और कबीर की निर्गुणता को स्वराकार दिया। उनकी गायकी की एक विशेषता थी—वे गोलाकार गाते थे, यानी स्वर-वलय को पूरा करते हुए आगे बढ़ते थे। टप्पे गाते हुए उसका हर शब्द और हर भाव वे श्रोताओं तक पहुँचाते थे। केवल रियाज़ और अपनी तैयारी दिखाना उनका मकसद नहीं था; साहित्य को श्रोताओं तक पहुँचाना भी उनका लक्ष्य था। इसीलिए वे गाते थे—‘अवधूता, कुदरत की गति न्यारी’ और छाती ठोंककर कबीर का पद गाते थे—‘निर्भय निर्गुण गुण गाऊँगा।’ तब भी वे कहते थे, “मैं कुछ खास करता नहीं, यही मेरी खासियत है।”
