दिव्या माथुर : ” कलाइडोस्कोप ” पुस्तक समीक्षा

हाल ही में मैंने वरिष्ठ लेखिका दिव्या माथुर जी की पुस्तक ‘कलाइडोस्कोप’ पढ़ी। यह उनकी सतरंगी स्मृतियों का ऐसा संकलन है, जिसमें जीवन के विविध रंग बेहद संवेदनशीलता के साथ उभरकर सामने आते हैं – कभी स्याह तो कभी उजले। इन संस्मरणों में जीवन के उतार-चढ़ाव को जिस भावपूर्ण भाषा में व्यक्त किया गया है, वह अंदर तक स्पर्श करती है।
जीवनी लिखना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, और संस्मरण लिखना भी अधिक कठिन। क्योंकि इसमें व्यक्ति को अपने जीवन के सच से दोबारा रूबरू होना पड़ता है उन्हें फिर से जीना, समझना और शब्दों में ढालना होता है। कई बार यह प्रक्रिया विचारों को जकड़ लेती है और आगे बढ़ने से रोकती है। लेकिन ‘कलाइडोस्कोप’ के संस्मरणों में एक अद्भुत साहस दिखाई देता है जीवन को स्वीकारने और उसे पूरी गरिमा के साथ जीने का सलीका भी।
इस पुस्तक में एक ऐसी सकारात्मकता झलकती है, जो निराशा के गहन क्षणों में भी आशा की किरण खोज लेती है। जब लगता है कि सब कुछ समाप्त हो रहा है, तब कहीं न कहीं से एक नई रोशनी जीवन में प्रवेश कर जाती है। परदेस की धरती पर अपनापन मिलना, संघर्षों के बीच सहारा बन जाना ये सभी अनुभव जीवन के प्रति एक दृढ़ और सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।
यात्राएँ भी इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण आयाम हैं। यहाँ यात्रा केवल घूमने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा को स्पर्श करने वाली एक गहन अनुभूति बन जाती है जो हमें जीना सिखाती है, समझना सिखाती है।

कुछ दिन पहले प्रभा खेतान फाउंडेशन की ‘कलम’ श्रृंखला में जयपुर में उन्हें सुनने का अवसर मिला था, वहीं से यह पुस्तक भी प्राप्त हुई। श्री दुर्गा प्रसाद जी अग्रवाल जी के साथ उनके साक्षात्कार को सुनते हुए ऐसा महसूस हो रहा था मानो स्वयं अनुभव ही संवाद कर रहा हो इतनी सहजता, इतनी गहराई।
निस्संदेह, ‘कलाइडोस्कोप’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों का वह सार है, जो पाठक को सोचने, महसूस करने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

समीक्षा :- अंशु हर्ष

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