प्रवासी से संवाद : कुसुम नैपसिक सम्मान एवं पुस्तक विमोचन कार्यक्रम संपन्न

नई दिल्ली, 25 जुलाई 2026। वैश्विक हिंदी परिवार एवं अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद के संयुक्त तत्वावधान में “प्रवासी से संवाद : कुसुम नैपसिक सम्मान एवं पुस्तक विमोचन” विषय पर एक महत्वपूर्ण एवं गरिमामय कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश-विदेश के विद्वानों, शिक्षकों, साहित्यकारों तथा हिंदी प्रेमियों की उल्लेखनीय सहभागिता रही। कार्यक्रम का शुभारंभ शिवम शर्मा (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) के स्वागत उद्बोधन से हुआ। उन्होंने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का औपचारिक स्वागत किया। इसके उपरांत अतिथियों का अंगवस्त्र भेंट कर सम्मान किया गया। अध्यक्षीय वक्तव्य में श्याम परांडे (महासचिव, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद) ने भारतीय संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत की सांस्कृतिक धारा निरंतर प्रवाहित होती रही है। उन्होंने कहा कि हिंदी के माध्यम से भारतीय संस्कृति और मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाना समय की आवश्यकता है तथा विद्वानों के अनुभवों का लाभ समाज को मिलना चाहिए। कार्यक्रम की मुख्य वक्ता एवं सम्मानित अतिथि कुसुम नैपसिक (वरिष्ठ हिंदी प्राध्यापिका, ड्यूक विश्वविद्यालय, अमेरिका) ने अपने प्रेरक वक्तव्य में अमेरिका में हिंदी शिक्षण के लगभग 22 वर्षों के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि विदेशों में हिंदी और संस्कृत पढ़ाने के दौरान अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, किंतु भारतीय भाषा और संस्कृति के प्रति बढ़ती रुचि अत्यंत उत्साहवर्धक है। उन्होंने अपनी पुस्तक के माध्यम से हिंदी के मुहावरों और लोकोक्तियों की उत्पत्ति, उनके वास्तविक अर्थ तथा उनसे जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया है। उन्होंने उदाहरण स्वरूप “बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद” जैसे मुहावरों की व्याख्या करते हुए उनके सांस्कृतिक संदर्भों पर भी प्रकाश डाला। साथ ही उन्होंने कहा कि नाटक जैसी विधाओं के माध्यम से हिंदी का प्रभावी प्रचार-प्रसार किया जा सकता है। डॉ. हर्षबाला शर्मा (प्राध्यापिका, हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने “प्रवासी से संवाद” की अवधारणा को भावनात्मक दृष्टि से व्याख्यायित करते हुए कहा कि प्रवास केवल भौगोलिक दूरी नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने का भाव भी है। उन्होंने कुसुम नैपसिक के लेखन कौशल, कार्यशालाओं तथा हिंदी शिक्षण में उनके अभिनव प्रयोगों की सराहना की। उन्होंने कहा कि उनके लेखन में भाषा, संस्कृति और संवेदनशीलता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। सानिध्य वक्तव्य में नारायण कुमार (मानक निदेशक, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद) ने डायस्पोरा की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारतीयता और भारतीय भाषाओं से जुड़ाव के कारण विदेशों में हिंदी का प्रभाव निरंतर बढ़ रहा है। उन्होंने मुहावरों और संबंधसूचक शब्दों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को रेखांकित करते हुए कहा कि मुहावरों का जन्म लोकजीवन और विशेष रूप से गाँवों की संस्कृति से हुआ है। उन्होंने प्रवासी साहित्य एवं भाषाई विरासत के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।

इसके पश्चात ऋषि कुमार शर्मा (अध्यक्ष, वैश्विक हिंदी परिवार, दिल्ली इकाई) ने कुसुम नैपसिक की पुस्तक “स्टाइल से हिंदी बोलें” की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह पुस्तक मुहावरों और कहावतों को सरल, रोचक तथा व्यावहारिक ढंग से प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा कि विदेश में रहते हुए हिंदी का दीप प्रज्ज्वलित रखना अपने आप में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। साथ ही उन्होंने खेल-खेल में हिंदी सीखने जैसी नई शिक्षण पद्धतियों की भी चर्चा की। डॉ. ओम प्रकाश (सहायक आचार्य, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने अपने वक्तव्य में मुहावरों और लोकोक्तियों के भाषिक एवं सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने विदेशों में हिंदी शिक्षण की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुसुम नैपसिक का कार्य हिंदी के वैश्विक विस्तार में अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान है। सुप्रसिद्ध लेखिका अलका सिन्हा ने कहा कि “प्रवासी से संवाद” वास्तव में भावनात्मक जुड़ाव का एक सशक्त सेतु है। उन्होंने मुहावरों एवं लोकोक्तियों के संतुलित और संदर्भानुकूल प्रयोग की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भाषा की समृद्धि उसके लोकजीवन से जुड़े रहने में निहित है। आभासी माध्यम से जुड़े अनिल शर्मा जोशी (अध्यक्ष, वैश्विक हिंदी परिवार) ने कहा कि आज कहावतों और मुहावरों का बोलचाल में प्रयोग तो होता है, किंतु उन्हें लिखित रूप में सुरक्षित करने की प्रवृत्ति कम होती जा रही है। उन्होंने इस चुनौती की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि विदेशों में अनेक विद्यार्थी हिंदी और संस्कृत के अध्ययन में रुचि ले रहे हैं तथा भारतीय भाषाओं के वैश्विक विकास में भारतीय प्रवासी समुदाय की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कार्यक्रम के दौरान आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में प्रतिभागियों ने मुहावरों की गहराई, उनके विस्तार, बच्चों को मुहावरे सिखाने की चुनौतियों तथा भारतीय फिल्मों, गीतों एवं लोकगीतों के माध्यम से भाषा शिक्षण की भूमिका से संबंधित प्रश्न पूछे। इन सभी प्रश्नों का उत्तर कुसुम नैपसिक ने अत्यंत सरल, रोचक एवं उदाहरणों सहित दिया। उन्होंने “मेरा जूता है जापानी” सहित अनेक लोकप्रिय गीतों एवं सांस्कृतिक संदर्भों के माध्यम से भाषा शिक्षण की उपयोगिता को स्पष्ट किया। कार्यक्रम के अंत में मनोज श्रीवास्तव ने सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए औपचारिक धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का सफल संचालन शिव कुमार निगम (सचिव, वैश्विक हिंदी परिवार, दिल्ली इकाई) ने प्रभावी एवं गरिमापूर्ण ढंग से किया।
रिपोर्ट :— अजय शर्मा
