साहित्य संवाद : गंगाराम राजी के साहित्य पर सार्थक विमर्श

सरल भाषा, भोगे हुए यथार्थ और जीवन-संघर्ष के रचनाकार के रूप में उभरी राजी की साहित्यिक छवि
15 अगस्त 2026, झाँसी। वातायन-यूरोप द्वारा गृहस्वामिनी पत्रिका, क्रिएटिव कल्चर और वैश्विक हिंदी परिवार के सहयोग से ‘साहित्य संवाद : गंगाराम राजी’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठ एवं पुरस्कृत लेखक, सेवानिवृत्त प्राध्यापक तथा लगभग चार सौ कहानियों और सत्रह उपन्यासों के रचयिता डॉ. गंगाराम राजी के साहित्य और रचनात्मक व्यक्तित्व पर सार्थक चर्चा हुई।
डॉ. राजी को उनके उपन्यास ‘एक थी रानी खैरीगढ़ी’ के लिए हिमाचल अकादमी तथा ‘भैरों कभी नहीं मरा’ के लिए भारतीय वाङ्मय पीठ, कोलकाता सहित अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. राजी के कहानी-पाठ ‘कबूतर’ से हुआ। इसके बाद प्रियंवदा पाण्डेय ने उनका संक्षिप्त साक्षात्कार लिया। साक्षात्कार के दौरान राजी जी ने अपने लेखन, बदलते सामाजिक परिवेश, जीवनानुभवों और रचनात्मक ऊर्जा से जुड़े अनेक प्रश्नों के सहज और आत्मीय उत्तर दिए।
वर्तमान समय में आए बदलावों के संबंध में पूछे गए प्रश्न पर उन्होंने कहा कि विज्ञान ने भले ही उल्लेखनीय प्रगति की हो, लेकिन समाज में पहले जैसा अपनत्व और पारस्परिक सहयोग कम हुआ है। उन्होंने पुराने समय की शादियों और सामाजिक जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले रिश्तेदार, पड़ोसी और परिचित स्वेच्छा से सहयोग करते थे तथा बीमारी में एक-दूसरे के साथ खड़े होते थे, जबकि आज जीवनशैली अधिक औपचारिक और संवेदनात्मक रूप से कुछ दूर होती जा रही है।
इस उम्र में भी निरंतर लेखन करने के रहस्य पर राजी जी ने बताया कि उनके साथी उन्हें लिखने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। वे प्रतिदिन लगभग चार पृष्ठ लिखते हैं और इस प्रकार महीने में करीब 120 पृष्ठ लिख लेते हैं। उन्होंने कहा कि समय निरंतर बदल रहा है और प्रतिदिन नए अनुभव सामने आते हैं। इसलिए वर्तमान घटनाओं और अनुभवों को दर्ज करना आवश्यक है। उन्होंने अपने एक उपन्यास में लापता मछुआरे के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि उसका अपनी बच्ची और प्रेमिका से मिलने का दृढ़ विश्वास ही उसे जीवित रखता है। उनके अनुसार विश्वास ही सफलता का मूलमंत्र है।
कार्यक्रम में विजय विशाल और कवि गणेश गनी ने डॉ. राजी के साहित्य पर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणियाँ प्रस्तुत कीं। कवि गणेश गनी ने कहा कि राजी जी सरल भाषा और भोगे हुए यथार्थ को अनूठे अंदाज़-ए-बयाँ में प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त हैं।
शोधार्थी केवल शर्मा ने राजी जी के साहित्य और जीवन-संघर्ष पर विचार रखते हुए उन्हें हिमाचल की पर्वतीय परिस्थितियों से जूझने वाला योद्धा बताया। उन्होंने कहा कि राजी जी के मित्रों की दृष्टि में वे उम्रदराज़ होने के बावजूद बच्चों जैसी जीवंतता रखते हैं। जिन चुनौतियों से दूसरे लोग बचने का प्रयास करते हैं, उनका सामना करने में राजी जी आनंद अनुभव करते हैं और यही उनकी ज़िंदादिली का रहस्य है।
साक्षात्कार के दौरान राजी जी ने अपने लेखन में परिवार और मित्रों की भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी, बेटा-बेटी और मित्र उन्हें निरंतर लेखन के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
कार्यक्रम का संयोजन दिव्या माथुर ने किया तथा संचालन आचार्य राजेश कुमार ने किया। अंत में अर्पणा संत सिंह के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। देश-विदेश से अनेक साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों ने सहभागिता कर कार्यक्रम को सार्थक बनाया।
समग्र रूप से ‘साहित्य संवाद : गंगाराम राजी’ डॉ. राजी के साहित्य, उनके जीवनानुभवों और रचनात्मक ऊर्जा को समझने का एक आत्मीय और सार्थक अवसर सिद्ध हुआ। उनके वक्तव्यों से यह स्पष्ट हुआ कि निरंतर बदलते समय को संवेदना, अनुभव और विश्वास के साथ दर्ज करना ही एक रचनाकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
