व्यंग्यकार समीक्षा सुयश तैलंग को आचार्य आनंद ऋषि साहित्य निधि पुरस्कार 2026

व्यंग्य विधा में योगदान के लिए मिला 35वाँ प्रतिष्ठित सम्मान
हैदराबाद, 15 अगस्त 2026। सशक्त व्यंग्यकार श्रीमती समीक्षा सुयश तैलंग को हिंदी व्यंग्य विधा में उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रतिष्ठित ‘आचार्य आनंद ऋषि साहित्य निधि पुरस्कार 2026’ से सम्मानित किया गया। आचार्य श्री आनंद ऋषि की जयंती के अवसर पर तेलंगाना के हैदराबाद में आयोजित समारोह में लगभग 600 साहित्यप्रेमियों की उपस्थिति में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया।
यह पुरस्कार आचार्य आनंद ऋषि साहित्य निधि का 35वाँ पुरस्कार है। सम्मान के रूप में समीक्षा सुयश तैलंग को 41 हजार रुपये की सम्मान राशि, शॉल, प्रशस्ति-पत्र, स्मृति-चिह्न तथा आचार्य आनंद ऋषि द्वारा रचित साहित्य की पुस्तकें प्रदान की गईं।
आचार्य आनंद ऋषि साहित्य निधि द्वारा यह सम्मान मुख्य रूप से हिंदीतर राज्यों के अहिंदीभाषी लेखकों के हिंदी साहित्य में योगदान के लिए प्रदान किया जाता है। आचार्य आनंद ऋषि स्वयं राष्ट्रसंत थे और उन्होंने विभिन्न भाषाओं में साहित्य-सृजन एवं साहित्यिक योगदान किया। विगत 34 वर्षों में इस सम्मान से देश के अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों को सम्मानित किया जा चुका है। समिति के अनुसार इस पुरस्कार की परंपरा में व्यंग्य विधा को पहली बार स्थान दिया गया है, जो समीक्षा सुयश तैलंग के साहित्यिक योगदान की विशिष्ट उपलब्धि है।
समारोह के दौरान समिति के अध्यक्ष सुरेशचंद्र बोहरा ने समीक्षा तैलंग के सम्मान में प्रशस्ति-पत्र का वाचन किया। कार्यक्रम में समिति के कार्याध्यक्ष सुरेश जैन गुगलीया सहित समिति के सभी पदाधिकारी और निर्णायक मंडल के सदस्य उपस्थित रहे। उपस्थित मुनियों एवं साधिकाओं ने मंगलाचरण के माध्यम से लेखिका को आशीर्वाद प्रदान किया।
सम्मान प्राप्त करने के अवसर पर समीक्षा सुयश तैलंग ने ‘अपौरुषेय से पौरुषेय साहित्य की यात्रा’ का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए समाज के निर्माण और संस्कारों में संतों के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने आचार्य आनंद ऋषि के साहित्यिक अवदान और उनके बहुभाषी साहित्य-सृजन की चर्चा करते हुए उनके विचारों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
समीक्षा सुयश तैलंग को प्राप्त यह सम्मान हिंदी व्यंग्य के क्षेत्र में उनके निरंतर रचनात्मक योगदान की महत्वपूर्ण स्वीकृति है। साहित्य जगत से उन्हें इस उपलब्धि पर बधाई और शुभकामनाएँ देते हुए आशा व्यक्त की गई कि वे इसी तरह निरंतर सृजन करती रहेंगी और उनका लेखन निरंतर निखरता रहेगा।
