‘अभिव्यक्ति’ ने हिंदी दिवस को दिया नया स्वर: मंच पर जीवंत हुए भाषा, स्मृति और प्रवास के रिश्ते

मौलिक एकालापों, कविता और प्रवासी अनुभवों के माध्यम से हिंदी के बदलते स्वरूप का उत्सव
मिसिसॉगा, ओंटारियो। हिंदी हमारे जीवन में कहाँ रहती है? क्या वह केवल व्याकरण, लिपि और शुद्ध उच्चारण में है, या फिर माँ की बातचीत, नानी के वॉइस नोट्स, बचपन की स्मृतियों, प्रेम की कविताओं, फ़िल्मी गीतों, हिंग्लिश और प्रवासी जीवन की रोज़मर्रा की बातचीत में भी उतनी ही जीवित है?
इन्हीं प्रश्नों को रंगमंच, कहानी और कविता के माध्यम से सामने लाया ‘अभिव्यक्ति — Hindi Speaks: Stories, Stage & Society’ ने। हिंदी दिवस 2026 के उपलक्ष्य में 13 सितंबर को मिसिसॉगा में आयोजित इस कार्यक्रम ने हिंदी को केवल उत्सव की भाषा के रूप में नहीं, बल्कि बदलती पीढ़ियों, प्रवासी अनुभवों, स्मृतियों और मानवीय रिश्तों से जुड़ी एक जीवंत अभिव्यक्ति के रूप में मंच पर प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम की मूल भावना सरल लेकिन महत्त्वपूर्ण थी: हिंदी केवल उनकी नहीं है जो उसे शुद्ध और सहज रूप से बोलते हैं; हिंदी उनकी भी है जो उससे प्रेम करते हैं, उससे जूझते हैं, उसमें लिखते हैं, उसकी ओर लौटते हैं और बदलते जीवन के बीच उससे अपना रिश्ता बनाए रखना चाहते हैं।
भारत के महावाणिज्य दूतावास, टोरंटो की सहभागिता
कार्यक्रम में भारत के महावाणिज्य दूतावास, टोरंटो से श्री यादराम यादव की विशिष्ट अतिथि के रूप में गरिमामयी उपस्थिति रही। उन्होंने प्रतिभागियों, कलाकारों और आयोजकों के प्रयासों की सराहना की तथा प्रवासी समुदाय और नई पीढ़ी के बीच हिंदी भाषा और भारतीय सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को जीवंत बनाए रखने वाली ऐसी पहलों के महत्त्व को रेखांकित किया।
उनकी उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान की और इस बात को भी रेखांकित किया कि प्रवासी समाज में भाषा का संरक्षण केवल उसे अतीत के रूप में सँजोने से नहीं, बल्कि उसे वर्तमान जीवन और नई पीढ़ियों के अनुभवों से जोड़ने से संभव है।

डॉ. शैलजा सक्सेना के वक्तव्य ने दिया वैचारिक आधार
कार्यक्रम की मुख्य वक्ता डॉ. शैलजा सक्सेना ने हिंदी भाषा, साहित्य और उसके व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ पर अपने विचार साझा किए। उनके वक्तव्य ने कार्यक्रम के कलात्मक पक्ष को एक वैचारिक विस्तार प्रदान किया और हिंदी के साहित्यिक तथा सांस्कृतिक महत्त्व पर दर्शकों को विचार करने के लिए प्रेरित किया।
हिंदी साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय डॉ. सक्सेना की रचनाएँ भारत के अनेक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों का हिस्सा रही हैं। हिंदी भाषा और साहित्य में उनके योगदान को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है और उन्हें भारत सरकार के विश्व हिंदी सम्मान सहित अनेक सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है।
पाँच एकालाप, हिंदी से पाँच अलग रिश्ते
‘अभिव्यक्ति’ का केंद्रीय आकर्षण पाँच विशेष रूप से तैयार किए गए मौलिक हिंदी एकालाप थे। इन प्रस्तुतियों की विशेषता यह रही कि मंच पर हिंदी को किसी एक निश्चित रूप में परिभाषित करने के बजाय पाँच कलाकारों के पाँच अलग अनुभवों के माध्यम से देखा गया।
कार्यक्रम और प्रस्तुत एकालापों की परिकल्पना, संयोजन एवं साहित्यिक निर्देशन अनुराधा ग्रोवर तेजपाल ने किया। लेखिका, नाटककार, कवयित्री, अभिनेत्री और निर्देशिका अनुराधा की रचनात्मक यात्रा रंगमंच, फ़िल्म, कविता और सामुदायिक कहानी-कथन तक फैली हुई है। वे 30 से अधिक नाटकों, 12 से अधिक लघु फ़िल्मों, 50 से अधिक कहानियों तथा 500 से अधिक कविताओं और ग़ज़लों की रचना कर चुकी हैं। वे Kahaani Kollective की संस्थापक और साहित्यिक निर्देशिका भी हैं।
कार्यक्रम की भावना को व्यक्त करते हुए अनुराधा ग्रोवर तेजपाल ने कहा:
“अभिव्यक्ति मेरे लिए केवल हिंदी दिवस का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि हिंदी के साथ हमारे बदलते रिश्ते को मंच पर जगह देने का एक प्रयास था।”
और यही बदलता रिश्ता पाँचों एकालापों में अलग-अलग रूपों में दिखाई दिया।
‘हिंदी मुश्किल है लेकिन…’ में कक्षा नौ की छात्रा और युवा मंच कलाकार वेदांशी मेहता ने कनाडा में पली-बढ़ी नई पीढ़ी के उस अनुभव को जीवंत किया, जिसमें हिंदी कभी कठिन लगती है, कभी उलझाती है, लेकिन फिर भी परिवार और अपनी जड़ों से जोड़ने वाली भाषा बनी रहती है। एकालाप का लेखन अनुराधा ग्रोवर तेजपाल ने किया।
‘जब हिंदी मेट मी’ में लेखक, निर्देशक, फ़िल्मकार और रंगमंच कलाकार पार्थ शाह ने भाषा और व्यक्ति के बीच बनने वाले एक ऐसे रिश्ते को प्रस्तुत किया जिसमें कभी व्यक्ति भाषा की तलाश करता है और कभी भाषा स्वयं धीरे-धीरे व्यक्ति को खोज लेती है।
‘हिंदी बनाम मैं’ में डॉ. कनिका वर्मा ने अपने और हिंदी के रिश्ते को एक काल्पनिक बहस के रूप में मंचित किया। अंग्रेज़ी के अकादमिक और पेशेवर संसार, बहुभाषी जीवन और कविता की हिंदी के बीच यह प्रस्तुति इस प्रश्न की नाटकीय पड़ताल बनी कि जो भाषा हमें सहज रूप से विरासत में मिलती है, क्या हम कभी-कभी उसी का महत्त्व सबसे देर से समझते हैं?
‘नानी के वॉइस नोट्स’ में लेखक, निर्देशक और अभिनेता देव पारेख ने तकनीक और पीढ़ियों के बीच एक अत्यंत मानवीय पुल बनाया। वॉइस नोट्स यहाँ केवल संदेश नहीं रह जाते, बल्कि उनमें नानी की आवाज़ के साथ घर, स्मृतियाँ और भाषा भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यात्रा करती दिखाई देती हैं।
वहीं ‘मेरी सखी, मेरी हिंदी’ में हिना महिंद्रू ने हिंदी को एक भाषा से आगे बढ़ाकर एक सखी और साथी के रूप में देखा, ऐसी सखी, जिसके साथ संबंध समय के साथ बदल सकता है, लेकिन जिसकी भावनात्मक उपस्थिति बनी रहती है।
इस तरह पाँचों प्रस्तुतियाँ मिलकर हिंदी के साथ पाँच अलग-अलग पीढ़ीगत, व्यक्तिगत और प्रवासी संबंधों का एक रंगमंचीय कोलाज बन गईं।
एकालाप से कविता तक: अभिव्यक्ति के अनेक रंग
एकालापों के बाद कविता ने शाम को अभिव्यक्ति का एक और स्वर दिया। पूनम कासलीवाल, करुण मदान, अनुराधा कानूनगो, निमिषा मेहता, प्रवेश वीर सिद्धू, अंकिता सिन्हा, सचिन त्रिवेदी, नीरू गुप्ता, सारिका श्रीवास्तव और नीरज यादव ने अपनी रचनाओं के माध्यम से कार्यक्रम में विचार, स्मृति, संवेदना और व्यक्तिगत अनुभवों के अनेक रंग जोड़े।
इस काव्यात्मक सहभागिता ने कार्यक्रम के मूल विचार को और विस्तार दिया। भाषा केवल मंच पर प्रस्तुत की जाने वाली वस्तु नहीं, बल्कि समुदाय के भीतर अनेक आवाज़ों में लगातार बनती और बदलती हुई साझी अनुभूति है।
‘अभिव्यक्ति’ के पीछे दो रचनात्मक दृष्टियाँ: डॉ. कनिका वर्मा और अनुराधा ग्रोवर तेजपाल
‘अभिव्यक्ति’ को मंच तक पहुँचाने में डॉ. कनिका वर्मा और अनुराधा ग्रोवर तेजपाल की रचनात्मक भूमिकाएँ एक-दूसरे की पूरक रहीं। कार्यक्रम की प्रोड्यूसर, प्रस्तुतकर्ता और एकालाप कलाकार के रूप में डॉ. कनिका वर्मा ने इस पहल को साकार करने और हिंदी दिवस को रंगमंच, साहित्य और सामुदायिक सहभागिता से जोड़ने में प्रमुख भूमिका निभाई, वहीं कार्यक्रम तथा प्रस्तुत मौलिक एकालापों की परिकल्पना, संयोजन, क्यूरेशन एवं साहित्यिक निर्देशन अनुराधा ग्रोवर तेजपाल ने किया। इस रचनात्मक साझेदारी ने ‘अभिव्यक्ति’ को केवल प्रस्तुतियों की एक शृंखला न रखकर हिंदी के साथ अलग-अलग पीढ़ियों और व्यक्तियों के रिश्तों को सामने लाने वाला एक सुसंगत रंगमंचीय अनुभव बनाया।
अनुराधा ग्रोवर तेजपाल एक सक्रिय लेखिका, नाटककार, कवयित्री, अभिनेत्री और निर्देशिका हैं, जिनकी रचनात्मक यात्रा रंगमंच, फ़िल्म, कविता और कहानी-कथन तक फैली हुई है। उनकी रचनाओं में पहचान, प्रवास, भाषा, स्त्री-अनुभव और दक्षिण एशियाई प्रवासी जीवन जैसे विषय प्रमुखता से उभरते हैं। ‘अभिव्यक्ति’ में सूत्रधार की भूमिका निभाने के साथ-साथ उन्होंने कलाकारों और उनके अलग-अलग भाषायी अनुभवों को एक साझा साहित्यिक और रंगमंचीय सूत्र में पिरोने का कार्य किया।
वहीं डॉ. कनिका वर्मा, यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में Writing Studies की लेक्चरर होने के साथ-साथ हिंदी कवयित्री, रंगमंच कलाकार और कला-आधारित शिक्षिका हैं। भाषा, लेखन, English for Academic Purposes, English Language Learning और उच्च शिक्षा में उन्हें 14 वर्ष से अधिक का शिक्षण एवं अनुसंधान का अनुभव है। शिक्षण, अनुसंधान और सेवा के लिए उन्हें 15 से अधिक पुरस्कारों और अन्य मान्यताओं से सम्मानित किया जा चुका है तथा वे 40 से अधिक सम्मेलनों में अपने शोधकार्य प्रस्तुत कर चुकी हैं।
उनकी अकादमिक यात्रा के समानांतर हिंदी कविता और रंगमंच उनकी रचनात्मक पहचान का महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। उनकी 40 से अधिक हिंदी कविताएँ साहित्यिक मंचों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी कविता ‘मैं नारी हूँ नीरा (I Am Woman, I Am Water)’ को Art Meets Word 2026 में Jury’s Choice Award मिला, जबकि Brampton Poetry Project 2026 के अंतर्गत चयनित उनकी कविता ‘काँच की पत्तियाँ (Glass Leaves)’ को ब्रैम्पटन की बसों, ट्रांज़िट स्थलों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित किया गया। कविता, रेडियो, रंगमंच और भाषा-केंद्रित कार्यशालाओं के माध्यम से वे लंबे समय से अकादमिक और रचनात्मक अभिव्यक्ति के बीच सेतु बनाने का कार्य करती रही हैं।
इस प्रकार, कनिका वर्मा की आयोजनात्मक और कलात्मक पहल तथा अनुराधा ग्रोवर तेजपाल की क्यूरेटोरियल और साहित्यिक दृष्टि ने मिलकर ‘अभिव्यक्ति’ की पहचान निर्मित की: एक ऐसा मंच जहाँ हिंदी को केवल मनाया नहीं गया, बल्कि अलग-अलग उम्र, अनुभव और भाषायी पृष्ठभूमि वाले कलाकारों के माध्यम से जिया, सुना और पुनः खोजा गया।
हिंदी जैसी भी है, आपकी है
प्रवासी समाज में हिंदी का स्वरूप लगातार बदल रहा है। कहीं वह माता-पिता की भाषा है, कहीं दादा-दादी और नाना-नानी की आवाज़; कहीं वह फ़िल्मों और गीतों के रास्ते जीवन में आती है, कहीं हिंग्लिश बनकर रोज़मर्रा की बातचीत में घुल जाती है, और कहीं नई पीढ़ी उसे अपने ढंग से दोबारा खोजती है।
‘अभिव्यक्ति’ ने हिंदी के इन्हीं अनेक रूपों को एक साझा मंच देने का प्रयास किया, बिना यह तय किये कि कौन-सी हिंदी अधिक सही है और कौन-सी कम।
शायद किसी भाषा की जीवंतता की सबसे बड़ी पहचान भी यही है कि वह केवल पुस्तकों में सुरक्षित न रहे। लोग उसे बोलें, उसमें लिखें, उससे प्रेम करें, उससे उलझें, उस पर प्रश्न करें, उसमें नए शब्द और अनुभव जोड़ें, और अगली पीढ़ी को भी उसमें अपना रिश्ता खोजने की जगह दें।
क्योंकि हिंदी जिस रूप में भी आपके जीवन में आती है, वह आपकी है।
