विदेशी मूल के हिंदी सेवियों का वैश्विक हिंदी परिवार ने किया सम्मान
केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन यूके तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार के साप्ताहिक कार्यक्रम के अंतर्गत “विदेशी मूल के हिंदी सेवियों का सम्मान” विषय पर अंतरराष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी का आयोजन किया गया। स्वरांगी साने (लेखिका) सभी अतिथियों का औपचारिक स्वागत किया।
डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ (पूर्व केन्द्रीय शिक्षा मंत्री, भारत सरकार, संस्थापक – लेखक गाँव) ने भारतीय भाषाओं और हिंदी की वैश्विक उपयोगिता पर बल देते हुए कहा कि यह साहित्य केवल लेखन या रचना तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ के उच्च आदर्शों के साथ संपूर्ण मानवता के कल्याण तथा वैश्विक समस्याओं के समाधान का सशक्त मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने विदेशी विद्वानों द्वारा किए जा रहे भाषा-साधना के कार्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा की और ‘लेखक गांव’ की बहुआयामी सांस्कृतिक, शैक्षणिक एवं प्राकृतिक पहलों का परिचय देते हुए आगामी ‘लेखक गांव महोत्सव’ (25-27 अक्टूबर) में विश्व भर के विद्वानों और सर्जकों को सहभागिता के लिए सहर्ष आमंत्रित किया।
पद्मश्री डॉ. ल्यूदमिला खोखलोवा (रुसी शिक्षविद) ने अपनी हिंदी-यात्रा के अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने हिंदी के साथ संस्कृत, पंजाबी, गुजराती और मारवाड़ी का भी अध्ययन किया। उन्होंने रूस में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन, शोध और विद्यार्थियों को भारतीय भाषाओं एवं संस्कृति से जोड़ने के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हिंदी का क्षेत्र विज्ञान और अन्य क्षेत्रों में भी विस्तृत होना चाहिए, जिससे विद्यार्थियों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ें और हिंदी सीखने के प्रति नई पीढ़ी में प्रेरणा पैदा हो।
अनिल जोशी (अध्यक्ष, वैश्विक हिन्दी परिवार)जी ने विदेशी हिंदी विद्वानों (जैसे मैग्रेगर, डॉ. रूपर्ट स्नेल, क्रिश्चियन, खोखलोवा जी और मिज़ोकामी जी) द्वारा हिंदी व्याकरण, शिक्षण, अनुवाद और भारतीय भाषाओं के संवर्धन में दिए गए अतुलनीय योगदान की सराहना करते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर हिंदी की वास्तविक पहचान इसके गुणवत्तापूर्ण शिक्षण से है; इसलिए हिंदी को विश्व पटल पर शिक्षा, रोज़गार और भारत की भाषाई-सांस्कृतिक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए इन विद्वानों का मार्गदर्शन और सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम में डॉ. यूरी बोत्वीकिन (यूक्रेन), श्री क्रिश्चियन वाइस (जर्मनी), प्रो. डॉ. हंस वर्नर वैसलर (स्वीडन), पद्मश्री प्रो. डॉ. लुदमिला खोखलोवा (रूस) तथा प्रो. डॉ. टोमियो मिजोकामी (जापान) के हिंदी एवं भारतीय भाषाओं के क्षेत्र में योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया गया। सम्मान-पत्रों के माध्यम से इन विद्वानों की हिंदी भाषा, भारतीय साहित्य, संस्कृति और भारत-विदेश के बीच भाषाई एवं सांस्कृतिक सेतु निर्माण में भूमिका का अभिनंदन किया गया।
प्रो. हाइंस वर्नर वेसलर (स्वीडन) ने हिंदी के वैश्विक विकास की चर्चा करते हुए कहा कि हिंदी को विदेशी भाषा के रूप में पढ़ाने के लिए भारत में अधिक संस्थागत प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने हिंदी साहित्य के अनुवाद, नए अनुवादकों को प्रोत्साहन तथा विदेशों में हिंदी साहित्य के पाठकों तक पहुँच बढ़ाने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने वैश्विक हिंदी साहित्य को भविष्य की महत्वपूर्ण संभावना बताते हुए यथार्थ के साथ आशा और संकल्प को आवश्यक बताया।
कार्यक्रम का सफल संचालन दीपा दिनेशनील (रचनाकार, संपादक व पत्रकार) जी ने प्रभावी ढंग से किया, कार्यक्रम का औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन अरुणा अजितसरिया जी ने किया।

