पूर्वोतर की भाषाएँ, विशिष्टताएं व लिपि की चुनौतियाँ (रिपोर्ट)

पूर्वोतर की भाषाएँ, विशिष्टताएं व लिपि की चुनौतियाँ सत्र की अध्यक्षता प्रो. किरण हजारिका, पोवीसी, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय को करनी थी किंतु वे अपरिहार्य कारणों के चलते न आ पाईं तो यह दायित्व डा. विनोद जो शिक्षा संस्कृति अध्ययन न्यास, नई दिल्ली के राष्ट्रीय समन्वयक हैं, उन्हें सौंपा गया। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक भारतीयों के मन में पूर्वोत्तर को भारत से अलग मानने की मानसिकता बनाई गई। विद्यार्थी जीवन के अनुभवों और अखिल भारतीय छात्र आदान–प्रदान कार्यक्रमों ने इस दूरी को कम किया और एकात्मता का बोध कराया।
असमी और मणिपुरी भाषाओं की आज की स्थिति, उनकी उज्ज्वल परंपरा और चुनौतियाँ केवल पूर्वोत्तर भारत तक सीमित नहीं हैं। यह स्थिति भारत ही नहीं, बल्कि विश्व की लगभग सभी भाषाओं की साझा सच्चाई है। भारतीय भाषाओं और लोककला की समृद्ध साहित्यिक और मौखिक परंपरा वेदकाल से चली आ रही है। लिपि और तकनीक कभी मुख्य विषय नहीं रहे, क्योंकि हमारी परंपरा मूलतः मौखिक रही है। पिछले दो सदियों में विविधता को भिन्नता मानकर एकात्मता को कमजोर किया गया। भारतीय दृष्टि समानता से अधिक आंतरिक एकात्मता पर बल देती है। भारत की सभी भाषाएँ एक ही दर्शन और जीवनबोध की संवाहक हैं, भले ही उनकी लिपियाँ अलग हों। आज की बड़ी चुनौती शिक्षा, प्रशासन, न्याय और रोजगार से भारतीय भाषाओं को बाहर किया जाना है। स्वतंत्रता के बाद भी इस प्रवृत्ति को हमने स्वयं बढ़ावा दिया है।
समाधान के लिए मातृभाषा में शिक्षा को वैज्ञानिक आधार पर अपनाना आवश्यक है। नई शिक्षा नीति और प्रतियोगी परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं को स्थान मिलना सकारात्मक संकेत है। परंतु केवल सरकारी निर्णय नहीं, समाज की मानसिक तैयारी भी जरूरी है। घर, शिक्षा, उद्योग और शासन—हर स्तर पर भारतीय भाषाओं को अपनाकर ही सच्ची एकात्मता संभव है।
श्री ऋषि कुमार शर्मा जी ने चर्चा की पीठिका को प्रस्तुत करते हुए कहा कि पिछले 40 वर्षों से वे हिंदी सेवा से जुड़े हैं और पूर्वोत्तर भारत में हो रहे कार्यों पर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि हाल ही में मिजोरम, मेघालय और असम की यात्रा के दौरान उन्होंने क्षेत्र में तीव्र विकास की प्रक्रिया देखी। उनके अनुसार पूर्वोत्तर की परिस्थितियाँ पहले की तुलना में काफी बदल चुकी हैं। नई शिक्षा नीति के तहत स्थानीय भाषाओं में शिक्षा और शोध को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य स्थानीय बोलियों के माध्यम से बच्चों और शोधार्थियों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है। इस अवसर पर उन्होंने वैश्विक हिंदी परिवार और तृतीय अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा सम्मेलन में उपस्थित विद्वानों और साहित्यकारों का स्वागत किया। उन्होंने उत्तर पूर्व से आए प्रतिनिधियों को उस क्षेत्र का राजदूत बताया। साथ ही, उत्तर पूर्व की संस्कृति और रीति-रिवाजों को देश के अन्य हिस्सों तक पहुँचाने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह कार्य दक्षिण, पश्चिम और अन्य क्षेत्रों में भी किया जाना चाहिए। अंत में उन्होंने पुनः सभी का हार्दिक अभिनंदन किया और संचालन के लिए माइक सौंपा।
प्रोफेसर डॉ. अहनथेम होमेन सिंह ने अपने भाषण में उत्तर-पूर्वी भारत में भाषाओं की स्थिति और उनके आपसी जुड़ाव के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि असमिया, मणिपुरी और बोडो इस क्षेत्र की तीन अनुसूचित भाषाएँ हैं। उन्होंने असम में कार्बी, मेघालय में खासी, त्रिपुरा में कोकबोरोक और मिजोरम में मिज़ो जैसी कई अन्य व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषाओं पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ये भाषाएँ स्थानीय संस्कृति में गहराई से जुड़ी हुई हैं, भले ही वे अनुसूचित सूची में शामिल न हों। मणिपुर का ज़िक्र करते हुए, उन्होंने बताया कि छात्र 18 अलग-अलग भाषाओं में बोर्ड परीक्षाओं में शामिल हो सकते हैं, जिनमें हिंदी, असमिया, बंगाली और विभिन्न सामुदायिक भाषाएँ शामिल हैं। उन्होंने नागालैंड की समृद्ध भाषाई विविधता की ओर इशारा किया, जिसमें आओ, लोथा और अंगामी जैसी भाषाओं का ज़िक्र किया, और बताया कि नागामीज़ एक संपर्क भाषा के रूप में काम करती है। उन्होंने बताया कि कैसे साझा सांस्कृतिक परंपराएँ अलग-अलग भाषाई समुदायों को सद्भाव से एक साथ रहने में मदद करती हैं। मणिपुरी कहानी कहने के उदाहरण दिए गए ताकि यह दिखाया जा सके कि कैसे मणिपुरी, बंगाली और संस्कृत शब्दों को अक्सर कहानी में मिलाया जाता है। इसके बाद उन्होंने लिपि से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की, जिसमें मणिपुरी के लिए बंगाली और मेइतेई लिपियों का समानांतर उपयोग और कई अन्य भाषाओं के लिए रोमन लिपि का प्रचलन शामिल है। उन्होंने स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में लिपि के चुनाव के महत्व पर ज़ोर देते हुए अपना भाषण समाप्त किया।
मुख्य वक्ता के रूप में डा. मिताली बर्मन ने असमिया में सबका स्वागत करते हुए “हकल के नमस्कार जनाई” कहा जिसने सबको प्रसन्न कर दिया। अपने वक्तव्य में उन्होंने पूर्वोत्तर भारत की भाषाई विविधता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस क्षेत्र में 200 से 220 भाषाएँ बोली जाती हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक समुदाय अपनी भाषा के माध्यम से अपनी संस्कृति और परंपराओं को आगे बढ़ाता है। पूर्वोत्तर भारत में इंडो-आर्यन, तिब्बतो-बर्मन और ऑस्ट्रो-एशियाटिक—तीन प्रमुख भाषा परिवारों की भाषाएँ प्रचलित हैं। असमिया भाषा इंडो-आर्यन परिवार की प्रमुख भाषा है, जबकि बोडो, मिजो, गारो, मैतई आदि तिब्बतो-बर्मन समूह से आती हैं। खासी और जयंतिया जैसी भाषाएँ ऑस्ट्रो-एशियाटिक परिवार से संबंधित हैं। असम में असमिया और बोडो, दोनों राज्य भाषाएँ हैं और संविधान की अष्टम सूची में शामिल हैं। मणिपुरी, बांग्ला और नेपाली भाषाएँ भी पूर्वोत्तर में व्यापक रूप से बोली जाती हैं और अष्टम सूची में सम्मिलित हैं। वक्ता ने भाषाओं के संकट पर चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि भाषा की मृत्यु के साथ संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान भी समाप्त हो जाता है। शहरीकरण, रोजगार की मजबूरी और मातृभाषा में शैक्षिक सामग्री की कमी को भाषा क्षरण का कारण बताया गया। उन्होंने कहा कि लिपि भाषा को स्थायित्व देती है और असमिया की ब्राह्मी लिपि की स्वतंत्र पहचान आवश्यक है। कई पूर्वोत्तर भाषाओं में रोमन लिपि के प्रयोग पर विचार करते हुए भारतीय लिपियों को अपनाने का सुझाव दिया गया। प्रौद्योगिकी की भूमिका को रेखांकित करते हुए असमिया यूनिकोड आंदोलन का उदाहरण प्रस्तुत किया गया। सोशल मीडिया और टाइपिंग टूल्स ने मातृभाषा में अभिव्यक्ति को संभव बनाया है। शिक्षा और अनुवाद को भाषा विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बताया गया। अंत में उन्होंने कहा कि युवाओं, प्रौद्योगिकी और बहुभाषी शिक्षा के सहयोग से पूर्वोत्तर भारत की भाषाएँ समृद्ध और जीवंत बनी रह सकती हैं।
डॉ गुरुमयुम बिजॉय कुमार शर्मा ने भी अपने वक्तव्य का प्रारंभ मणिपुरी भाषा के अभिवादन के साथ किया, “पूनम मकबू खुरुमजरी” अर्थात सबको प्रणाम। उन्होंने “मणिपुरी भाषा की विशिष्टता एवं लिपि की चुनौतियां” पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होने अपने वक्तव्य को तीन भागों में विभाजित किया – 1. मणिपुरी का ऐतिहासिक एवं भाषा-वैग्यानिक स्थान एवं महत्व 2. शिक्षण में मणिपुरी 3. मणिपुरी भाषा की चुनौतियाँ।
अपने वक्तव्य में उन्होंने मणिपुरी के ऐतिहासिक, भाषावैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित किया।
मणिपुरी भाषा सिनो-तिब्बती परिवार की तिब्बती-बर्मी उपशाखा से संबंधित है, जिसे मैतैलोन भी कहा जाता है। यह मणिपुर राज्य की प्रमुख भाषा और मणिपुरी समाज की सांस्कृतिक पहचान का केंद्र है। मणिपुरी की अपनी प्राचीन लिपि और मौलिक महाकाव्य परंपरा रही है। 1992 में इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर राष्ट्रीय मान्यता दी गई।
वर्तमान में यह शिक्षा, प्रशासन, मीडिया और सांस्कृतिक गतिविधियों में प्रयुक्त हो रही है। हालाँकि ऐतिहासिक रूप से मुद्रण तकनीक के अभाव और बंगाली-असमिया लिपि के प्रयोग से इसकी लिपि को क्षति पहुँची। आज भी लिपि का सहअस्तित्व, वर्तनी की असमानता और डिजिटल कठिनाइयाँ यथार्थ चुनौतियाँ हैं। शिक्षा में मानकीकृत पाठ्य सामग्री और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी एक बड़ी समस्या है। तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा में अंग्रेज़ी के वर्चस्व से मणिपुरी का प्रयोग सीमित हो जाता है। साथ ही मौखिक परंपराओं में ह्रास और प्रवासी संदर्भ भी चुनौतियाँ उत्पन्न करते हैं।
फिर भी प्रतियोगी परीक्षाओं में मैतैई के विकल्प और अनुवाद साहित्य के विस्तार से सकारात्मक परिवर्तन दिखता है। इन सबके बीच मणिपुरी भाषा तिब्बती-बर्मी भाषाओं में एक विशिष्ट, सशक्त और भविष्य की संभावनाओं से भरी भाषा बनी हुई है।
श्री रघुनाथ पांडे जी ने कहा कि लंबे समय तक भारत की भाषा और संस्कृति की चर्चा में पूर्वोत्तर को स्थान नहीं मिला। इस उपेक्षा के कारण पूर्वोत्तर का भावनात्मक जुड़ाव मुख्यधारा से कमजोर हुआ।
उन्होंने कहा कि यह सत्र पूर्वोत्तर और शेष भारत के बीच सेतु बनाने की दिशा में एक नई शुरुआत है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि हिंदी और असमिया सहित भारतीय भाषाएँ एक ही भाषा-परिवार से जुड़ी हैं। शब्दों की यात्रा और उच्चारण भिन्नता के बावजूद अर्थ और भाव की एकता स्पष्ट दिखाई देती है।
हिंदी और असमिया में दैनिक जीवन, संवेदना और दर्शन से जुड़े अनेक समान शब्द पाए जाते हैं।
यह समानता संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया और विशेषण—चारों स्तरों पर दिखाई देती है। इतिहास, संस्कृति, देवस्थल, पर्व और राजवंशों के नाम भी इस सांस्कृतिक एकता के प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि लिपिगत भिन्नता वास्तविक विभाजन नहीं है, क्योंकि तकनीक ने दूरी कम कर दी है। पूर्वोत्तर का इतिहास, रामायण और महाभारत से लेकर मध्यकाल तक, भारतीय परंपरा से गहराई से जुड़ा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय भाषाएँ कभी अलग-थलग नहीं थीं, विभाजन औपनिवेशिक नीतियों का परिणाम है। भाषा की आत्मा संस्कृति और लोक जीवन में बसती है, न कि किसी कृत्रिम ढाँचे में। मातृभाषा में शिक्षा और भाषाओं के आपसी संबंधों को समझना राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मूल उद्देश्य है। उन्होंने समावेशी भाषाई विकास को मानव और राष्ट्र दोनों के विकास के लिए अनिवार्य बताया और आह्वान किया कि सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलने से ही भारत की संस्कृति सुरक्षित रह सकती है।
सत्र के आरम्भ में संयोजक अपर्णा सिंह ने भूमिका देते हुए कहा कि यह सत्र पूर्वोत्तर की भाषाई धरोहर पर केंद्रित है जो विविधता, संवेदनशीलता और सांस्कृतिक गहराई का अद्भुत उदाहरण है। पूर्वोत्तर भारत एक भौगोलिक क्षेत्र ही नहीं बल्कि सैकड़ों भाषाओं, बोलियों और मौखिक परंपराओं का जीवन संसार है। इन भाषाओं में लोक कथाएं हैं, स्मृतियां हैं। प्राकृतिक के साथ सह जीवन का दर्शन है। पर साथ ही लिपि, शिक्षा और डिजिटल माध्यम की गंभीर चुनौतियां भी हैं।
रिपोर्ट – मैथिली पी. राव, बंगलुरू
सत्र – पूर्वोतर की भाषाएँ, विशिष्टताएं व लिपि की चुनौतियाँ
स्थान – दर्शनम् – 1 सभागार – इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली
सत्र दिनांक -10 जनवरी, 2026
समय- 09:00 से 11:00 बजे तक
