पश्चिमी भारत की भाषाएँ: गुजराती, मराठी, कोंकणी एवं सिंधी डायस्पोरा के संदर्भ में (रिपोर्ट)

इस सत्र की अध्यक्षता जयेन्द्र सिंह जाधव – गुजरात साहित्य अकादमी के महासचिव एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के अखिल भारतीय प्रबंधन शिक्षा प्रमुख द्वारा की गई। उन्होंने कविता के माध्यम से अपनी बात की शुरुआत की और सभी वक्ताओं के विचारों को रेखांकित करते हुए कहा कि भाषा की चिंता छोड़कर हमें भाषा पर गंभीर चिंतन करने की आवश्यकता है।
सत्र का संचालन सुश्री स्वरांगी साने ने किया। उन्होंने सभी अतिथियों को मंच पर आमंत्रित किया तथा स्वागत के क्रम में सुश्री शिवांगी सिंह ने सभी अतिथियों को पटका पहनाकर उनका अभिनंदन किया।
स्वरांगी साने ने मंचासीन अतिथियों का परिचय कराया तथा सर्वप्रथम शोधार्थी मेघा खेमानी को सिंधी भाषा और डायस्पोरा विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया। मेघा खेमानी ने सिंधी डायस्पोरा के संदर्भ में आइडेंटिटी क्राइसिस और सांस्कृतिक निरंतरता को सबसे बड़ी चुनौतियों के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सिंधी समुदाय को पारंपरिक अर्थों में डायस्पोरा कहना कुछ हद तक जटिल है, क्योंकि 18वीं–19वीं शताब्दी में भारत के भीतर हुआ उनका प्रवासन, मुख्यतः व्यापारिक था। इसके बावजूद, सिंधी समुदाय ने जहाँ भी निवास किया, अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को सहेजकर रखा। उन्होंने “Beyond the Rainbow” नामक पुस्तक का संदर्भ देते हुए सिंधी समुदाय की विशेषताओं और समस्याओं पर प्रकाश डाला।
विशिष्ट अतिथि अश्विनी केगावकर जो वर्तमान में नीदरलैंड में निवासरत हैं, ने मराठी साहित्य और संस्कृति पर अपने विचार साझा करते हुए बताया कि वहाँ मराठी समुदाय अपनी भाषा और पर्व-परंपराओं को अत्यंत उत्साह के साथ जीवित रखे हुए है। उन्होंने कहा कि मराठी भाषा विश्व के लगभग 113 देशों में बोली जाती है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि व्यापार के उद्देश्य से महाराष्ट्र आए यहूदी समुदाय के लोग अपने देश लौटने के बाद भी मराठी भाषा का प्रयोग करते रहे हैं। नीदरलैंड में मराठी नाटकों, गीत-संगीत के मंचन के साथ-साथ हेग (द हेग) में मराठी भाषा प्रशिक्षण हेतु मराठी शाला भी संचालित है। वैष्णव संप्रदाय के लोग ‘वारी’ जैसे पर्व वहाँ मराठी ढोल-नगाड़ों के साथ मनाते हैं तथा वैदिक अध्ययन भी मराठी भाषा में होता है। उन्होंने यह भी बताया कि डच नागरिक भी मराठी पर्वों में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं।
मुख्य अतिथि तितिक्षा साह ने गुजराती समुदाय की व्यापारिक प्रवृत्ति और वैश्विक गतिशीलता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गुजराती लोग ऐतिहासिक रूप से व्यापार के लिए विभिन्न देशों में गए और स्थानीय भाषाओं को भी आत्मसात किया। आज दूसरी और तीसरी पीढ़ी के कई गुजराती प्रवासी गुजराती भाषा का प्रयोग कम करते हैं, क्योंकि व्यापारिक आवश्यकताओं के अनुसार अन्य भाषाएँ अपनानी पड़ती हैं। उन्होंने ‘डबल डायस्पोरा’ की अवधारणा पर चर्चा करते हुए फिजी, त्रिनिदाद और मॉरीशस जैसे देशों से पुनः अन्य देशों में गए गुजराती समुदाय का उल्लेख किया, जो कहीं न कहीं अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटाव महसूस करता है। साथ ही उन्होंने बताया कि ब्रिटेन में गुजराती समुदाय ने एक प्रकार का “ग्लोबल विलेज” विकसित कर लिया है।
इसके पश्चात डॉ. पुरुषोत्तम पाटिल ने सभी वक्ताओं के विचारों को समेटते हुए भारत की भाषाई संपदा को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हमें अपनी भाषाओं पर गर्व होना चाहिए और भारतीय भाषाओं को संस्कृतनिष्ठ बनाकर आपसी संवाद और जुड़ाव को और मजबूत किया जा सकता है। अंत में श्रीअनिल जोशी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया तथा सत्र का सफलतापूर्वक समापन हुआ।
सत्र – पश्चिमी भारत की भाषाएँ: गुजराती, मराठी, कोंकणी एवं सिंधी डायस्पोरा के संदर्भ में
स्थान – दर्शनम् – 2 सभागार – इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली
सत्र दिनांक -10 जनवरी 2026
समय 02:30 से 3:30 बजे तक
