प्रवासी लेखन – मेरी दृष्टि (रिपोर्ट)

इस सत्र की अध्यक्षता श्री संतोष चौबे, कुलपति, रवींद्र भारती विश्वविद्यालय द्वारा की गई। संतोष जी ने कहा कि चर्चा प्रवासी साहित्य से दर्शन की ओर अवश्य चली गई, किंतु डॉ. धनंजय जी की बात पूर्णतः सार्थक है। प्रत्येक रचनाकार अपनी रचना के पार जाना चाहता है—जैसे चित्रकार रंगों के पार, गायिका सुरों के पार और वैज्ञानिक या दार्शनिक सत्य के पार जाना चाहता है। उन्होंने आइंस्टीन और रवींद्रनाथ ठाकुर के दृष्टिकोणों के माध्यम से इस विचार को स्पष्ट किया। आइंस्टीन जहाँ मानव-स्वतंत्र वस्तुनिष्ठ ब्रह्मांड की खोज करते हैं, वहीं टैगोर सत्य और सौंदर्य को मानवीय चेतना से जुड़ा हुआ मानते हैं। इस प्रकार विज्ञान, अध्यात्म और मानवीय अनुभव एक-दूसरे से संवाद करते हैं। संतोष जी ने कहा कि रचनाकार को भी अद्वैत की अवस्था में पहुँचना होता है। उन्होंने रेखा राजवंशी और दिव्या माथुर जी के विचारों से सहमति जताते हुए कहा कि आलोचकों को प्रवासी साहित्य के इस ‘आइसोलेशन’ को समाप्त करना चाहिए। साथ ही उन्होंने भारत में प्रवासी लेखन पर हो रहे कार्यों की जानकारी दी और बताया कि रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय सहित अनेक संस्थानों में इस क्षेत्र में व्यापक शोध और सृजनात्मक कार्य हो रहा है। विश्वभर में रह रहे भारतीय लेखक विविध और नवीन विषयों पर लेखन कर रहे हैं, जो अत्यंत सकारात्मक संकेत है।
दिव्या माथुर ने अपने लेखन अनुभवों और कहानी संग्रहों पर प्रकाश डालते हुए यह महत्वपूर्ण बात कही कि प्रवासी साहित्य को आलोचक प्रायः हाशिये पर रख देते हैं। उन्होंने साहित्य में व्याप्त राजनीति की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया। साथ ही उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी के लेखक-लेखिकाएँ अत्यंत सशक्त और समकालीन मुद्दों पर लिख रहे हैं, जिससे प्रवासी साहित्य निरंतर समृद्ध और मजबूत हो रहा है। अतः इसे भी मुख्यधारा के साहित्य में उचित स्थान मिलना चाहिए।
विशिष्ट अतिथि डॉ. धनंजय ने लेखन प्रक्रिया को अध्यात्म से जोड़ते हुए कहा कि लेखन वही है जो लेखक के आंतरिक और बाह्य संवाद से होकर गुजरता है। लेखक विचारों को नहीं चुनता, बल्कि विचार लेखक को चुनते हैं। उन्होंने वेदांत, अद्वैत और ब्रह्मलीन होने की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सच्ची रचना तभी संभव है जब लेखक स्वयं को शून्य कर दे—नाम, पहचान और अहंकार से परे जाकर लिखे। तभी रचना में प्राण आते हैं।
रेखा राजवंशी जी ने कहा कि प्रारंभिक दौर का प्रवासी साहित्य मुख्यतः नॉस्टैल्जिया से भरा हुआ था, क्योंकि पहली पीढ़ी के प्रवासी लेखकों को भारत से दूर रहकर गहरा अकेलापन, सांस्कृतिक भिन्नताएँ और नए देश की चुनौतियाँ झेलनी पड़ीं। भारत की याद, भोजन, उत्सव और सांस्कृतिक जीवन की कमी उनके लेखन में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती थी। आज प्रवासी लेखक एक ‘त्रिशंकु’ स्थिति में है — न पूरी तरह वहाँ का, न पूरी तरह यहाँ का। अब प्रवासी साहित्य गंभीर और व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों की ओर अग्रसर हो चुका है।
इस सत्र का संचालन डॉ. राजेश कुमार ने किया तथा संयोजन डॉ. सीमा अग्निहोत्री द्वारा किया गया। सत्र के प्रारंभ में पुस्तकों का लोकार्पण संपन्न हुआ— “कुछ कहानियाँ प्रदेश से”, “गरीबनवाज़” तथा दिव्या माथुर एवं संतोष चौबे जी की पुस्तकों का विमोचन उपस्थित साहित्य प्रेमियों के मध्य किया गया। संचालक राजेश कुमार जी ने भारतीय प्रवासी लेखकों के साहित्य में आए परिवर्तनों की चर्चा की और यह प्रश्न उठाया कि प्रवासी लेखन समय के साथ किस प्रकार बदला है।
अंत में राजेश कुमार जी ने सभी वक्ताओं, अतिथियों और श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापित किया और समय की मर्यादा का ध्यान रखते हुए सत्र के समापन की घोषणा की। इस प्रकार “प्रवासी लेखन : मेरी दृष्टि” सत्र एक गंभीर, विचारोत्तेजक और समृद्ध साहित्यिक संवाद के साथ संपन्न हुआ।
सत्र – प्रवासी लेखन – मेरी दृष्टि
स्थान – दर्शनम् – 2 सभागार – इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली
सत्र दिनांक -10 जनवरी 2026
समय 09:30 से 11:00 बजे तक
