भारत की सह-भाषाएँ (बोलियाँ): नया परिप्रेक्ष्य (रिपोर्ट)

इस सत्र की अध्यक्षता सुश्री प्रो. बीना शर्मा पूर्व निदेशक, केन्द्रीय हिंदी संस्थान द्वारा की गई। उन्होंने कहा कि हिंदी में अनेक बोलियों का समावेश है। हिंदी इन सबसे अलग नहीं है। यदि हम अवधी या ब्रज की बात करते हैं तो हमारे घर के जितने संस्कार गीत हैं हमारी बोलियों में हैं ‘सासुल पनिया भरन कैसे जाऊं रसीले दऊ नैना’ बहू सास को सम्मान देने के लिये पानी भरने भी उससे पूछ कर जाती है। यदि हम लोकगीतों को हिंदी से हटा देंगे तो हिंदी क्या रह जाएगी? सूर और तुलसी के बिना हिंदी बनती नहीं है। हिंदी के पाठ्यक्रम में सूर और तुलसी की रचनाओं के साथ जायसी का पद्मावत और कबीर की सधुक्कड़ी भी है। यह सारी बोलियाँ जिनको हम सह-भाषाएँ कर रहे हैं हिंदी को मजबूत करती हैं। हिंदी के साथ-साथ चलती हैं। हर भाषा की सह-भाषाएँ हर प्रदेश में हैं। बोलियाँ भाषा को मजबूत करती हैं। हर बोली को भाषा बनाने का दर्जा दे दिया जाएगा तो बोलियों का अपना कोई अस्तित्व नहीं रहेगा। बोलियाँ बोलियों के रूप में उतनी ही समर्थ हैं जितनी भाषा। वर्गीकरण करने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती है। भाषा तब बनती है जब उसे शास्त्रीय व संवैधानिक दर्जा दे देते हैं। बोली जन-जन की आवाज है। जो सिर दर्द को ‘मूंड पीरा रहा’ कहता है। जो अनौपचारिक है। प्रेमचंद के साहित्य में भी अशिक्षित पात्र बोलियाँ ही बोलते हैं, जिसे हम हिंदी ही मानते हैं। बोलियाँ भाषा की सहायक हैं। हम इसे भाषा से अलग नहीं कर सकते। बोलियाँ स्वयं में ही निखरी हुई हैं।
बीना जी ने ब्रज-भाषा की रचना ‘खिचड़ी’ प्रस्तुत कर सबको मंत्र-मुग्ध कर दिया, कई पदार्थों को मिलाने से जब खिचड़ी बनती है तो सबको अच्छी लगती है।
इस सत्र का संचालन जीएसटी उपायुक्त और साहित्यकार डॉ. संध्या सिलावट ने किया तथा संयोजन साहित्य-सप्तक पत्रिका के सह सम्पादक श्री मनोज श्रीवास्तव ‘अनाम’ द्वारा किया गया।
संचालक डॉ. संध्या सिलावट ने भारत की सह-भाषाओं/ बोलियों की स्थिति की चर्चा की और यह प्रश्न उठाया कि वे वर्तमान समय के साथ नए परिप्रेक्ष्य की ओर किस प्रकार बदल रही हैं। जीविका हेतु लोग आवागमन कर रहे हैं और एक दूसरे के पास आ रहे हैं। ऐसे वातावरण में छोटी बोलियाँ राज-काज की भाषा में मिलकर लुप्त हो रही हैं। बस्तर में धुवी बोली दंदामी गोंडी में मिल कर गायब हो गई। झारखंड में माल पहाड़िया जब तक पहाड़ से नीचे नहीं आए उनकी बोली बनी रही, जब वे लोग शिक्षा, रोजगार को पहाड़ से निकले तो उनकी बोली में दूसरी बड़ी और व्यापक बोलियों का संक्रमण आरंभ हो गया। लोक भाषाएं अपनी शुद्धता का दावा कभी करती नहीं हैं। वे देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप बदलती, ढलती और सजती-संवरती रही हैं। वर्तमान में भूमंडलीकरण से बोली-भाषा का प्रभावित होना स्वाभाविक ही है। ऐसे में लोग अपनी बोलियों को बचाने हेतु आंदोलन स्तर पर प्रयासरत हैं।
विशिष्ट वक्ता अवधी साहित्यकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता श्री प्रदीप सारंग ने कहा कि भारत में सह-भाषाओं के बढ़ते आंदोलन अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा हैं। यदि हम भारतीय समय रहते सचेत नहीं होंगे तो बोलियों के झगड़े में वैश्विक परिदृश्य पर हिंदी पिछड़ जाएगी। श्री सारंग ने यह भी कहा कि हिंदी के समानांतर अवधी में भी सभी विधाओं में साहित्य सृजित हो रहा है और जब तक मर्यादा पुरुषोत्तम राम, तुलसीकृत रामचरित मानस, हनुमान चालीसा तथा भारत रहेगा, तब तक अवधी का झंडा बुलंद रहेगा, क्योंकि घर-घर के पूजा गृह में स्थापित रामचरित मानस की भाषा अवधी है, जो संस्कार का ग्रंथ है, अतएव अवधी संस्कार की भाषा है।
विशिष्ट वक्ता समालोचक वसंपादक भोजपुरी ज़िंदगी डॉ. संतोष पटेल ने भोजपुरी के वैश्विक विस्तार और उसमें रचित भिखारी ठाकुर के लोकगीत के साथ भोजपुरी भाषा भूमि से महात्मा बुद्ध के प्राकट्य और उनके वैश्विक शांति के प्रयासों की सराहना की। भारत के कुछ क्षेत्रों के साथ-साथ सूरीनाम, त्रिनिदाद, टोबैगो, मॉरीशस के साथ नेपाल के सीमावर्ती मधेश प्रांत में भोजपुरी का बाहुल्य है। श्री पटेल के अनुसार भोजपुरी लोकजीवन की भाषा है इसलिए उसमें खुलापन होना स्वाभाविक है।
विशिष्ट वक्तालेखिका व ब्रज-विदुषी सुश्री अर्चना चतुर्वेदी ने कहा कि एक समय था जब ब्रज में लिखने को साहित्यकार लालायित रहते थे। कालांतर में भक्ति भाव की भाषा मान लिया गया और बहुतायत में सिर्फ भक्ति साहित्य सृजित हुआ, यह भूल थी। अब नए दौर में लोकजीवन की व्यथा को कथा का विषय बनाना चाहिए। उन्होंने ब्रज की मधुरता और आत्मीयता को रेखांकित करते हुए सूर, मीरा रसखान, बिहारी समेत सम्पूर्ण रीति काल में ब्रज की सामर्थ्य शक्ति और हिंदी कविता पर एक छत्र आधिपत्य को याद किया।
प्रो. एस.एन. शर्मा जो अतिथि एवं श्रोता के रूप में उपस्थित थे, उन्होंने भी हिंदी व सह-भाषाओं को लेकर कहा कि सह भाषाएं जितनी समृद्ध होंगी, हिंदी भी उतनी ही अधिक समृद्ध होती जाएगी। एक भाषा दूसरी भाषा की विरोधी न होकर सहगामी होती है। भाषा संस्कृति की संवाहक है, विरोध और बहस राजनीतिक मुद्दे हैं।
सत्र के दौरान गणमान्य अतिथियों सुश्री सरिता बुद्धु, प्रो. एस.एन. शर्मा आदि की उपस्थिति निरंतर बनी रही।
अंत में डॉ० प्रियंका ने समस्त वक्ताओं, अतिथियों और श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापित किया।
सत्र-संयोजक श्री मनोज श्रीवास्तव ‘अनाम’ ने कहा कि भाषाएँ सीमाहीन होती हैं, उनकी कोई नियत सीमा नहीं होती, एक भाषा दूसरी भाषा का अतिक्रमण करती है व समय की मर्यादा का ध्यान रखते हुए सत्र के समापन की घोषणा की।
इस प्रकार “भारत की सह-भाषाएँ बोलियाँ: नया परिप्रेक्ष्य” सत्र एक गंभीर, विचारोत्तेजक और समृद्ध साहित्यिक संवाद के साथ संपन्न हुआ।
रिपोर्ट प्रस्तुति-डॉ. संध्या सिलावट
सत्र – भारत की सह–भाषाएँ (बोलियाँ): नया परिप्रेक्ष्य
स्थान – दर्शनम् – 2 सभागार – इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली
सत्र दिनांक – 09 जनवरी, 2026
समय – 02:00 से 03:30 बजे तक
