प्रवासी भवन में हिंदी भाषा प्रेमियों के ज्ञानार्जन हेतु एक विशेष चर्चा का आयोजन सम्पन्न

दिनांक 02.04.2026 को नई दिल्ली के आईटीओ क्षेत्र के निकट दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर स्थित प्रवासी भवन के सभागार में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद् एवं वैश्विक हिंदी परिवार के तत्वावधान में हिंदी भाषा प्रेमियों के ज्ञानार्जन हेतु एक विशेष चर्चा का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर प्रमुख वक्ता के तौर पर प्रख्यात हिन्दी भाषाविद, लेखक एवं प्रोफेसर सुरेंद्र गंभीर उपस्थित रहे। अन्य गणमान्य विद्वतजनों में वैश्विक हिंदी परिवार के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल जोशी एवं दिल्ली अध्यक्ष ऋषि कुमार शर्मा, रेलवे से सेवानिवृत्त राजभाषा अधिकारी वरूण कुमार, फ़िल्म निर्माता-निर्देशक दिनेश लखनपाल, सेवानिवृत्त ज्युडीशियल मजिस्ट्रेट ओम सपरा, चित्रकूट आर्ट गैलरी के उमेश मेहता, दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षाविद् जितेन्द्र, सुमित एवं सुशील दूबे, पत्रकार डॉ गणेश गौतम एवं ‘कलरव’ पत्रिका के संस्थापक-संपादक अनिल तिवारी तथा आकाशवाणी-दूरदर्शन कलाकार, सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी, अधिवक्ता एवं लेखक कुमार सुबोध प्रमुख रहे।
साथ ही, इस कार्यक्रम का प्रसारण एवं प्रदर्शन आनलाइन मीडिया के माध्यम से भी किया गया, जिसमें देश-विदेश के विभिन्न शहरों और क्षेत्रों के विद्वतजनों ने सहभागिता अर्जित करके आयोजन का गौरव बढ़ाया। इन प्रमुख हस्ताक्षरों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद् के राष्ट्रीय महासचिव नारायण कुमार, वातायन यूके की संस्थापिका डॉ दिव्या माथुर, शिक्षाविद् विजय मल्होत्रा, प्रवासी साहित्यकार डॉ अनूप भार्गव, अनीता वर्मा सेठी, स्वरांगी, स्वयंसिद्धा, किरण खन्ना, सुनीता बंसल, डॉ हर्षवर्धन आर्य, डॉ जयशंकर यादव इत्यादि।
इस अनौपचारिक चर्चा का शुभारंभ करने से पूर्व अनिल जोशी के कर-कमलों द्वारा प्रो॰ सुरेंद्र गंभीर को अंगवस्त्र ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।
तत्पश्चात्, अपने आरंभिक उदबोधन में अनिल जोशी अपने दृष्टिगोचर में रेखांकित किया कि वर्ष 1967 में वह गुजरात गए थे। 59 वर्षों से भाषा के विषय पर कार्य कर रहे हैं। हम अब थिंक टैंक बनाएंगे। 7 मई को एक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। भाषा के विषय पर मासिक चिंतन कराए जाने की योजना पर काम कर रहे हैं। अप्रैल महीने की 27, 28, 29 को गुजरात में होने वाले सम्मेलन के लिए मुझे आमंत्रित किया गया है। मैं आप सबसे भी उसमें सम्मिलित होने का अनुरोध करता हूं। इसके साथ ही उन्होंने प्रो॰ सुरेंद्र गंभीर को अपने वक्तव्य के लिए आमंत्रित किया।
प्रो॰ गंभीर ने उदृधत करते हुए अवगत कराया कि मैं भाषा वैज्ञानिक हूं। विश्व स्तर पर हिन्दी निरंतर कमजोर हो रही है और अंग्रेज़ी मजबूत हो रही है। इसके लिए एक्टिविज़्म की आवश्यकता है। औपचारिक भाषिक संदर्भ में अंग्रेजी का प्रभुत्व है। पटना न्यायालय ने हिन्दी में सुनवाई हुई, प्रशंसनीय कार्य सहित सराहनीय पहल है। समाज में तीन पीढ़ियों की तुलना होती है। पहली बोलती है। दूसरी पीढ़ी बोलती नहीं। तीसरी उसको सुनकर भी बोल नहीं पाती। उपयोग करना तो बहुत दूर की कोड़ी है। फ़िजी में हिन्दी आज भी जीवित है, क्योंकि वहां कक्षा आठ तक वर्तमान में भी विषय के तौर पर पढ़ाई जाती है। अन्य देशों में ऐसा नहीं हुआ, इसलिए वहां विलुप्त होती जा रही है। इस पर अवश्य शोध होना चाहिए। भाषा द्वैत की आवश्यकता है। साहित्यिक भाषा का अधिग्रहण किया जाना चाहिए। अमुक शब्द समझते हैं और बोल भी सकते हैं, किंतु हिन्दी में इसके लिए कोई प्रचलित शब्द नहीं है। भारत में साइन बोर्ड प्रमुखत: अंग्रेज़ी में हैं। टी-शर्ट पर भी अंग्रेजी में लिखा जाता है। संकेत बहुत स्पष्ट हैं। हिन्दी का अधिक-से-अधिक व्यवहारिक रूप में उपयोग किया जाना चाहिए, जिसका उद्देश्य रिजल्ट ओरियेंटेड ही होना चाहिए।
आनलाइन से जुड़े विजय मल्होत्रा ने स्वांत: सुखाय का सांकेतिक उदहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि सुरेंद्र गंभीर से मेरा परिचय गत 25-30 वर्षों पुराना संबंध है। हिन्दी को विषय के तौर पर पढ़ाया जाना चाहिए। हमने क्रैश-कोर्स बनाया है। शोर्ट टर्म कोर्स विदेशों में रहने वालों के लिए भी तैयार है। यहां भी यह उपलब्ध कराए जाएंगे। ओपन कोर्स के माध्यम से हिन्दी सीखाएंगे। साहित्यिक भाषा की जरूरत नहीं है। मात्र टेक्स्ट भी डाले जाने से प्रोत्साहन मिलता है। उन्होंने आगे ज्ञानार्जन किया कि पाठ्यक्रम को रोचक बनाकर प्रस्तुत किया जाना चाहिए। प्रचार-प्रसार के लिए लक्ष्य निर्धारण करना होगा। भाषा को इकोनॉमी से भी जोड़ा जाना चाहिए।
जितेन्द्र ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसा निर्णय लिया गया है कि न्यायालय में प्राधिकृत पाठ हिन्दी में होगा। मैं अभिनंदन पत्र लिखता हूं। एटीएम में हिन्दी ओप्शन का उपयोग करके उसका स्क्रीनशॉट अपने सोशल मीडिया पर यह लिखकर डाला कि हिन्दी में उपयोग करने पर पैसे उतने ही निकलेंगे। ‘समझौता’ कहानी के प्रकरण के माध्यम से रेखांकित किया कि इसके गर्भ में छिपा सत्य यह था कि कहानी में सर्कस का प्रस्तोता हिन्दी में स्नातकोत्तर था।
आनलाइन माध्यम से जुड़े प्रवासी साहित्यकार अनूप भार्गव ने विमर्श में सहभागिता के दौरान व्यक्त किया कि मैं स्वयं भाषाविद नहीं हूं। अमेरिका के संदर्भ में टिप्पणी कर रहा हूं कि भाषा किस तरह जिंदा रह सकती है। यह पीढ़ियों के बीच कितनी जिंदा रह पाई है। इसका दायित्व अभिभावकों पर निर्भर है कि वह कितना ध्यान रखते हैं। वह अपनी रूचि अनुसार जुड़ते हैं। भारत की पीढ़ी का जितना प्रेम और महत्व हिन्दी के प्रति होगा, वैसा ही विदेशों में उसका उतना ही प्रखर असर प्रत्यक्षदर्शी परिलक्षित होता दिखाई देगा।
वरूण कुमार ने अपने उदबोधन में स्पष्ट किया कि हिन्दी के प्रति चिंता और चिंतन से चर्चा की शुरूआत की गई, जिसमें चिंता अधिक थी। भाषा के विलोप की प्रक्रिया जारी है, किंतु विलुप्त होने वाली संभावना नहीं है। अतीत के दिनों हिन्दी के समाचार-पत्रों में मंदड़ियों-तेजड़ियों का पृष्ठ आया करता था, समय के साथ वह विलुप्त हो गया। विद्यालयों में अंताक्षरी बन्द‌ हो गई। मैंने अपनी सेवाओं के दौरान रेलवे में शुरू की थी, किंतु मेरे सेवानिवृत्ति पश्चात् पुनः बन्द हो गई।
आनलाइन जुड़ी स्वरांगी ने अपने अतिसंक्षिप्त वक्तव्य में अवगत कराया कि विदेशों में रोमन की प्रक्रिया से हिन्दी पढ़ाई जाती है। दादा-दादी अपने पोते-पोतियों से वार्तालाप हेतु अंग्रेज़ी सीख रहे हैं।
पुनः अभी तक का विचार-विमर्श सुनने के बाद बीच में प्रो॰ सुरेंद्र गंभीर ने ध्यानाकर्षित करते हुए कहा कि आज का मंच सशक्त है, इसलिए इ की चर्चा मैंने अनिल जोशी से मिलने पर की थी। हिन्दी विषय जितना जरूरी है, वह उतना ही सीखता है। परिवर्तन की दिशा बड़ी स्पष्ट है। अंग्रेज़ी की एक शहर में पूजा होती है। हिन्दी को भी ऐसे ही उसे बचाने के प्रयास किए जाने चाहिए।
उमेश मेहता ने अतिसंक्षिप्त संबोधन में विनम्रता से स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया कि शुरुआत हमें अपने आप से करनी है। मैंने स्वयं डरते-डरते होटल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान हिन्दी में वक्तव्य देते हुए शुरूआत करने का प्रयास किया था। माहौल अंग्रेजी का था, इसलिए डर था कि कहीं निकाल ना दिया जाए।
दिनेश लखनपाल ने अपने अतिसंक्षिप्त वक्तव्य में रेखांकित किया कि हरिवंशराय बच्चन से ज्यादा काम हिन्दी के लिए अमिताभ बच्चन ने किया है। केबीसी उनका खजाना है। इसी के कैप्सूल बनाकर उन्हें प्रसारित किया जाना चाहिए।
ओम सपरा ने संक्षिप्त उदगारों में स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि बोलचाल और साहित्य भाषा में भेद ना करें। व्यवस्था के माध्यम से हिन्दी के यथोचित अनुपालन का व्यवस्थित आदेश हो।
सुमित ने स्पष्ट किया कि हिन्दी विषय को बेहतर तरीके से पढ़ाया जाना चाहिए।
कुमार सुबोध ने अपनी स्मृतियों से उकेरकर उदाहरण देते हुए अवगत कराया कि बैंक में कार्यरत रहते हुए वह अपनी 150 सहकर्मियों को नियमावली एवं कार्य-प्रणाली की हिदायतों से ज्ञानार्जन हेतु हिन्दी में ही उन्हें अपना संबोधन दिया करते थे। इससे सहकर्मियों को लगता था कि शायद मेरी अंग्रेज़ी कमजोर है। यह फुसफुसाहट कानों में पड़ते ही उन्हें अंग्रेज़ी में भी तुरंत संबोधित किया करता था, किंतु मेरा प्रथम संबोधन हिन्दी में दिया करता था। उन्होंने यह भी स्मरण कराया कि उनके अपने घर में सभी सदस्य नित्यप्रति किसी भी विषय पर वार्तालाप हिन्दी में ही करते हैं।
अनिल तिवारी ने उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनके द्वारा प्रकाशित की जाने वाली हिन्दी पत्रिका ‘कलरव’ को अधिकांशतः लोगों ने ‘कलख’ कहकर ही पढ़ा है।
सुशील ने अपने अतिसंक्षिप्त उदबोधन में अवगत कराया कि हिन्दी की ऐसी परिस्थिति के लिए हम स्वयं दोषी हैं। हम शब्दकोश को व्यवहारिक रूप से इस्तेमाल ही नहीं कर पाते।
ऋषि कुमार शर्मा ने अपनी स्मृतियों के प्रकरण को उदृधत करते हुए रेखांकित किया कि 33 वर्ष पूर्व रूसी राजनयिक को भारत प्रवास के दौरान अपने गांव लेजाने का अवसर मिला था। उन्होंने ने भी यह ध्यान दिलाया था कि आपके यहां अधिकांश बोर्ड लगभग 90 % अंग्रेज़ी में थे।
इसी बीच प्रो॰ सुरेंद्र गंभीर ने पुनः ध्यानाकर्षण करते हुए कहा कि विजिबिलिटी बढ़ाने के लिए वातावरण तैयार करके इसके लिए माहौल बनाना होगा। हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने पर समय बेकार नहीं करना चाहिए। देश की सभी भाषाएं समान हैं।
अनिल जोशी ने अपने उदबोधन से अवगत कराया कि वह आपातकाल में ढाई महीने जेल में रहे थे। उस समय राजभाषा विभाग के लोगों से जुड़ा हुआ था। एक्टिविस्ट रहा हूं। हमें अपने प्रभाव समूहों को कम नहीं आंकना चाहिए। हमने स्वयं अपनी भाषा के साथ खिलवाड़ किया है। सोच को बदलना होगा। साथ ही, व्यवस्था में सुधार लाने की आवश्यकता है। फ़िजी में आठवीं तक हिन्दी पढ़ाई जाती है। 90% लोगों को यही नहीं पता है कि वह क्या दवाई खा रहे हैं।
समापन से पूर्व जल्द ही अगली चर्चा पर एकत्रित होने की सहमति सहित दोनों माध्यमों से जुड़े सभी विद्वतजनों का धन्यवाद और आभार ज्ञापित करने के साथ यह विशेष और महत्त्वपूर्ण चर्चा सम्पन्न हुई।
इस अवसर पर मेरे द्वारा लिए गए कुछ चित्र आप सभी के अवलोकनार्थ यहां प्रस्तुत हैं।
रिपोर्ट – कुमार सुबोध

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