अखिल भारतीय हास्य-व्यंग्य कवि-सम्मेलन का भव्य आयोजन सम्पन्न

ल्यूटिन्स के प्रतिष्ठित लोदी रोड स्थित चिन्मय मिशन के हैमकौ सभागार में शीला टी पी झुनझुनवाला फाउंडेशन के तत्वावधान में अखिल भारतीय हास्य-व्यंग्य कवि-सम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया। इस आयोजन पर आरंभिक उदबोधन के माध्यम से सूत्रधार रंगकर्मी, फ़िल्म निर्माता-निर्देशक एवं सृजनकर्ता सुशील भारती ने अवगत कराया कि यह आयोजन दो सत्रों में विभक्त है, जिसके प्रथम सत्र में भजन-संध्या और द्वितीय सत्र में अखिल भारतीय हास्य-व्यंग्य कवि-सम्मेलन निर्धारित किया गया है।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र अर्थात् भजन-संध्या का शुभारंभ दरभंगा घराना अर्थात् मल्लिक घराना की परंपरा से संबंध सुविख्यात शास्त्रीय संगीत की द्रुपद विधा के ओजस्वी और प्रखर सुविख्यात गायक डॉ प्रभाकर नारायण पाठक द्वारा स्वयं हारमोनियम की जुगलबंदी सहित अपने मुखारविंद से भक्तिमय वातावरण को संचरित करते हुए अपने सहयोगी साजिंदों वृंदावन से पधारे सुप्रसिद्ध तबला वादक पं हरिमोहन शर्मा, सितार पर पद्मभूषण पं देबू चौधरी के शिष्य एवं युवा सितार वादक उमाशंकर, ओक्टो पैड पर नवीन भाई एवं कीबोर्ड पर तारा भाई ने अपने वाद्ययंत्रों की भक्तिरस की उत्कृष्ट सृजनात्मक धुनों के द्वारा सुरमई भजन-संध्या के माध्यम से किया गया, जिसमें उन्होंने राम, कृष्ण, राधा, मीरा पर भजनों की प्रस्तुतियों सहित कुछ चुनिंदा बहुचर्चित रचनाओं द्वारा सभागार में उपस्थित जनसमुदाय के मध्य देश-विदेश के विभिन्न शहरों और क्षेत्रों से पधारे विराजित प्रबुद्धजनों एवं विद्वतजनों को भक्तिरस की भाव-भंगिमाओं से सराबोर तो किया ही, साथ ही, उन्हें अपने संग भजनों की पंक्तियों को बारंबार दोहराते हुए सहयोग देने को सम्मिलित भी किया गया। ऐसे भक्तिमय वातावरण में समस्त जनसमुदाय भक्तिमय रसधार की नदी में गोते लगाते हुए भाव-विभोर हो गया और एक-एक प्रस्तुति पर वाह-वाही के उदघोषों से साथ गड़गड़ाती करतल-ध्वनि से प्रस्तोताओं का उत्साहवर्धन करते हुए समस्त वातावरण को भक्तिरस और उसकी भक्ति भावनाओं से ओत-प्रोत करके गुंजायमान कर दिया।
तत्पश्चात्, अंजलि गुप्ता द्वारा झुनझुनवाला संस्थान से संबंधित कुछ अनकहे-अनसुने-अनछूए पहलुओं को सभागार में विराजित जनसमुदाय के समक्ष अपने संक्षिप्त वर्णन में उदृधत किया गया। इसी क्रम में भारती फिल्म्स द्वारा शीला टी पी झुनझुनवाला फाउंडेशन की गत 14 वर्षों से चिंहित कार्य-क्षेत्रों की विभिन्न गतिविधियों एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य में समर्पण भाव से अर्जित किए जा रहे कार्य-कलापों पर एक सारगर्भित और विवरणात्मक वृतचित्र के प्रस्तुतीकरण द्वारा सभागार में विराजित श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत करके उन्हें ज्ञानार्जन प्रदान किया गया।
अपने आरंभिक उदबोधन में शीला झुनझुनवाला ने अवगत कराया कि टी पी झुनझुनवाला ने बहुचर्चित और लोकप्रिय नाटक “यहां बंदे सस्ते मिलते हैं” वर्ष 1968 में लिखा था, किंतु उसके बाद एकाएक कुछ वर्षों पश्चात् वह कहीं विलुप्त हो गया था। उनके जाने के बाद मैंने उसे बहुत खोजा था, परंतु असफल रही थी। फिर किसी ने मुझे बताया था कि जोर्डन में इस नाटक पर बनी एक फिल्म दिखाई गई थी। उसी क्रम में मेरी बेटी को उसके आस्ट्रेलिया प्रवास के दौरान इस नाटक की एक प्रति लायब्रेरी से मिली थी। वहीं से मैंने इसे मंगाया था और सौभाग्य प्रकाशन के सुधेंदु ओझा द्वारा प्रकाशित किया गया है। तत्पश्चात्, इसका लोकार्पण डॉ प्रेम जनमेजय, शीला झुनझुनवाला, सुरेन्द्र शर्मा, डॉ यतीन्द्र अग्रवाल, सुधेंदु ओझा एवं शीला टी पी झुनझुनवाला की सुपुत्री निहारिका कुच्छल के कर-कमलों द्वारा विद्वतजनों से अटे पड़े जनसमुदाय के समक्ष किया गया।
डॉ प्रेम जनमेजय ने अपने उदबोधन में स्पष्टता से उदृधत किया कि मैंने कभी टी पी झुनझुनवाला देखा नहीं और ना ही उनसे कभी मिलना हुआ था। शीला जी ने मुझे यह उपन्यास प्रेषित करके मुझे अपने उदगार व्यक्त करने को कहा था। पांच-छह मिनट बोलने का आग्रह किया था, अर्थात् गागर में सागर। मुझसे लौटे में सागर को भरने की अपेक्षा की गई थी। आज यहां वृतचित्र देखा। उनकी इस पुस्तक के माध्यम से उनकी सोच, समाज के प्रति उनके दृष्टिकोण और व्यंग्य चेतना के बारे में जानने समझने का अवसर मिला। किसी लेखक को उसकी पुस्तक के माध्यम से जानने के अतिरिक्त ओर कोई अधिक अपेक्षित स्त्रोत हो नहीं सकता। इससे मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि शीला जी और सुरेन्द्र शर्मा बहुत अच्छे अभिनेत्री और अभिनेता हैं। धर्मवीर भारती ने इसकी भूमिका लिखी है। स्वयं उन्होंने कभी व्यंग्य नहीं लिखा था, व्यंग्य प्रकाशित अवश्य किए थे, किंतु इसमें संग्रहित उन्होंने व्यंग्य की नई शब्दावली को गढ़ दिया है। इसके कुछ उदहारण श्रोताओं के समक्ष उदृधत करते हुए ज्ञानार्जन किया। यह नाटक निश्चित रूप से सामाजिक परिप्रेक्ष्य की विभिन्न विसंगतियों को समाज के समक्ष स्पष्टता से उजागर करने के साथ-साथ उनके निवारण हेतु भी मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह हिन्दी साहित्य जगत की नाटक-श्रृंखला में वर्षों से एक मील का पत्थर साबित हुआ प्रतिस्थापित नाटक है। शीला जी के इस पुनीत कार्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उन्होंने अपनी वाणी को विराम दिया।
शीला झुनझुनवाला ने अपने उदबोधन में अवगत कराया कि यह ईश्वरीय कृपा है कि शरीर में इतनी टूट-फूट के बावजूद मैं आप सभी के समक्ष खड़ी हूं। मैं आप सभी से व्यक्तिगत रूप से नहीं मिल पाई हूं, किंतु आप सभी की उपस्थिति का भान मेरे संज्ञान में विद्यमान है। फाउंडेशन पर दृष्टिगोचर प्रस्तुत करते हुए कहा कि हमारे इस फाउंडेशन की स्थापना चार दशक पूर्व वर्ष 1979 में हुई थी। इस बीच में बहुत कुछ जुड़ा, बहुत कुछ टूटा। जो कुछ जुड़ा, वो इतना सुन्दर जुड़ा कि उसको मापने का कोई पैमाना नहीं था। वो एक भरा हुआ चशक था, जिसमें अमृत-ही-अमृत था। वो चशक जब। टूटा, तो मैं शून्य सहित महाकाल की शरण में पहुंच गई थी, जहां अतीत की प्रतिध्वनियां लौट-लौटकर दंश दे रही थी। ऐसे समय में मुझे भवानी प्रसाद मिश्र की कविता याद आती थी, जो बार-बार मेरे मन-मस्तिष्क पर दस्तक देती थी। उसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार थी कि ‘कभी-कभी छोड़ जाता है कोई आदमी चीजें नहीं, बातें।
काट देते हैं जिनके सहारे बाद के लोग, अंधेरे से अंधेरी रातें।’
ऐसी परिस्थिति थी, तब मैंने सोचा था कि –
“घुट-घुटकर आंसू पीकर रोने से क्या होगा, आंसू की बूंदों को आग की चिंगारी करके आग बनकर जी।”
“वक्त तो सबको मिलता है जिंदगी बदलने के लिए।
लेकिन जिंदगी दोबारा नहीं मिलती, वक्त को बदलने के लिए।”
काव्यात्मक अभिव्यक्ति के साथ अपने ठाकुर साहब की स्मृतियों की याद मन में ताज़ा करते हुए मैंने सृजनात्मकता के माध्यम से अवसाद से उभरकर सामाजिक परिप्रेक्ष्य में समर्पण भाव से निरंतरता से उपजती नवीनतम गतिविधियों के माध्यम से जीवन को नवीन पड़ाव पर प्रतिस्थापित करने के लिए इस अभियान को गत 37 वर्षों से चलाएमान रखा हुआ है, जिसके लिए उन्होंने फाउंडेशन के विभिन्न कार्य-कलापों से जुड़े, संबंधित एवं सहयोग प्रदाताओं के प्रति कृतज्ञतापूर्वक धन्यवाद और आभार ज्ञापित करने के पश्चात् अपनी वाणी को विराम दिया।
सुरेन्द्र शर्मा ने टी पी झुनझुनवाला से अपने व्यक्तिगत संबंधों को रेखांकित करते हुए अवगत कराया कि डिप्टी कमिश्नर और फिर कमिश्नर होते हुए भी इस नाटक के 25 शो किए गए थे, जिसके प्रत्येक शो के समय इनकम टैक्स के चपरासी से टी पी तक सभी लोग एक साथ बैठकर खाते थे। शीला जी और मैं ही बाहर वाले थे। जिंदगी कैसी है और समाज में व्याप्त कुरीतियों पर इस नाटक ने ध्यानाकर्षण सहित उनके प्रति सुधार हेतु कर्तव्य परायण क्रिया-कलापों को अमल में लाने के मार्ग को भी प्रशस्त करने के आयाम भी प्रस्तुत किए हैं।
उन्होंने टी पी झुनझुनवाला से जुड़ी अपनी विसमृतियों की एक किस्सागोई के माध्यम से रेखांकित किया कि उन्हें अपने साथ-साथ दूसरे के समय का भी ध्यान रहता था। पूर्व वित्तमंत्री के प्रकरण के माध्यम से जनसमुदाय ध्यानाकर्षण किया कि टी पी झुनझुनवाला का व्यक्तित्व कितना पारखी था। उनमें सामने वाले को परखने की कितनी क्षमता थी। वह वित्तमंत्री मेरा मित्र था। उसने टी पी से भोजन पर मिलने की इच्छा जताई थी, सो मैंने उनकी इच्छानुसार एक दिन अपनी मौजूदगी में यह संभव करा दिया था। दो घंटे उनके साथ रहने के बाद भी जाने तक वह टी पी से आंखें नहीं मिला सका था। बाद में, टी पी ने मुझसे कहा था कि यह घटिया आदमी है, तभी तो मेरी आंख-में-आंख डालकर बात नहीं कर पाया। ममुझे मंत्री से डरना चाहिए अथवा उसे मुझसे। इसका मतलब साफ था कि वह मेरे से कुछ अनुचित कराने की अपेक्षा स्वीकार्य करके मिलने आया था, जिसके लिए मुझे देखकर ऐसा साहस नहीं जुटा पाया।
उन्होंने फिर आगे कहा कि एक बार मुझे किशन महाराज की सहायतार्थ ₹1,000/- का चैक लाने के लिए एक बड़े उद्योगपति के पास भेजा था और उसने मुझे डेढ़ घंटा बिठाने के बाद ₹500/- का चैक देकर विदा कर दिया था। उसी उद्योगपति को एक दिन अपने कार्यालय में बुलाकर बाहर एक-सवा घंटा बैठाए रखा था और इसी बीच मुझे उसके सामने पहुंचते ही यह कहकर भीतर बुला लिया था कि साहब, आपका इंतज़ार कर रहे हैं। इसे कहते हैं कि एक कवि का सम्मान कैसे किया जाता है। बाद में उन्हें बुलाकर एहसास कराया कि यदि मैंने किसी को आपके पास भेजा है, तो इसका मतलब यह है कि उसके माध्यम से मैं स्वयं आपके पास आया हूं। आप धनासेठ अपने घर होंगे, यहां नहीं। अपना ₹500/- का चैक उनके चैक के साथ उन्हें थमाते हुए कहा था कि इसे किसी जरूरतमंद को दे देना।
अपने वक्तव्य को पूर्णता प्रदान करने से पूर्व भारी मन से भावुकतापूर्ण व्यक्त किया कि आज टी पी साहब नहीं रहे, लेकिन उनके समय में कोई शाम ऐसी नहीं रही कि जब मैं दिल्ली में मौजूद हूं और मैं उनके साथ नहीं हूं। यह नाटक उन्हें हमारे बीच सदैव मौजूद रखेगा।
तत्पश्चात्, द्वितीय सत्र में निर्धारित अखिल भारतीय हास्य-व्यंग्य कवि-सम्मेलन का प्रारंभ किया गया। इस सत्र की अध्यक्षता का दायित्व सुविख्यात गीतकार एवं गज़लकार बाल स्वरूप राही के सशक्त हाथों में रहा। पद्मश्री अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हास्य-व्यंग्य कवि सुरेन्द्र शर्मा ने बहुमूल्य सानिध्य प्रदान किया। अचानक अस्वस्थता के कारण व्यंग्य-ऋषि डॉ हरीश नवल उपस्थित नहीं हो सके। संचालन के कार्यभार का निर्वहन सुप्रसिद्ध कवि चिराग जैन ने किया। इस अवसर पर आमंत्रित अन्य मंचासीन कवियों-कवयित्रियों में अरूण जैमिनी, डॉ सीता सागर, नीलोत्पल मृणाल एवं मनीषा शुक्ला प्रमुख रहे।
संचालक द्वारा क्रमबद्ध तरीके से अपने-अपने काव्यपाठ हेतु काव्य की विभिन्न विधाओं के हस्ताक्षरों को आमंत्रित किया गया।
जहां एक ओर, कुछ चुनिंदा मुक्तकों के द्वारा शुरूआत करने पर मंच के विशेष आग्रह पर नीलोत्पल मृणाल ने अपने ओजस्वी स्वर और सशक्त शब्दावली से सिंचित विवाह के अवसर पर गाए जाने वाले सौहर की प्रस्तुति से समां बांध दिया। वहीं दूसरी ओर, पेशे से इंजीनियर और कवयित्री मनीषा शुक्ला ने क्षणिकाओं के द्वारा काव्यात्मक छेड़छाड़ की भाव-भंगिमाओं से ध्यानाकर्षण किया कि प्रेम और लड़ाई करनी हो, तो शादी करनी चाहिए। सब कुछ मैचिंग मिल जाता है, किंतु पति मैचिंग नहीं मिल सकता।
चिराग जैन ने पुरूष मिट्टी और स्त्री बहता पानी की संज्ञा के माध्यम से संबंधों को व्याख्यायित करते हुए कहा कि इसी को सह रहे हैं हम। उन्होंने मंगलयान पर अपनी कविता सुनाई और मंच की फरमाइश पर अपनी बहुचर्चित रचना ‘पुरूषोतम’ से लक्ष्मण मूर्च्छित प्रकरण की व्यथा को हृदयस्पर्शी करूणामयी भावनाओं से ओत-प्रोत अंश को अपने चिर-परिचित अंदाज में ओजस्वी वाणी में वाचन के साथ अपना स्थान ग्रहण किया।
डॉ सीमा सागर ने काव्यपाठ का आरंभ करते हुए कुछ चुनिंदा मुक्तक सुनाए और तत्पश्चात्, समयावधि को ध्यान में रखते हुए सीधे-सीधे अपने सूफी गीत ‘मगर मैं तेरे दर आई…..’ को सुरम्य प्रस्तुति के द्वारा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।
अरूण जैमिनी ने अपनी पृष्ठभूमि की शब्दावली हरियाणवी में अपने अनूठे अंदाज में शुरूआत कुछ किस्सागोई के संस्मरणों को उदृधत करते हुए कहा कि कटटपा ने बाहुबली को क्यों मारा?, डाक्टर बनूंगा, मां ने कहा – मेरे बेटे को तूले जा, रोज़ डे से ब्रेक अप डे तक, को हास्य-व्यंग्य की क्षणिकाओं के माध्यम से अपने लिए माहौल तैयार किया और अपनी वाणी को विराम देने से पूर्व अपनी श्रेष्ठतम हास्य रस की प्रेम कविता को सुनाते हुए दिया।
बाल स्वरूप राही ने अपनी स्मृतियों से उकेरकर एक प्रकरण के द्वारा अवगत कराया कि चिरंजीत मुझे एक कवि सम्मेलन में साथ लेकर गए थे। उसकी अध्यक्षता दिनकर जी कर रहे थे। उस समय अपनी किशोरावस्था में रची कविता सुनाई थी कि ‘इतना ख्यालों में खोया हुआ था कि तेरे घर के सामने से निकल गया…..।’ ‘आंख सितारों सी डबडबाती है, अब तो नींद भी मेरे घर आने से घबराती है…..।’ अपनी श्रेष्ठतम ग़ज़ल का वाचन किया कि ‘इतना तो बुरा तेरा भी अंज़ाम नहीं है, सूरज भी सुबह का शाम नहीं है…….।’ अपने काव्यपाठ के समापन से पूर्व मंच के आग्रह पर अपने श्रेष्ठतम शेरों-शायरी के जौहर भी प्रस्तुत किए कि “हम पर दुख का परबत टूटा, तब हम ने दो-चार कहे। उस पर क्या बीती होगी, जिसने शेर हजार कहे।”
सुरेन्द्र शर्मा ने अपने काव्यपाठ को आरंभ करते हुए अवगत कराया कि उन्होंने बाल स्वरूप राही के अभी अंत में सुनाए शेर पर पैरोडी बनाई थी। उसे अपने स्वर में वाचन करके सुनाया। तराजू का प्रकरण से ज्ञानार्जन किया कि राम से मेरा पलड़ा सदैव भारी होगा, क्योंकि मेरे भीतर का राम मेरे साथ रहता है। ‘सूरज तुम महान हो…..’, ‘घोड़े और अजगर की किस्सागोई’, ‘गंगा में नहाने का किस्सागोई…..’ तथा ‘मंदिर में जाकर प्रभु से कहता कहता हूं कि मुझसे लेले, आज बादशाह तेरे दर पर कुछ देने आया है…..’ के माध्यम से सामाजिक परिवेश में व्याप्त ढोंग और ढकोसलो पर टीका-टिप्पणी के माध्यम से अपने चिर-परिचित अंदाज में कटाक्षपूर्ण व्याख्यायित करके विस्तार दिया। साथ ही, विकास के प्रकरणों पर प्रहार करते हुए अवगत कराया कि इंसान ने तरक्की तो की है, किंतु एक्स्ट्रा पार्ट नहीं दिया गया है। ओर कुछ नहीं, तो इंसानियत ही डाल दिया कर। ईश्वर से प्रार्थना कि विश्व शांति के लिए लड़ने वालों के एक-एक लीडर को अपने पास बुला ले, अपने आप शांति स्थापित हो जाएगी। अमीरी तभी तक अकडती है, जब तक गरीबी उसे ताकती है। अन्यथा उसकी क्या बिसात?अपने लेवल से ऊपर उठकर मीठे हो जाओगे। अपने बाप की बात मानना सदैव फायदेमंद होता है। मंदिर में दान करने की बजाए कारखाना लगाओ, जिससे जरूरतमंदों को रोज़गार दे सको। अपनी वाणी को विराम देने से पूर्व अपनी श्रेष्ठतम सिग्नेचर काव्य रचना का पाठ किया कि ‘क्या पता तुम ना रहो, क्या पता हम ना रहें…..।’
इस अवसर पर श्रोता-दीर्घा में विभिन्न क्षेत्रों की उपस्थित रही गणमान्य विभूतियों में पद्मश्री शीला झुनझुनवाला, पद्मश्री रामबहादुर राय, वीरेंद्र मिश्र, कुसुमलता सिंह, डॉ मधु पंत, डॉ उमा मालवीय, घनश्याम शारदा, नीता शारदा, डॉ रमा पाण्डेय, सुनील कुच्छल, निहारिका कुच्छल, रामनिवास जाजू, घनश्याम शारदा, नीता शारदा, डॉ यतीश अग्रवाल, डॉ रेखा अग्रवाल, डॉ प्रभाकर नारायण पाठक, डॉ प्रेम जनमेजय, डॉ अरूणा गुप्ता, डॉ पुष्पा सत्यशील, डॉ नीलम वर्मा, अर्चना प्रभाकर, अतुल विष्णु प्रभाकर, दिनेश लखनपाल, कुमार सुबोध इत्यादि प्रमुख रहे।
दोनों सत्रों को गति प्रदान करने से पूर्व सभी कलाकारों एवं कवियों-कवयित्रियों का निहारिका कुच्छल के कर-कमलों द्वारा पुष्पगुच्छ भेंट स्वरूप प्रदान करके उन्हें सम्मानित किया गया।
समापन से पूर्व कार्यक्रम में देश-विदेश के विभिन्न शहरों और क्षेत्रों से पधारे सभी प्रबुद्धजनों, विद्वतजनों एवं आगंतुकों के प्रति अपनी उपस्थिति दर्ज कराने हेतु धन्यवाद और आभार ज्ञापित करने के पश्चात् यह भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ।
रिपोर्ट – कुमार सुबोध
