राष्ट्रगान, राष्ट्रवाद और रवींद्रनाथ टैगोर की चेतना

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत का राष्ट्रगान लिखा — “जन गण मन” उन्होंने ही वह गीत भी लिखा जिसे बाद में बांग्लादेश  ने अपना राष्ट्रगान बनाया — “आमार सोनार बांग्ला”। एक ही व्यक्ति की रचना दो देशों की आत्मा बन सकती है — यह केवल साहित्यिक घटना नहीं, बल्कि मनुष्यता की सबसे सुंदर संभावनाओं में से एक है। किन्तु आज के उग्र राजनीतिक वातावरण में प्रश्न उठता है — क्या आज का समय रवीन्द्रनाथ टैगोर को उसी उदारता से स्वीकार कर पाता? या उन्हें संदेह, राष्ट्रवाद की संकीर्ण परिभाषाओं और राजनीतिक आरोपों के बीच खड़ा कर दिया जाता? यह प्रश्न केवल टैगोर का नहीं, बल्कि उस सभ्यता का है जो अपने कवियों को समझने के बजाय उन्हें खेमों में बाँटना चाहती है। टैगोर का राष्ट्रवाद सीमाओं से बड़ा था। वे मिट्टी से प्रेम करते थे, पर मनुष्य को मिट्टी से छोटा नहीं मानते थे। उनके लिए राष्ट्र केवल सत्ता की इकाई नहीं था; वह संस्कृति, भाषा, स्मृति, करुणा और साझा चेतना का विस्तार था। उन्होंने कभी घृणा को देशभक्ति का पर्याय नहीं माना। आज का समय दुर्भाग्य से हर विचार को “हम” और “वे” में बाँटने का आदी होता जा रहा है। अगर कोई व्यक्ति दूसरे देश की संस्कृति, भाषा या मनुष्यता के प्रति सम्मान व्यक्त करे, तो उस पर तुरंत संदेह किया जाता है। ऐसे माहौल में यदि कोई कवि दो देशों की आत्मा को एक साथ छू ले, तो शायद उसे “अत्यधिक उदार”, “राष्ट्र-विरोधी”, या “दूसरे राष्ट्र का समर्थक” कह दिया जाए।

विडंबना देखिए —

जिस व्यक्ति की रचनाएँ करोड़ों लोगों के हृदय में राष्ट्रप्रेम जगाती हैं, वही व्यक्ति आज की राजनीति में राष्ट्रभक्ति की परीक्षा देने को मजबूर किया जा सकता था। परंतु टैगोर का दृष्टिकोण राजनीति से कहीं ऊँचा था। उन्होंने मनुष्य को पहले मनुष्य माना, बाद में भारतीय, बंगाली या किसी अन्य पहचान का धारक। उनकी दृष्टि में संस्कृति दीवारें नहीं बनाती; पुल बनाती है। “आमार सोनार बांग्ला” केवल बांग्लादेश का गीत नहीं, बल्कि उस बंगाल की मिट्टी, नदी, हवा और संवेदना का गीत है जिसे इतिहास ने बाद में दो देशों में बाँट दिया। क्या मिट्टी की खुशबू सीमा रेखाओं में बँट जाती है? क्या भाषा पासपोर्ट देखकर जन्म लेती है? क्या कविता किसी राष्ट्र की संपत्ति भर होती है?

टैगोर शायद कहते —

“राष्ट्र यदि मनुष्यता को छोटा कर दे, तो वह चेतना नहीं, अहंकार बन जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम राष्ट्रवाद को घृणा से नहीं, संवेदना से समझें। देशप्रेम का अर्थ दूसरे देश से नफरत करना नहीं होता। एक सच्चा कवि सीमाओं का सम्मान करता है, पर मनुष्यता को सीमाओं में कैद नहीं करता। रवीन्द्रनाथ टैगोर इसलिए महान हैं क्योंकि उन्होंने राष्ट्र को प्रेम सिखाया, उन्माद नहीं। उन्होंने संस्कृति को साझा विरासत माना, राजनीतिक हथियार नहीं। और शायद इसी कारण आज भी भारत और बांग्लादेश — दोनों की आत्मा में उनकी आवाज़ गूँजती है। समय बदल गया है, राजनीति बदल गई है, नारों की भाषा बदल गई है — पर एक सच्चे कवि की चेतना आज भी सीमाओं से बड़ी है।

लेखिका :– दोलन राय

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