प्रेम की बिरादरी – व्यंग्य

उनका सबकुछ पवित्र है । जाति में बाजे बजाकर शादी हुई थी । पत्नी ने 7 जन्मो में किसी दूसरे पुरुष को नहीं देखा । उन्होंने अपने लड़के-लड़की की शादी सदा मण्डप में की । लड़की के लिए दहेज दिया और लड़के के लिए लिया। एक लड़की खुद पसन्द की और लड़के की पत्नी बना दिया |

सबकुछ उनका पवित्र है । प्रापर्टी है । फुरसत में रहते हैं । दूसरों की कलंक-चर्चा में समय काटते हैं । जो समय फिर भी बच जाता है उसमें मूँछ के सफेद बाल उखाडते हैं और बर्तन बेचनेवाली की राह देखते हैं ।

पवित्रता का मुँह दूसरों की अपवित्रता के गन्दे पानी से धुलने पर ही उजला होता है । वे हमेशा दूसरों की अपवित्रता का पानी लोटे में ही लिये रहते हैं । मिलते ही पवित्रता का मुँह धोकर उसे उजला कर लेते हूँ । वे पिछले दिनों 2 लड़कियों के भागने, 3 स्त्रियों के गर्भपात, 4 की गैर -बिरादरी में शादी और 2 पतिब्रताओं के प्रणय-प्रसंग बता चुके हैं | अभी उस दिन दांत खोदते आये। भोजन के बाद कलंक-चर्चा का चूर्ण फाँकना जरूरी होता है। हाजमा अच्छा होता है । उन्होंने चूर्ण फकिना शुरू कर दिया- आपने सुना, अमुक साहब की लड़की अमुक लड़के के साथ भाग गयी और दोनों ने इलाहाबाद में शादी कर ली । कैसा बुरा जमाना आ गया । मैं जानता हूँ कि वे बुरा जमाना आने से दुखी नहीं, सुखी हैं । जितना बुरा जमाना आयेगा, वे उतने ही सुखी होंगे – तब वे यह महसूस करके और कहकर गर्व अनुभव करेंगे कि इतने बुरे जमाने में भी हम अच्छे के अच्छे हैं” । कुछ लोग बडे चतुर होते हैं । वे सामूहिक पतन में से निजी गौरव का मुद्दा निकाल लेते हैं और अपने पतन को समूह का पतन कहकर बरी हो जाते हैं |

मैंने अपनी दुष्ट आदत के मुताबिक कहा – इसमें परेशान होने की क्या बात है। देश में अच्छी शादियाँ लड़की भगाकर ही हुई हैं । कृष्ण ने रुक्मणी का हरण किया था और अर्जुन ने कृष्ण की बहन सुभद्रा का । इसमें कृष्ण की रजामन्दी थी। भाई अगर कोआपरेट करे तो लड़की भगाने में आसानी होती है।

वे नहीं जानते थे कि मैं पुराण उनके मुँह पर मारूँगा । संभलकर बोले, “भगवान कृष्ण की बात अलग है ।” मैंने कहा, “हाँ, अलग तो है । भगवान अगर औरत भगाये तो वह बात भजन में आ जाती है 1 साधारण आदमी ऐसा करे तो यह काम अनैतिक हो जाता है। जिस लड़की की आप चर्चा कर रहे हैं, वह अपनी मर्जी से घर से निकल गयी, और मर्जी से शादी कर ली, इसमें क्या हो गया ?” वे कहने लगे, “आप हमेशा उल्टी बातें करते हैं – रीति, निति, परम्परा,विश्वास क्या कुछ नहीं है ? आप जानते हैं, लड़का-लड़की अलग जाति के हैं?”

मैंने पूछा, “मनुष्य जाति के तो हैं न हैं”|

वे बोले, “हाँ, मनुष्य होने में क्या शक है ?

मैंने कहा, “तो कम-से-कम मनुष्य जाति में तो शादी हुई । अपने यहाँ तो जाति के बाहर भी महान पुरुषों ने शादी की है-जैसे भीम ने हिडिम्बा से। “

ये घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं । क्या कारण है कि लड़के-लड़की को घर से भाग कर शादी करनी पड़ती है ? 24-2 5 साल के लड़के-लड़की को भारत की सरकार बनाने का अधिकार तो मिल चुका है, पर अपने जीवन-साथी बनाने का अधिकार नहीं मिला।

घटनाएं मैं रोज सुनता हूँ । दो तरह की चिट्टियाँ पेटेण्ट हो गयी है । उनके मजमून ये हैं । जिन्हें भागकर शादी करना है वे, और जिन्हें नहीं करना वे भी इनका उपयोग कर सकते है |

चिट्टी नं। 1

पूज्य पिताजी,

मैंने यहाँ रमेश से वैदिक रीति के अनुसार शादी कर ली है । हम अच्छे हैं आप चिंता मत करिए । आशा है आप और अम्मा मुझे माफ कर देंगे |

आपकी बेटी

सुनीता

चिट्टी नं। 2

प्रिय रमेश,

मैं अपने माता-पिता की इच्छश्वा के विरुध्द नहीं जा सकती । तुम मुझे माफ कर देना तुम जरूर शादी कर लेना और सुखी रहना । तुम दुखी रहोगे तो मुझे जीवन में सुख नही मिलेगा एक ह्रदय से तो में तुम्हारी हूँ। (4-5 साल से कहूँगी …बेटा, मामाजी को नमस्ते करो) |

तुम्हारी

विनीता

इसके बाद एक मजेदार क्रम चालू होता है एक माँ-बाप कहते है -वह हमारे लिए मर चुकी हे। अब हम उसका मुँह नहीं देखेंगे। फिर कुछ महीने उनके यहां जाता हूँ तो वही लड़की चाय लेकर आती है |

मैं उनसे पूछता हूँ-यह तो आपके लिए मर चुकी थी। वे जवाब देते है -आखिर लड़की ही है, और मैं सोचता रह जाता हूँ कि जो आखिर में लड़की है, वह शुरु में लड़की क्यों नही थी ?

माता -पिता की भावनाओं को मैं जानता हूँ। विश्वास और परम्परा के टूटने में बड़ा दर्द होता है। जब शेरपा तेनसिंह गौरीशंकर की चोटी पर होकर आया था तब उससे किसी वे पूछा कि क्या वहां शंकर भगवान है ? तो उसने कहा था कि नहीं है । एक सज्जन बडे दर्द से मुझसे बोले , “देवसिंह को ऐसा नहीं कहना चाहिए था। “मैंने कहा, “वहाँ शंकर भगवान उसे नहीं दिखे तो उसने कह दिया कि नही है” वे बोले, “फिर भी उसे ऐसा नहीं कहना चाहिए था, एक ” मैंने कहा ,” जब है ही नहीं तो।… ” वे बोले, “फिर भी उसे नहीं कहना था, एक ” मैंने उनसे पूछा, ” क्या आप मानते है कि वहाँ शंकरजी है?” उन्होंने कहा, “यह हम भी जानते है कि वहाँ शंकरजी नहीं है पर एक विश्वास हृदय में लिये है, कि शंकरजी हैं , वे औघड़दानी है। कभी कोई संकट हम पर आएगा तो वे आकर हमें उबार लेंगे |

झूठे विश्वास का भी बड़ा बल होता है। उसके टूटने का भी सुख नहीं , दुःख होता है।

एक सज्जन की लड़की दुसरी जाति के लड़के से शादी करना चाहती थी माँ-बाप का जाति-प्रथा की शाश्वतता में विश्वास आड़े आ गया। लड़का अच्छी ऊँची नोकरी पर था, परन्तु लड़की के माता-पिता ने उसकी उसकी शादी अपनी ही जाती के एक लड़के से कर दी जो कम तो कमाता ही था, अपनी पत्नी तो पीटता भी था। एक दिन मेने उन सज्जन से कहा कि-सुना है , लड़की बडी तकलीफ में है वह उसे पीटता है। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। जवाब देते भी तो क्या देते , सिवा इसके कि -इतना तो सन्तोष है कि जातिवाले से पिट रही है ।

आखिर ये हमारे लोग किस परम्परा को, किस आदर्श को मान रहे है। मर्यादा पुरुषोत्तम है। सीता महासती है । इनसे श्रेष्ठ स्त्री – पुरुष की कल्पना और ऐसे अच्छे विवाह की कल्पना इस समाज में नहीं है । मर्यादा पुरुपोत्तम का निर्माण करने वाले तुलसीदास कहते है, कि पुष्पवाटिका में ‘क्वाण किंकिणि नूपुर’ की ध्वनि सुकर लक्षमण के सामने राम “कन्फेस करते है कि ऐसा लगता है जैसे मदन ने दुन्दभि दे दी है । यानी राम के मन का धनुष वहीं टुट गपा एक विवाह-पूर्व प्रेम हो गया फिर विवाह भी हो गया । आज जिन मूल्यों को इस मामले में माना जा रहा है, उनको देखकर मुझे लगता है कि तुलसीदास ने जो लिखा है, वैसा न हुआ होगा हुआ ऐसा होगा – राम ने लक्ष्मण से पूछा होगा कि यह कंकण, किंक्रिणि और नूपुर की ध्वनि किसकी है ? लक्ष्मण ने कहा होगा – यह जनक की लड़की सीता की है, तब राम ने पूछा होगा कि क्या जनक अपनी ही बिरादरी के है ? लक्ष्मण से कहा होगा – हाँ , राजा जे। के। सिंह अपनी ही बिरादरी के हैं। राम ने कहा होगा –तभी तो मेरा मन डोल उठा । दूसरी बिरादरी के होते तो मेरे मन पर कोई असर नहीं होता |

इन लड़के-लड़कियों से क्या कहा जाय ! यही न कि प्रेम की जाति होती है एक हिन्दू प्रेम है , एक मुसलमान प्रेम, एक ब्राह्मण प्रेम, एक ठाकुर प्रेम, एक अग्रवाल प्रेम । एक कोई जावेद आलम किसी जयन्ती गुहा से शादी कर लेता है, तो सारे देश में लोग हल्ला कर देते हैं और दंगा भी करवा सकते हें |

इस सबको देखते हुए आगे चलकर तरुण -तरुणी के प्रेम का दृश्य ऐसा होगा |

तरुण-तरुणी मिलते है औऱ यह वार्तालाप होता हे…-

तरुण – क्या आप ब्राह्मण है , और बाहाण है तो किस प्रकार के ब्राह्मण है ।

तरुणी -क्यों, क्या बात है |

तरुणा – -कुछ नहीं ! ज़रा आपसे प्रेम करने का इरादा है |

तरुणी~ -मैं तो खत्री हूँ |

तरुमृग तो फिर मेरा आपसे प्रेम नहीं हो सकता, क्योंकि मैं ब्राह्मण हूँ |

लोग कहते हे कि आखिर स्थायी मूल्य और शाश्वत परम्परा भी तो कोई चीज है । सही है, पर मूर्खता के सिवाय कोई भी मान्यता शाश्वत नहीं है । मूर्खता अमर है । वह बार बार मरकर फिर जीवित हो जाती है।

इधर मैं लड़के-लड़की से पूछता हूँ कि वेद तो यहाँ भी हैं और यहाँ भी वैदिक रीति है, फिर तुम लोगों ने यहीं क्यों नहीं शादी कर ली ? भागकर दूसरी जगह क्यों गये। वे कहते हें-यहां माता-पिता बाधा डालते मैं समझ गया । क्रान्ति ये तरुण जरूर करेंगे पर यथास्थिति की नजर बचाकर।

वे सज्जन जो मुझे खबर दे गये थे, कह रहे थे कि आखिर हम बुजुर्गों के जीवन-भर के अनुभव का भी तो कोई महत्त्व है । मैंने कहा अनुभव का महत्त्व है। पर अनुभव से ज्यादा इसका महत्त्व है कि किसी ने अनुभव से क्या सीखा। अगर किसी ने 50 -60 साल के अनुभव से सिर्फ यह सीखा हो कि सबसे दबना चाहिए तो अनुभव इस निष्कर्ष की कीमत में शक हो सकता है । किसी दूसरे ने इतने ही सालों के अनुभव से शायद यह सीखा हो कि किसी से नहीं डरना चाहिए ।

आप तो 50-60 साल की बात करते हें । केंचुए ने अपने लाखों सालों के अनुभव से कुल यह सीखा है कि रीढ़ की हड्डी नहीं होनी चाहिए।

एक सरकारी दफ्तर में हम लोग एक काम से गए थे–संसद सदस्य तिवारी जी और मैं। दफ्तर में फैलते-फैलते यह खबर बड़े साहब के कानों तक पहुंच गई होगी कि कोई संसद सदस्य अहाते में आए हैं। साहब ने साहबी का हिदायतनामा खोलकर देखा होगा कि अगर संसद सदस्य दफ्तर में आए तो क्या करना? जवाब मिला होगा–उसे चाय पिलाना। फिर देखा होगा, अगर उसके साथ कोई आदमी हो तो उसके साथ क्या करना? जवाब मिला होगा–उसे भी चाय पिला देना। साहब ने हिदायतनामा बंद करके बड़े बाबू से कहा होगा–तिवारीजी का काम खत्म हो जाए तो उन लोगों को चाय पीने को यहां ले आना।

काम खत्म होने पर बड़े बाबू ने कहा–साहब के साथ चाय पी लीजिए। साहबों के साथ औपचारिक चाय पीने के अनुभव मुझे हैं। उन्हें याद करके मैं कुछ घबड़ाया। मगर सोचा, यह अनुभव सुखदायक भी हो सकता है। हम दोनों साहब के कमरे में घुसे। एक निहायत बनावटी मुस्कान फैली साहब के चेहरे पर। यह मुस्कान सरकार खास तौर से अपने कूटनीतिज्ञों और अफसरों के लिए बनवाती है। पब्लिक सेक्टर में इसका कारखाना है। प्राइवेट सेक्टर के कारखाने में बनी मुस्कान व्यापारी के चेहरे पर होती है। इसे नकली मूंछ की तरह फौरन पहन लिया जाता है। जब ज़ुल्फिकार अली भुट्‌टो के साथ मुस्कुराते सरदार स्वर्णसिंह की तस्वीर देखता तो चकित रह जाता। भारत-पाक युद्ध, भयंकर दुश्मनी–मगर मुस्कान यह ऊंची क्वालिटी की बनी हुई है।

साहब मुस्कुरा चुके तो तीनों के मन में समस्या पैदा हुई कि अब क्या किया जाए? चाय तो टेबिल पर है नहीं। चपरासी लेने गया होगा।

हमने सोचा, इन्होंने बुलाया है तो निभाने की सारी ज़िम्मेदारी इनकी। वे समझे थे कि निभाने की ज़िम्मेदारी हम ले लेंगे।
कुछ सेकंड इस दुविधा में कटे। इतने में साहब समझ गए कि उन्हीं को निभाना है।
बोले–सुनाइए तिवारी जी, दिल्ली के क्या हाल हैं?

यह इतना व्यापक सवाल था कि इसका जवाब सिवा इसके क्या हो सकता था कि सब ठीक है। तिवारी जी जानते थे कि दिल्ली पर बम बरस जाएं तो भी इन्हें मतलब नहीं। थका-सा जवाब दे दिया–सब ठीक है। साहब को जवाब माकूल लगा। फिर मुझसे पूछा–सुनाइए परसाईजी, साहित्य में कैसा चल रहा है?
मैंने भी कहा–सब ठीक चल रहा है।

बात खत्म हो चुकी। सरकारी अफसर हैं–राजनीति की बात कर नहीं सकते। साहित्य से कोई सरोकार नहीं।
हम तीनों की नज़र दरवाज़े पर है। हम तीनों चपरासी की राह देख रहे हैं।

मगर चपरासी हम तीनों का दुश्मन है। वह आ नहीं रहा। पता नहीं कितनी दूर चाय लेने गया है।

साहब अपनी कुर्सी पर हैं। जब उन्हें लगता है वे बड़े आदमी हैं, वे सीधे तनकर बैठ जाते हैं। मगर जब तिवारीजी अपनी छड़ी की मूठ पर हाथ रखते हैं, तो साहब को एहसास होता है कि सामने संसद सदस्य बैठा है। वे टेबिल पर झुक जाते हैं। मैं यह कवायद बड़ी दिलचस्पी से देख रहा हूं। साहब तने, इसी वक्त तिवारीजी ने छड़ी की मूठ पर हाथ फेरा, साहब ढीले हुए। साहब का ध्यान छड़ी पर है। वे अब छड़ी को ही संसद सदस्य समझने लगे हैं।

मैंने अब पेपरवेट उठा लिया है, और उससे जी बहला रहा हूं। तिवारीजी ने छड़ी की मूठ पर लगातार हाथ फेरना शुरू कर दिया है, कि साहब को तनने का मौका ही नहीं मिल रहा है। साहब ने एक पिन उठा ली है, और उससे नाखून के मैल को साफ करने लगे हैं। मेरी बड़ी इच्छा हो रही है, कि पिन से दांत खोदूं। इससे दूसरा काम नहीं होता। मैं पेपरवेट रख देता हूं, और एक पिन उठा लेता हूं। पिन से मैं दांतों का मैल साफ करने लगता हूं।

हम तीनों दरवाज़े की तरफ देखते हैं। फिर एक-दूसरे की तरफ बड़े दीन नयनों से देखते हैं। हम तीनों को चपरासी मार रहा है, और हम कुछ कर नहीं सकते। अत्यन्त दीन भाव से साहब तिवारी जी से पूछते हैं–और सुनाइए तिवारी जी, दिल्ली के क्या हाल हैं?
तिवारी जी कहते हैं–सब ठीक ही है।
मुझसे पूछते हैं–सुनाइए परसाई जी, साहित्य में कैसा चल रहा है?
मैं कहता हूं–ठीक ही चल रहा है।

कहीं कुछ नहीं जुड़ रहा। वे और हम दो पहाड़ियों पर इतनी दूर हैं कि कोई पुल हमें जोड़ नहीं सकता। हम तीनों कगार पर खड़े हैं। नीचे गहरी खाई है। मगर एक-दूसरे की आवाज़ भी नहीं सुनाई देती।

साहब को घंटी की याद आती है। घंटी हर साहब की नसों के तनाव को दूर करने के लिए होती है। उन्होंने घंटी बजाई और एक चपरासी हाज़िर हो गया।
साहब ने कहा–चाय अभी तक नहीं आई।
चपरासी ने कहा–गया है साब लेने। इधर के होटल में दूध खलास हो गया।
मारा होटलवाले ने। दूध खलास किए बैठा है। पता नहीं चपरासी कितनी दूर गया है।
अब क्या करें?

साहब ने अब पेंसिल उठा ली है। वे उसे गाल पर रगड़ते हैं। मेरे दांत अब साफ हो चुके हैं। पिन उठा नहीं सकता। मैं टेबिल पर तबला बजाने लगता हूं।

साहब बहुत संकट में हैं। वे यह जानते कि पास के होटल का दूध खत्म हो गया है, तो चाय पीने को बुलाते ही नहीं। हम भी घोर संकट में हैं। इन्होंने पहले चाय बुलाकर फिर हमें क्यों नहीं बुलाया?
साहब पेंसिल गाल पर काफी रगड़ चुके। दरवाज़े की तरफ देखते हैं।
फिर वही–और सुनाइए तिवारीजी, दिल्ली के क्या हाल हैं?

इस बार तिवारी जी ने तय किया कि कुछ करना ही पड़ेगा। दिल्ली के हालात पर बात चले, तो कुछ हल्कापन महसूस हो।
वे बोले–कांग्रेस के दो हिस्से हो गए। सिंडिकेट निकल गई बाहर।
मेरा ख़्याल था, अब बात चलेगी।
पर साहब बोले–अच्छा जी!

मैं खुद तिवारी जी से दो घंटे दिल्ली की राजनीति पर बात कर चुका था। मेरे पास बढ़ाने को कुछ था नहीं।

तिवारी जी एक कोशिश फिर करते हैं–इंदिरा सरकार बिलकुल पुख्ता है। साहब ने कहा–अच्छा जी!
तिवारी जी निराश होकर छड़ी की मूठ पर हाथ फेरने लगे।
मैंने टेबिल पर तबला बजाना शुरू कर दिया।
कोई उपाय कारगर नहीं हो रहा।
साहब ने फिर कहा–और सुनाइए तिवारी जी, दिल्ली के क्या हाल हैं?
इस बार तिवारी जी कुछ नहीं बोलते। वे लगातार छड़ी की मूठ पर हाथ फेर रहे हैं।
हम तीनों की हालत खराब है। मेरा तबला बजाने का जी भी नहीं हो रहा।

इसी वक्त चपरासी ट्रे लेकर आ गया। हम सब मुर्दे जैसे जाग पड़े। साहब के चेहरे पर पहले ऐसा भाव आता है, कि उसे चांटा मार दें। फिर दूसरा भाव आता है जैसे उसके चरण छू लें। मैं खुद गुस्से से भरा बैठा था। मगर उसके आते ही मेरा मन उसके प्रति कृतज्ञता से भर गया।
हमने बहुत फुर्ती से चाय सुड़की। उठे। बोले–अच्छा अब इजाज़त दीजिए।
उन्होंने फौरन इजाज़त दी। बोले–अच्छा जी। थैंक यू वेरी मच।
हमें उन्हें धन्यवाद देने का भी होश-हवास नहीं था।
बाहर आकर हम दोनों ने पहले खूब ज़ोर से चार-छह सांसें लीं, फिर गाड़ी में बैठे। रास्ते-भर हम एक-दूसरे से नहीं बोले।
उतरते वक्त अलबत्ता मैंने कहा–और सुनाइए तिवारी जी, दिल्ली के क्या हाल हैं?
तिवारी जी भन्नाकर बोले–यार, अब भूलने भी नहीं दोगे?

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