वह देश चोखा – जिसमें चाय का खोखा (हास्य-व्यंग्य) : अक्षय राज शर्मा
वह देश चोखा – जिसमें चाय का खोखा (हास्य-व्यंग्य) : अक्षय राज शर्मा कभी दुनिया में दो बड़े सवाल हुआ करते थे—चीन क्या खाता है और भारत क्या नहीं खाता?फिर…
हिंदी का वैश्विक मंच
वह देश चोखा – जिसमें चाय का खोखा (हास्य-व्यंग्य) : अक्षय राज शर्मा कभी दुनिया में दो बड़े सवाल हुआ करते थे—चीन क्या खाता है और भारत क्या नहीं खाता?फिर…
“खोया-खोया चिंतन” : डॉ. सरोजिनी प्रीतम खोया-खोया चिन्तनसगुणी बोली, ‘‘यों खोये-खोये से क्यों लग रहे हो जी?’’रूपकचन्द तेजी से बोले, ‘‘हां हां मैं तो खोया-खोया ही हूँ। मिलाओ चीनी ……
दिन विशेष विमर्श में डॉ. वेद व्यथित की व्यंग्य रचना ‘मन की बात’ और ‘मेरी समझदारी और महानता’ डॉ. वेद व्यथित हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं बहुआयामी रचनाकार हैं। उन्होंने…
कोयल अर कागलो (व्यंग्य) – बुलाकी शर्मा कथेतर विमर्श पर आज पढिए बुलाकी शर्मा जी का व्यंग्य, जो राजस्थानी लोक में बेहद प्रचलित है। इतरो बाबो-सा रो लाडकोयल बाई सिध…
‘न’ से ‘नानी'( व्यंग्य ) – डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ननिहाल अब उस पुराने डाकखाने की तरह हो गया है जहाँ चिट्ठियाँ तो आती हैं, पर उन्हें पढ़ने वाला…
दीवारों पर लिखी सिसकियाँ ( व्यंग्य ) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ इतिहास की किताबों में लिखा है कि शाहजहाँ ने मुमताज की याद में ताजमहल बनवाया था। पर…
घोड़ाशाही ( व्यंग्य ) : सियारामशरण गुप्त प्राचीन भारत में चक्रवर्ती होने के लिए अश्वमेध यज्ञ किया जाता था। यज्ञ का घोड़ा छोड़ दिया जाता था और उसके पीछे-पीछे रक्षक…
दीवारों पर लिखी सिसकियाँ ( व्यंग्य ) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ इतिहास की किताबों में लिखा है कि शाहजहाँ ने मुमताज की याद में ताजमहल बनवाया था। पर…
आँधियों का मौसम ( समकालीन व्यंग्य ) : प्रेम जन्मेजय मैंने तो अपने घर के टीन-छप्पर सँभाल लिए हैं, आप अपनी रक्षा स्वयं करें। जिधर से सुनों यही सुनने को…
अध्यक्षस्य प्रथम दिवसे ( समकालीन व्यंग्य ) : प्रेम जन्मेजय उन्होंने मुझे सुबह सुबह चौंका दिया। सुबह सुबह चौंकाने का काम या तो पत्नी करती है या फिर टेलीफोन करता…
अंधेरे के पक्ष में उजाला ( समकालीन व्यंग्य ) : प्रेम जनमेजय मेरे मोहल्ले में अनेक चलते किस्म के लोग रहते हैं। मेरे मोहल्ले में पुलिस, न्यायालय, संसद, साहित्य, नौकरशाही…
मुखौटों का बाज़ार ( व्यंग्य ) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ लाइब्रेरी की पुरानी लकड़ी की महक के बीच सुधीर चश्मा ठीक करते हुए एक पुरानी फाइल पलट रहे…
कमरा नंबर 302 – डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ (व्यंग्य) उस ओयो होटल की गलियाँ किसी भूलभुलैया जैसी थीं, जहाँ रोशनी भी डरी-सहमी सी अंदर आती थी। बाहर बोर्ड पर…
पछतावा – डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ( व्यंग्य ) शहर के सबसे बड़े मल्टी-स्पेशालिटी अस्पताल के आईसीयू वार्ड के बाहर वेटिंग एरिया में एक अजीब सी गंध थी फिनाइल…
“साख पर बट्टा”- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ उस दिन घर के स्टोर-रूम के सबसे अंधेरे कोने में, जहाँ मकड़ियों ने अपनी नई रियासत बसाई थी, एक दिल दहलाने वाला…
उमरावनगर में कुछ दिन – व्यंग्य बकरी, मुर्गी, और फटी कमीजें बस में जहाँ मैं बैठा था, वहाँ बकरी न थी, मेरे पास बैठे आदमी की गोद में सिर्फ मुर्गी…
प्रेम की बिरादरी – व्यंग्य उनका सबकुछ पवित्र है । जाति में बाजे बजाकर शादी हुई थी । पत्नी ने 7 जन्मो में किसी दूसरे पुरुष को नहीं देखा ।…
पछतावा (व्यंग्य) शहर के सबसे बड़े मल्टी-स्पेशालिटी अस्पताल के आईसीयू वार्ड के बाहर वेटिंग एरिया में एक अजीब सी गंध थी फिनाइल और मरती हुई उम्मीदों का कॉकटेल। सुमित वहां…
खादी पंखों वाली आत्मा (व्यंग्य) सत्ता की रीढ़ जितनी लचीली होती है, चापलूसी के सुर उतने ही मधुर सुनाई देते हैं। उस दोपहर महामहिम की कचहरी में एक ऐसी ही…
स्टैप्लर (व्यंग्य) बजाज साहब की मेज पर वह बिल्कुल आखिरी कोने में पड़ा रहता था। एक ऐसा अनाम कैदी, जिसकी तरफ कोई मुस्कुराकर देखता भी नहीं था। क्रोमियम की उसकी…