Category: भारतीय रचनाकार

ब्राउन का फीका रंग ( समीक्षा ) : स्वरांगी साने

ब्राउन का फीका रंग ( समीक्षा ) : स्वरांगी साने काले और सफ़ेद के बीच का कोई रंग ब्राउन हो सकता है। इन दिनों एशियन परिवारों को भी ब्राउन फैमिली…

दीवारों पर लिखी सिसकियाँ ( व्यंग्य ) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

दीवारों पर लिखी सिसकियाँ ( व्यंग्य ) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ इतिहास की किताबों में लिखा है कि शाहजहाँ ने मुमताज की याद में ताजमहल बनवाया था। पर…

गया बादळा ( राजस्थानी कविता ) : कल्याणसिंह शेखावत

गया बादळा ( राजस्थानी कविता ) : कल्याणसिंह शेखावत आज बादळा, नया बादळा,चढ्या सबैरे घणा बादळा। जबरा-जबरा काळा-काळा,म्हानै लाग्या भला बादळा।म्हारो तन अर मन हरसायो,नभ मे दीख्या बड़ा बादळा।। मॉक…

श्रीमती गजानंद शास्त्रिणी (व्यंग्य) : सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

श्रीमती गजानंद शास्त्रिणी (व्यंग्य) : सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘ श्रीमती गजानन्‍द शास्त्रिणी श्रीमान् पं. गजानन्‍द शास्‍त्री की धर्मपत्‍नी हैं। श्रीमान् शास्‍त्री जी ने आपके साथ यह चौथी शादी की है, धर्म…

मेंढकी का ब्याह ( व्यंग्य ) : वृंदावनलाल वर्मा

मेंढकी का ब्याह ( व्यंग्य ) : वृंदावनलाल वर्मा उन ज़िलों में त्राहि-त्राहि मच रही थी। आषाढ़ चला गया, सावन निकलने को हुआ, परन्तु पानी की बूँद नहीं। आकाश में…

घोड़ाशाही ( व्यंग्य ) : सियारामशरण गुप्त

घोड़ाशाही ( व्यंग्य ) : सियारामशरण गुप्त प्राचीन भारत में चक्रवर्ती होने के लिए अश्वमेध यज्ञ किया जाता था। यज्ञ का घोड़ा छोड़ दिया जाता था और उसके पीछे-पीछे रक्षक…

“मंगल-आह्वान” कविता (कविता संग्रह – रेणुका ) : रामधारी सिंह ‘दिनकर’

“मंगल-आह्वान” कविता (कविता संग्रह – रेणुका ) : रामधारी सिंह ‘दिनकर’ भावों के आवेग प्रबलमचा रहे उर में हलचल। कहते, उर के बाँध तोड़स्वर-स्त्रोत्तों में बह-बह अनजान,तृण, तरु, लता, अनिल,…

चन्दा मामा की शान ( बालगीत ) : बालस्वरूप ‘राही’

चन्दा मामा की शान ( बालगीत ) : बालस्वरूप ‘राही’ चंदा मामा कहो तुम्हारीशान पुरानी कहाँ गई?कात रही थी बैठी चरखाबुढ़िया नानी कहाँ गई?सूरज से रोशनी चुराकरचाहे जितनी भी लाओ,हमें…

ऊँट ( बालगीत ) : बाल स्वरूप ‘राही’

ऊँट ( बालगीत ) : बाल स्वरूप ‘राही’ ऊँट बड़े तुम ऊट-पटाँग!गरदन लंबी, पूंछ जरा-सीआँखें छोटी, दाटत बड़े,ऊबड़-खाबड़ पीठ, ऊँघतेरहते अक्सर खड़े-खड़े।बँधी गद्दियाँ हैं पैरों मेंलेकिन झाडू जैसी टाँग! सारा…

दीवारों पर लिखी सिसकियाँ ( व्यंग्य ) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

दीवारों पर लिखी सिसकियाँ ( व्यंग्य ) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ इतिहास की किताबों में लिखा है कि शाहजहाँ ने मुमताज की याद में ताजमहल बनवाया था। पर…

आँधियों का मौसम ( समकालीन व्यंग्य ) : प्रेम जन्मेजय

आँधियों का मौसम ( समकालीन व्यंग्य ) : प्रेम जन्मेजय मैंने तो अपने घर के टीन-छप्पर सँभाल लिए हैं, आप अपनी रक्षा स्वयं करें। जिधर से सुनों यही सुनने को…

अध्यक्षस्य प्रथम दिवसे ( समकालीन व्यंग्य ) : प्रेम जन्मेजय

अध्यक्षस्य प्रथम दिवसे ( समकालीन व्यंग्य ) : प्रेम जन्मेजय उन्होंने मुझे सुबह सुबह चौंका दिया। सुबह सुबह चौंकाने का काम या तो पत्नी करती है या फिर टेलीफोन करता…

अंधेरे के पक्ष में उजाला ( समकालीन व्यंग्य ) : प्रेम जनमेजय

अंधेरे के पक्ष में उजाला ( समकालीन व्यंग्य ) : प्रेम जनमेजय मेरे मोहल्ले में अनेक चलते किस्म के लोग रहते हैं। मेरे मोहल्ले में पुलिस, न्यायालय, संसद, साहित्य, नौकरशाही…

सूरज का रथ ( बालगीत ) : बालस्वरूप ‘राही’

सूरज का रथ ( बालगीत ) : बालस्वरूप ‘राही’ सूरज का रथ बड़ा निराला,जुते हुए हैं घोड़े सात! घोड़ा एक लाल भड़कीला,घोड़ा एक हरा चमकीला,घोड़ा एक चमाचम पीला,एक बड़ा ही…

गाँधीजी के बन्दर तीन ( बालगीत ) : डॉ. बालस्वरूप ‘राही’

गाँधीजी के बन्दर तीन ( बालगीत ) : डॉ. बालस्वरूप ‘राही’ गाँधीजी के बन्दर तीन,सीख हमें देते अनमोल । बुरा दिखे तो दो मत ध्यान,बुरी बात पर दो मत कान,कभी…

बुढ़ापा बनाम अनुभव ( कविता ) : मंजु गुप्ता

बुढ़ापा बनाम अनुभव ( कविता ) : मंजु गुप्ता बुढ़ापा बिन बुलाए आता हैअनुभव परिश्रम से कमाया जाता है।बुढ़ापा लाचारी, अनुभव जौहरी पारखीबुढ़ापा तोड़ता है, अनुभव सिखाताबुढ़ापा उम्र की मजबूरी,…

बस दौड़ रहा आदमी… ( कविता ) : मंजु गुप्ता

बस दौड़ रहा आदमी… ( कविता ) : मंजु गुप्ता बच्चों मे भोलापन, मासूमियतकिशोरों में जिज्ञासा, कौतूहलयुवाओं में स्वप्नदर्शिता और जीवन में आस्था, विश्वासइत्र की खुली शीशी – सी गायब…

उनके वादे कल के हैं ( ग़ज़ल ) : डॉ. बालस्वरूप राही

उनके वादे कल के हैं ( ग़ज़ल ) : डॉ. बालसरूप राही उनके वादे कल के हैंहम मेहमाँ दो पल के हैं । कहने को दो पलके हैंकितने सागर छलके…

ज्ञान – ध्यान कुछ काम न आए ( ग़ज़ल ) : डॉ. बालस्वरूप ‘राही’

ज्ञान – ध्यान कुछ काम न आए ( ग़ज़ल ) : डॉ. बालस्वरूप ‘राही’ ज्ञान ध्यान कुछ काम न आएहम तो जीवन-भर अकुलाए । पथ निहारते दृग पथराएहर आहट पर…

मुखौटों का बाज़ार ( व्यंग्य ) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

मुखौटों का बाज़ार ( व्यंग्य ) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ लाइब्रेरी की पुरानी लकड़ी की महक के बीच सुधीर चश्मा ठीक करते हुए एक पुरानी फाइल पलट रहे…

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