यादों की अर्थी (व्यंग्य)
यादों की अर्थी (व्यंग्य) वह दोपहर किसी सड़ी हुई कढ़ी जैसी चिपचिपी थी। कार के भीतर का तापमान और मेरी पत्नी सुजाता के तेवर, दोनों ही चालीस डिग्री के पार…
हिंदी का वैश्विक मंच
यादों की अर्थी (व्यंग्य) वह दोपहर किसी सड़ी हुई कढ़ी जैसी चिपचिपी थी। कार के भीतर का तापमान और मेरी पत्नी सुजाता के तेवर, दोनों ही चालीस डिग्री के पार…
जीवन की मूल धारा (कविता) जन्म लेने पर रोनादुनिया से जाते हुए दुखी होनाइस लम्बे अंतराल में होती हैएक लम्बी यात्रायात्रीगण रहते हैं क़तार मेंउधेड़ते -बुनते हुए अपने आप कोक्षणिक…
“अपने अपने बुर्ज ख़लीफ़ा“ (पुस्तक-परिचय) हर व्यक्ति के जीवन के कुछ महत्वपूर्ण प्रतिमान होते हैं और वह उन तक पहुँचने की क्षमता का विकास किस प्रकार से कर सकता है…
पुनर्जन्म का आधार कार्ड (व्यंग्य) बेलतारा गांव के राजनीति विशारद ‘लल्लन बाबू’ ने जब इस बार प्रधानी का बिगुल फूँका, तो उन्होंने ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘मुफ्त बिजली’ के घिसे-पिटे वादों…
हवालात-ए-हुस्न (व्यंग्य) जैसे ही मैंने थाने के हवालात-ए-हुस्न में कदम रखा, वहां की आबोहवा में न्याय की खुशबू कम और थर्ड डिग्री की महक ज्यादा थी। दरोगा जी अपनी कुर्सी…
दुख-विनिमय केंद्र (व्यंग्य) चंदनपुर गांव के महान रणनीतिकार ‘झपटल बाबू’ ने जब इस बार प्रधानी का पर्चा भरा, तो उन्होंने विकास के सारे पुराने मापदंडों को खूँटी पर टांग दिया।…
स्मार्ट-गोबर (व्यंग्य) रामपुरिया गांव के स्वयंभू वैज्ञानिक ‘गबड़ू लाल’ ने जब प्रधानी के चुनाव में कदम रखा, तो उन्होंने पारंपरिक विकास की बलि चढ़ा दी। उनका चुनावी मुद्दा था—’गोबर का…
अपने अपने ठीया (कविता) युद्ध कभी अकेले नहीं लड़े जातेदूसरे का होना बहुत जरूरी है ।अकेले तो स्वयं से भी नहीं लड़ा जातावहाँ भी एक मन के दो टुकड़े होते…
डिजिटल उपवास (व्यंग्य) धरमपुरा गांव के स्वघोषित समाजशास्त्री ‘फरेब सिंह’ ने जब प्रधानी के चुनाव में अपनी दावेदारी पेश की, तो उन्होंने गांव वालों को एक नया और डरावना सपना…
स्त्री अस्मिता के नवीन आयामों को परिभाषित करता खंडकाव्य “अहिल्या “ (पुस्तक समीक्षा) डॉ वेद व्यथित का खंड काव्य अहिल्या महर्षि वाल्मिकी की “अहिल्या “ को ले कर लिखा गया…
उपमान और प्रतीक (कविता) एक दिन झुँझलाकर बोला वो!ये उपमान और प्रतीकदोनों बहुरूपिया हैंदोनों खुद के लिए नहीं जीतेऔरों के काम आते हैंफिर अलग क्यों कहलाते हैं!कभी उपमान प्रतीक बन…
डियर मोमोज (व्यंग्य) मोमोज के उस सफेद, चिपचिपे और रहस्यमयी व्यक्तित्व की शारीरिक संरचना किसी दार्शनिक गुत्थी से कम नहीं है, जिसे देखकर लगता है कि मैदा अपनी मुक्ति के…
पक्के रंग और कच्चे मन के किस्से (व्यंग्य) हमारे यहाँ होली कैलेंडर की तारीखों से नहीं, बल्कि मोहल्ले की उस पुरानी दीवार पर पड़ने वाले नीले-लाल धब्बों से शुरू होती…
उछालवाद के दौर में पीछे छूटते मूल मुद्दे (समीक्षा) पूरे 39 चालीस पहले बनी फ़िल्म ‘इजाज़त’ फिर एक बार देखी। फ़िल्म के बनने से लेकर अब तक में लगभग 40…
बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना (व्यंग्य) कहावत है— “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना”, पर यहाँ तो अब्दुल्ला ने बाकायदा ‘को-ऑर्ड’ सेट पहना है और रील बनाने के लिए दीवाना हुआ…
हिंदी के दर्शक कहाँ हैं? (समीक्षा) पद्मश्री शेखर सेन का नाम आते ही वह व्यक्तित्व आँखों के सामने आ जाता है जिसने सुर-तुलसी-कबीर-विवेकानंद की एकल प्रस्तुतियाँ दी हैं। एक मुलाकात…
ठलुआई का लायसेंस (व्यंग्य) शहर के उस कोने में जहाँ नालियों का पानी और दर्शनशास्त्र की बातें एक साथ सड़ती हैं, वहाँ एक पुराने बरगद के नीचे ‘मूर्ख शिरोमणि’ सभा…
कागज के शेर और समोसे का फेर(व्यंग्य)-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ शहर की धूल फाँकती एक तंग गली के आखिरी छोर पर ‘साहित्यिक पुनरुत्थान परिषद’ का बैनर ऐसे लटक रहा…
अंधभक्त इतने बुरे क्यों लगते हैं डॉ. अशोक बत्रा, गुरुग्राम कृष्ण खुली आँख है। राधा बंद आँख। कृष्ण जानते हैं — मेरा जन्म क्यों हुआ है! यदा यदा हि धर्मस्य……वे…
हम ‘ई’ से ईमान रखने नहीं, बेचने लगे स्वरांगी साने बचपन में याद करते थे ई, ईख की। बाद के वर्षों में उसे ईख कहना कब बंद हुआ, याद नहीं।…