कवि-लेखक-समीक्षक नरेश शांडिल्य द्वारा सृजित नवीनतम तीन गद्य संग्रहों पर चर्चा का भव्य आयोजन सम्पन्न

दिनांक 29.05.2026 को नई दिल्ली के कनाट प्लेस से सटे ऐतिहासिक जनपथ मार्ग पर स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के उमंग सम्मेलन कक्ष में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वयम एवं वैश्विक हिंदी परिवार के संयुक्त तत्वावधान में कवि-लेखक-समीक्षक नरेश शांडिल्य द्वारा सृजित नवीनतम तीन गद्य संग्रहों “शब्द-शब्द संकल्प (लेख संग्रह)”, “पन्ने जो नज़रों से गुजरे (समीक्षा संग्रह)” तथा नाटकों में गीत : सार्थकता और प्रभाव (शोध संग्रह) पर चर्चा का भव्य आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता का दायित्व सुविख्यात गीतकार एवं हरदिल अज़ीज़ गज़लकार बाल स्वरूप राही के सशक्त हाथों में रहा।
मंच पर सानिध्य प्रदान करने वाली गणमान्य विभूतियों में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के डीन प्रो रमेश चंद्र गौड़ (स्वागत वक्तव्य), प्रख्यात कवि-लेखक-समीक्षक अनिल जोशी (मुख्य वक्ता) तथा वक्ताओं की श्रेणी में प्रख्यात गीतकार एवं गज़लकार लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, कवयित्री एवं कथाकार अल्का सिन्हा एवं प्रसिद्ध नाट्य अभिनेता प्रो प्रमोद शास्त्री विराजमान रहे। प्रस्तावना हेतु प्रसिद्ध गज़लकार एवं कुशल संचालक अनिल वर्मा ‘मीत’ तथा आलेख पाठ के लिए प्रसिद्ध गीतकार शशिकांत उपस्थित रहे। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ वेदमित्र शुक्ल के सशक्त हाथों में रहा।
कार्यक्रम का शुभारंभ संचालक द्वारा सभी गणमान्य विभूतियों का शाल ओढ़ाकर एवं स्मृति-चिन्ह प्रदान करके क्रमबद्ध तरीके से संस्थाओं की ओर से सम्मानित कराया गया। तत्पश्चात्, प्रो रमेश चंद्र गौड़ को अपने स्वागत उदबोधन के आमंत्रित किया गया। उन्होंने सामाजिक परिप्रेक्ष्य से जुड़े प्रकरणों के माध्यम से नरेश शांडिल्य की पुस्तकों में वर्णित पहलुओं को सारगर्भित तरीके से रेखांकित करते हुए अपना वक्तव्य परिपूर्ण किया।
अनिल वर्मा ‘मीत’ ने अपनी प्रस्तावना एवं बीज वक्तव्य के द्वारा नरेश शांडिल्य की सृजनात्मक उत्पत्ति और प्रक्रियाओं को विचारों के माध्यम से प्रभावशाली शब्दावली से सिंचित और विस्तार देने की कलात्मक शैली में प्रस्तुत करने पर दृष्टिगोचर प्रस्तुत करते हुए अपनी वाणी को विराम दिया।
शशिकांत शर्मा ने अपने आलेख के आरंभिक वाक्यों में इन पुस्तकों में समाहित उनके लेखों का उल्लेख और विशेषतः रामदरश मिश्र के लेख से जुड़े उदाहरण को श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने अवगत कराया कि उनकी विविध समीक्षाओं की पुस्तक रामचंद्र शुक्ल की शैली और दृष्टि से प्रभावित हैं। उनके एक गीत का वाचन करते हुए अपने आलेख को परिपूर्णता प्रदान की।


नरेश शांडिल्य ने अपनी पुस्तकों पर एक दृष्टिगोचर के माध्यम से अपने उदबोधन को रेखांकित करते हुए अवगत कराया कि उनकी संरचना और सृजन कैसे और किस प्रकार इनकी संरचना संभव हो पाई है। आपातकाल और राम मंदिर आंदोलन तथा यूपीएससी कार्यालय के बाहर बारह वर्षों तक धरने के प्रकरणों एवं पहलुओं का समावेशी निरूपण करते हुए जनसमुदाय को अवगत कराने के साथ-साथ अपने नुक्कड़ नाटक के लिए लिखा गया (शंकरिया शीर्षक से गीत) गीत ‘बहुत दिनों के बाद, बुलावा आया है नौकरियां का भईया…….’ गाकर सुनाने के पश्चात् अपनी वाणी को विराम दिया।
लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने “शब्द-शब्द संकल्प” पर अपने विचार व्यक्त करते हुए पुस्तक से रामचरितमानस से जुड़े आलेख का जिक्र करके विस्तृत चर्चा की शुरूआत की। पुस्तक के सभी विषय प्रासंगिक हैं। कथेतर विधा में यह एक श्रेष्ठ पुस्तक है। पुस्तक में समाहित व्यंग्य के एक अंश को भी पढ़कर सुनाया। कुछ अन्य विशिष्ट पक्षों को श्रोताओं के समक्ष पुस्तक से कुछ अंशों को उदृधत करते हुए अपनी वाणी को विराम दिया।
अल्का सिन्हा ने अपने विस्तृत विवरण के द्वारा श्रोताओं का ज्ञानार्जन प्रदान करते हुए कहा कि यह संवेदनाओं से जुड़े पन्ने हैं। इसमें विधाएं भी हैं, विषय भी हैं। लेखनी और स्वभाव में कोई सलवट नहीं है।
प्रो प्रमोद शास्त्री ने आपातकाल और राम मंदिर आंदोलन तथा यूपीएससी के बाहर 12 वर्षों तक निरंतरता से आयोजित किए गए धरना-प्रदर्शन के दौरान नुक्कड़ नाटकों द्वारा अपनी प्रस्तुतियों पर केंद्रित अपनी प्रतिक्रियाओं के माध्यम से अवगत कराया कि नरेश, अनिल और प्रमोद तीनों शर्मा हैं, लेकिन समाज हम तीनों को उस दौरान शांडिल्य, जोशी और शासत्री के नाम से जानता-पहचानता था। उनकी क्षमताओं का किरदार कितने फलक और विधाओं पर उपस्थित है, इससे हम सभी भलीभांति परिचित हैं। उन्होंने विस्तार देते हुए बताया कि हमने बूथ केपचरिंग पर नाटक किए। राम मंदिर एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी गतिविधियों से संबंधित प्रकरणों से विस्तार दिया। रज्जू भैया, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी इत्यादि भी हमारे नाटकों के समय पर उपस्थित रहे थे और प्रशंसा भी की थी। जामा मस्जिद के बाहर बैठकर मैंने वहीं के इमाम की पोल खोल दी थी।
अनिल जोशी ने अपने वक्तव्य के द्वारा रेखांकित करते हुए अवगत कराया कि सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता दिव्यांशु इन्हीं प्रमोद शास्त्री का भांजा है। इन्होंने नाटकों को स्वत: जिया है। भगतसिंह के बाद यदि सदन में किसी ने साहस दिखाया था, तो वह पुष्पेन्द्र चौहान था। वह विरोध प्रकट करते हुए सदन की पहली मंज़िल से कूद गया था और राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह उसका हालचाल पूछने के लिए अस्पताल में देखने के लिए पहुंचे थे। यह पुस्तकें कविताओं का गद्य विधा में उनकी संरचनाओं का विस्तार ही हैं। इनमें उल्लेखित वह संपादकीय हैं, जो सामाजिक परिप्रेक्ष्य के विभिन्न बिन्दुओं पर चोट करते प्रतीत होते हैं। प्रवासी साहित्य को अक्षरम लेकर आया। दिनमान ने जो किया, वो बात हमारे दिमाग में आई। “शब्द-शब्द संकल्प” की बात वहीं से आई थी। आचार्य महाप्रज्ञ के प्रकरण द्वारा व्याख्यायित किया और यह भी बताया कि राम मंदिर के आंदोलन में शहीद हुए कोठारी बंधुओं के पिता मुझसे मिलने मेरे घर पर आए थे। हम सभी का उस समय के नरेटिव और मिथकों को बदलने का हमारा अथक प्रयास रहा था। ‘राग-विराग’ नाटक का उदाहरण देते हुए रेखांकित किया कि इसे नाट्यकर्मी रमा पाण्डेय ने इसे अभिनीत कराया था।
अपने अध्यक्षीय उदबोधन में बाल स्वरूप राही ने रेखांकित किया कि आज की शाम एक यादगार शाम है। जब मैं साप्ताहिक हिंदुस्तान में कार्यरत था, तो मेरी पहली कविता ही लोगों के दिलों-दिमाग पर छा गई थी। उस समय में रामावतार त्यागी ने कहा था कि गीत यह होता है – ‘कटीले शूल भी…….।’ उन्होंने अपनी और उनकी कुछ ग़ज़लें सुनाई। नरेश शांडिल्य के दोहों का मुरीद हूं, जिसका कोई पूरे देश में सानी नहीं है।
भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास चित्रलेखा पर मैंने इसी नाम से एक ओपेरा “चित्रलेख” लिखा था। इनकी समीक्षाएं आप सभी ने भी बहुत मनोयोग सुनी, यह बहुत अच्छी बात है। नरेश शांडिल्य के कुछ दोहे और ग़ज़लों के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपने कुछ शेर एवं ग़ज़लों के मतलों का वाचन करने के पश्चात् अपनी वाणी को विराम दिया।
इस अवसर पर वयम संस्था की ओर से पदाधिकारियों के कर-कमलों द्वारा नरेश शांडिल्य को शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।
श्रोता-दीर्घा में उपस्थित देशभर के विभिन्न शहरों और क्षेत्रों से पधारकर सम्मिलित हुए प्रबुद्धजनों, विद्वतजनों एवं गणमान्य विभूतियों में निशा भार्गव, अतुल विष्णु प्रभाकर, ममता किरण, राजेन्द्र राज निगम, इंदु राज निगम, वीणा अग्रवाल, शकुंतला मित्तल, पुष्पा सिन्हा, नीरज चौहान, राजेश्वर वशिष्ठ, डॉ तूलिका सेठ, भावना शुक्ल, डॉ सूक्ष्मलता महाजन, डॉ कविता मल्होत्रा, प्रणव मेहरा, डॉ रेणु पंत, आश्मा कौल, अरविंद असर, प्रमोद असर, अनमोल आचार्य, मनोज सिन्हा, प्रेम सागर प्रेम, पूजा श्रीवास्तव, राजीव श्रीवास्तव, अनीता वर्मा सेठी, गोल्डी गीतकार, राकेश सेठ, मनोज अबोध, मनोज श्रीवास्तव ‘अनाम’, अरविंद पथिक, डॉ हर्षवर्धन आर्य, कुमार सुबोध इत्यादि प्रमुख रहे।
अंतिम पड़ाव पर ऋषि कुमार शर्मा द्वारा उमंग सम्मेलन कक्ष में देश के सुदूर शहरों और क्षेत्रों से पधारे सभी प्रबुद्धजनों, विद्वतजनों एवं आगंतुकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए धन्यवाद और आभार करने के पश्चात् यह भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ।
— कुमार सुबोध, ग्रेटर नोएडा वेस्ट

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