हिंदी–तेलुगु अंतर संबंध : विशेष संदर्भ – पारस्परिक अनुवाद पर राष्ट्रीय ऑनलाइन परिचर्चा

विश्व हिंदी सचिवालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन तथा भारतीय भाषा मंच के तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा हिंदीतर गंगा–कावेरी संवाद शृंखला की तृतीय कड़ी के अंतर्गत “हिंदी–तेलुगु अंतरसंबंध : विशेष संदर्भ – पारस्परिक अनुवाद” विषय पर एक महत्त्वपूर्ण ऑनलाइन संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य हिंदी एवं तेलुगु भाषाओं के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक संबंधों को रेखांकित करते हुए पारस्परिक अनुवाद की परंपरा, चुनौतियों और संभावनाओं पर गंभीर एवं सार्थक विमर्श करना था। कार्यक्रम का शुभारंभ लेखिका सुश्री स्वरांगी साने के स्वागत उद्बोधन से हुआ। उन्होंने गंगा और कावेरी को भारतीय सांस्कृतिक एकता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारतीय भाषाएँ हमारी साझा सांस्कृतिक धरोहर हैं तथा इनके माध्यम से राष्ट्रीय एकात्मता को और अधिक सुदृढ़ किया जा सकता है। कार्यक्रम का प्रभावी एवं गरिमामय संचालन साहित्यकार श्री सुरेश कुमार मिश्र ‘उरतृप्त’ ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. एस. जयशंकर बाबू (अध्यक्ष हिन्दी विभाग पांडिचेरी केन्द्रीय विवि) ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने हिंदी और तेलुगु भाषाओं के मध्य विद्यमान ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को भारतीय भाषाई एकता का सशक्त उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि पारस्परिक अनुवाद केवल भाषाई प्रक्रिया नहीं, बल्कि संस्कृतियों के मध्य संवाद का प्रभावी सेतु है। उन्होंने गंगा–कावेरी संवाद श्रृंखला को भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर सम्मान, सहयोग और सांस्कृतिक समन्वय को सुदृढ़ करने वाला अभिनव प्रयास बताया। मुख्य अतिथि डॉ. सी. कामेश्वरी (सहायक प्रोफेसर एवं पूर्व भाषा विभागाध्यक्ष) हिंदी–तेलुगु अनुवाद की भाषिक एवं व्यावहारिक चुनौतियों का विद्वत्तापूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने शब्दानुवाद और भावानुवाद के बीच के अंतर को अनेक उदाहरणों द्वारा स्पष्ट करते हुए कहा कि सफल अनुवाद के लिए केवल शब्दों का ज्ञान पर्याप्त नहीं, बल्कि स्रोत एवं लक्ष्य भाषा की संस्कृति, व्याकरण, मुहावरों, लोकप्रयोगों और संदर्भों की गहन समझ आवश्यक है। उन्होंने हिंदी और तेलुगु के समानार्थी तथा भिन्नार्थी शब्दों के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट किया कि आधुनिक अनुवाद उपकरण उपयोगी अवश्य हैं, किंतु उत्कृष्ट अनुवाद का आधार मानवीय संवेदना, भाषाई दक्षता और सतत अभ्यास ही है। अतिथि वक्ता डॉ. अनुपमा (अध्यक्ष हिन्दी विभाग वी.वै. महाविद्यालय, हैदराबाद) ने हिंदी और तेलुगु के मध्य विकसित समृद्ध अनुवाद परंपरा का उल्लेख करते हुए अनेक प्रमुख अनुवादकों एवं साहित्यकारों के योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि तेलुगु भाषी विद्वानों द्वारा हिंदी साहित्य तथा हिंदी साहित्यकारों द्वारा तेलुगु साहित्य के अनुवाद ने दोनों भाषाओं के साहित्य को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान प्रदान की है। उनके अनुसार अनुवाद भारतीय भाषाओं के बीच साहित्यिक संवाद को निरंतर समृद्ध कर रहा है। सान्निध्य वक्ता डॉ. वरुण कुमार (पूर्व निदेशक- राजभाषा, रेल मंत्रालय, भारत सरकार) ने भारतीय भाषाओं के पारस्परिक संबंधों को राष्ट्रीय एकता का आधार बताते हुए कहा कि भाषाई विविधता भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक शक्ति है। उन्होंने युवा शोधार्थियों को भारतीय भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन तथा अनुवाद के क्षेत्र में गंभीर अनुसंधान के लिए प्रेरित किया और कहा कि भारतीय भाषाओं के बीच संवाद जितना सशक्त होगा, भारतीय ज्ञान परंपरा उतनी ही व्यापक रूप से विश्व तक पहुँचेगी।

बीज वक्ता श्रीमती नर्मदा कुमारी (अनुवादक एवं लेखिका हिंदीतर प्रांत संयोजक, वैश्विक हिन्दी परिवार) ने हिंदी और तेलुगु के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा भाषिक संबंधों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया। उन्होंने दोनों भाषाओं पर संस्कृत के प्रभाव, साहित्यिक अनुवाद की समृद्ध परंपरा तथा आधुनिक तकनीक एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद उपकरणों की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पारस्परिक अनुवाद भारतीय भाषाओं के मध्य संवाद, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने का प्रभावी माध्यम है। साथ ही उन्होंने विभिन्न भारतीय अनुवाद टूल्स एवं डिजिटल माध्यमों की उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला। युवा वक्ता वाई मोनिका (शोधार्थी) ने हिंदी और तेलुगु के भाषाई एवं ऐतिहासिक संबंधों, साहित्यिक आदान-प्रदान तथा अनुवाद की चुनौतियों पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने लिपि, व्याकरण, उच्चारण एवं सांस्कृतिक संदर्भों से उत्पन्न कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए द्विभाषिक शिक्षा, शब्दकोश निर्माण तथा गुणवत्तापूर्ण अनुवाद को समय की आवश्यकता बताया। दूसरी युवा वक्ता अरापल्ली निखिला (शिक्षिका) ने एक तेलुगु भाषी हिंदी अध्यापिका के रूप में अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि अनुवाद केवल शब्दों का रूपांतरण नहीं, बल्कि संस्कृति, संवेदना और जीवन-मूल्यों का स्थानांतरण है। उन्होंने हिंदी एवं तेलुगु साहित्य के प्रमुख रचनाकारों, अनुवादकों तथा सांस्कृतिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए पारस्परिक अनुवाद को राष्ट्रीय एकता और भाषाई समन्वय का प्रभावी माध्यम बताया। परिचर्चा के दौरान प्रतिभागियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर विशेषज्ञों ने विस्तारपूर्वक दिए। विशेष रूप से हिंदी एवं तेलुगु के समानार्थी एवं भिन्नार्थी शब्दों, तत्सम शब्दों की समानता तथा अर्थभेद जैसे विषयों पर उपयोगी चर्चा हुई, जिससे प्रतिभागियों की अनेक जिज्ञासाओं का समाधान हुआ। कार्यक्रम के अंत में प्रो. गंगाधर वानोडे ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, अतिथि वक्ता, सान्निध्य वक्ता, बीज वक्ता, युवा वक्ताओं तथा सभी प्रतिभागियों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि हिंदीतर गंगा–कावेरी संवाद शृंखला भविष्य में भी भारतीय भाषाओं के मध्य साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सेतु निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेगी तथा पारस्परिक अनुवाद के माध्यम से राष्ट्रीय एकता, भाषाई समन्वय और सांस्कृतिक संवाद को नई दिशा प्रदान करेगी। यह संगोष्ठी भारतीय भाषाओं के पारस्परिक सहयोग, साहित्यिक आदान-प्रदान तथा अनुवाद की समृद्ध परंपरा को नए आयाम प्रदान करने वाली एक अत्यंत सार्थक एवं ज्ञानवर्धक पहल सिद्ध हुई।
रिपोर्ट :— अजय शर्मा
