काठमांडू में भारत और नेपाल के सनातन सम्बन्ध विषय पर बोलते हुए : मनोज कुमार श्रीवास्तव

सबसे पहले तो मैं आपकी संस्था के प्रति आभार प्रकट कर दूँ कि आपने इस कार्यक्रम में मेरी शिरकत को जरूरी समझा। फिर भी मैं आपकी संस्था को निमित्त ही मानते हुए यहाँ आने में नियति को ढूँढ रहा था। कहाँ हम मध्यप्रदेश के लोग और कहाँ आप मध्यदेशी या मधेशी। पर भोपाल से नेपाल की मेरी इस आमंत्रण-यात्रा में नियति के क्या संकेत है? इसका उत्तर मुझे तब मिला जब मैंने यहाँ आकर पशुपतिनाथ भगवान के दर्शन किए।
उनके चार मुख हैं – तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात और वामदेव। एक ऊर्ध्व है यहाँ जिसे हम ईशान कहते हैं। सो नियति का संकेत यह कि अभी कोई 18 दिनों से मैं अमोघशिवकवच पर अपनी व्याख्या लिख रहा था और उसमें शिवजी के इन्हीं मुखों की चर्चा की थी और चारों मुखों पर चर्चा के बाद मेरी ईशान पर चर्चा जब पूरी हुई तभी इस कार्यक्रम के आयोजक महोदय का फोन आया तो और उन्होंने मुझे इस कार्यक्रम के लिए बुलाया। मैं उन्हें पहले नहीं जानता था और न उन्हें इस बात का कोई इल्म था कि फेसबुक पर मैंने यह सब लिखा है। सो यह शिवजी का आशीर्वाद ही है कि मैं आपके बीच हूँ।
मैं सन् 1994-96 में मंदसौर का कलेक्टर था। वहाँ ‘पशुपति’ पर मैंने एक पुस्तक लिखी थी। वहाँ अष्टमूर्ति पशुपतिनाथ हैं, तो एक पशुपति से दूसरे पशुपति तक की मेरी यात्रा संभव हुई। बाद में शिवजी पर मेरी पुस्तक ‘देवाधिदेव’ में एक अध्याय ही पशुपति पर ही है। सो पशुपति ने अंततः मुझ पर कृपा कर ही दी और मुझे यों बुला लिया। नेपाल का साहित्य अक्सर मेरे साथ रहा है। जब मैं सुंदरकांड पर लिख रहा था तो भानुभक्त रामायण काम आई थी और फिर जब महाभारत पर मेरा लेखन हुआ तो विजयानंद का गदा पर्व पर लिखा मेरे लिए काम आया।
कल मैं आपकी बागमती नदी के किनारे खड़ा था। मैं उसे वाग्मती कहना चाहता हूँ। वह काठमांडू की जीवनरेखा है। पशुपतिनाथ इसी नदी के तट पर स्थित हैं। आगे चलकर यह भारत (बिहार) में प्रवेश करती है। जिस प्रकार वाराणसी और गंगा का सम्बन्ध है, उसी प्रकार काठमांडू और बागमती का सम्बन्ध है।
वहाँ खड़े-खड़े मैं सोच रहा था, कि राजनीतिक सीमाएँ विभाजित करती हैं, नदियाँ जोड़ती हैं। हिमालय में हिम पिघलता है, नेपाल उसे ग्रहण करता है, नदियाँ उसे भारत तक पहुँचाती हैं और अन्ततः वही जल गंगा में मिलकर समुद्र तक पहुँचता है। यह केवल जलचक्र नहीं है, यह सभ्यता का संस्कार-चक्र है। आपकी काली/ महाकाली नदी जो भारत और नेपाल की पश्चिमी सीमा के बड़े भाग का निर्माण करती है, भारत में आगे चलकर शारदा के नाम से भी जाना जाता है। यह केवल सीमा नहीं, बल्कि साझा जल-संस्कृति का स्रोत है। आपकी सबसे बड़ी नदी कर्णाली या करनाली भारत में प्रवेश करने के बाद घाघरा कहलाती है और आगे चल कर सरयू प्रणाली से जुड़ती है। अयोध्या की सांस्कृतिक स्मृति से इसका गहरा सम्बन्ध है। एक अर्थ में जनक की भूमि और राम की भूमि जल के माध्यम से भी जुड़ी हुई हैं।
आपकी गण्डकी या नारायणी नदी मुझे भारत-नेपाल सम्बन्ध की सबसे महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक नदी लगती है, भारत में प्रवेश करने के बाद यह गंडक कहलाती है। शालिग्राम इसी नदी से प्राप्त होते हैं, जिन्हें भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है। यह केवल नदी नहीं, बल्कि वैष्णव परम्परा की जीवित धारा है। गण्डकी केवल जल नहीं बहाती, अपितु वह विष्णु की मूर्तियाँ स्वयं गढ़कर भारत लाती है। दुनिया में शायद ही कोई दूसरी नदी हो जो अपने प्रवाह में आराध्य विग्रह भी लेकर चलती हो।
भारत और नेपाल के बीच वास्तविक दूत न राजदूत हैं, न सेनाएँ। वास्तविक दूत नदियाँ हैं।
इसीलिए वैदिक परम्परा में नदी को ‘माता’ कहा गया। माता कभी दो पुत्रों के बीच सीमा नहीं बनाती। वह दोनों का पोषण करती है। भारत और नेपाल की साझा नदियाँ इसी मातृत्व का मूर्त रूप हैं।
भारत और नेपाल के सम्बन्धों की चर्चा प्रायः दो स्तरों पर होती है—या तो राम और सीता के विवाह के माध्यम से, अथवा आधुनिक राजनीतिक और सांस्कृतिक सम्बन्धों के सन्दर्भ में। परन्तु यदि सनातन दृष्टि से देखा जाए तो इन दोनों से भी पहले एक तीसरा स्तर दिखाई देता है, जो कहीं अधिक गहरा और स्थायी है। वह है ऋषियों का स्तर। सनातन सभ्यता की सबसे विलक्षण विशेषता यही है कि उसका निर्माण सम्राटों ने नहीं, ऋषियों ने किया। राजाओं ने राज्यों की सीमाएँ निर्धारित कीं, किन्तु ऋषियों ने उन सीमाओं से परे जाकर एक ऐसी सांस्कृतिक चेतना का निर्माण किया जिसमें हिमालय से समुद्र तक फैला सम्पूर्ण भूभाग एक ही आध्यात्मिक संवाद का क्षेत्र बन गया। इसीलिए भारत और नेपाल का सम्बन्ध किसी राजवंश का उत्तराधिकार नहीं, बल्कि ऋषियों की साधना का उत्तराधिकार है। नेपाल का सबसे बड़ा ऐतिहासिक महत्व इसी तथ्य में निहित है कि वह केवल राजाओं की भूमि नहीं रहा। वह उन राजर्षियों की भूमि रहा जहाँ सत्ता और ब्रह्मविद्या का अभूतपूर्व समन्वय दिखाई देता है। राजा जनक इस परम्परा के सर्वोच्च प्रतीक हैं। जनक नेपाल की सबसे बड़ी देन हैं। भारत ने संसार को अनेक ऋषि दिए। नेपाल ने जनक दिए। जनक अद्वितीय हैं क्योंकि वे राजा भी हैं, दार्शनिक भी, योगी भी, गृहस्थ भी। आज भी शासन-व्यवस्था में “राजर्षि” की अवधारणा का सर्वोच्च उदाहरण जनक ही हैं। इस अर्थ में नेपाल ने सनातन को केवल सीता नहीं दी। उसने शासन का आदर्श भी दिया।मैं चूँकि स्वयं प्रशासन में रहा हूँ तो जनक का आदर्श मुझे बहुत अपील करता है। प्लेटो ने फिलॉसफर किंग की बात की थी, लेकिन उससे सहस्त्राब्दियों पहले राजा जनक ने उसे साकार किया था।
भारतीय इतिहास में अनेक शक्तिशाली सम्राट हुए, किन्तु उपनिषदों ने किसी सम्राट को उतना सम्मान नहीं दिया जितना जनक को दिया। इसका कारण उनका वैभव नहीं, बल्कि उनका वैराग्य था। वे राजमहलों में रहते हुए भी “विदेह” थे। उनके लिए राज्य आत्मबोध में बाधा नहीं था, बल्कि लोकमंगल का माध्यम था। यही कारण है कि याज्ञवल्क्य जैसे महर्षि उनके दरबार में केवल राजाश्रय प्राप्त करने नहीं आते, बल्कि ब्रह्मविद्या पर संवाद करते हैं। गार्गी जैसी विदुषी उसी सभा में निर्भीक होकर प्रश्न करती हैं। यह दृश्य केवल दार्शनिक वाद-विवाद नहीं है। यह उस सभ्यता की घोषणा है जिसमें सत्ता सत्य के सामने विनम्र रहती है। यदि भारत ने काशी को ज्ञान का नगर बनाया, तो नेपाल ने जनकपुर को ज्ञान और शासन के संवाद का नगर बनाया।यहीं भारत और नेपाल के सम्बन्ध का दूसरा आयाम प्रकट होता है। सामान्यतः हम सोचते हैं कि राम और सीता ने दोनों देशों को जोड़ा। हम यह नहीं भूलते कि सीता नेपाली थीं। यह किसी राजा की शादी नहीं, सम्पूर्ण उत्तर भारतीय सभ्यता का सांस्कृतिक अनुबंध था। परन्तु उससे पहले याज्ञवल्क्य और जनक ने दोनों को जोड़ दिया था। राम और सीता ने उस सम्बन्ध को पारिवारिक रूप दिया, परन्तु जनक और याज्ञवल्क्य ने उसे दार्शनिक आधार प्रदान किया। इस प्रकार भारत और नेपाल का प्रथम सेतु विवाह नहीं, संवाद है। राजनीति नहीं, ब्रह्मविद्या है। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण तथ्य है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि सनातन सभ्यता का मूलाधार शक्ति नहीं, ज्ञान है।
यदि हम और व्यापक दृष्टि से देखें, तो नेपाल की भूमिका हिमालय की भूमिका से अभिन्न हो जाती है। भारतीय परम्परा में हिमालय केवल पर्वतमाला नहीं, बल्कि ऋषियों की विश्वविद्यालय-भूमि है। वेदों की ऋचाएँ, उपनिषदों का मौन, व्यास की दृष्टि, नाथयोगियों की साधना, बौद्ध-करुणा, सिद्धों की परम्परा—इन सबकी जड़ें उसी हिमालयी चेतना में मिलती हैं। नेपाल इस महान हिमालयी विश्वविद्यालय का एक प्रमुख परिसर है। यहाँ ज्ञान का संचार शास्त्रों से पहले जीवन के माध्यम से हुआ। पर्वत स्वयं गुरु बन गए, नदियाँ स्वयं उपनिषद् बन गईं और मौन स्वयं भाष्य बन गया। इसीलिए नेपाल का महत्व किसी राजनीतिक भू-भाग के रूप में नहीं, बल्कि उस जीवित गुरुकुल के रूप में है जहाँ से भारतीय सभ्यता बार-बार अपने आध्यात्मिक संस्कार ग्रहण करती रही।
नाथ परम्परा इस सत्य को और भी स्पष्ट करती है। मत्स्येन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ की साधना ने भारत और नेपाल के बीच ऐसी आध्यात्मिक यात्रा का निर्माण किया जिसमें कोई सीमा नहीं थी। योगी राजमार्गों से नहीं चलत। वे चेतना के मार्गों से चलते हैं। उनके लिए हिमालय किसी राष्ट्र की सीमा नहीं, बल्कि साधना का एक निरन्तर विस्तार था। यही कारण है कि नाथ परम्परा में भारत और नेपाल दो देशों के रूप में नहीं, बल्कि एक ही योगभूमि के रूप में उपस्थित हैं। इसी प्रकार बुद्ध का जीवन भी दोनों देशों को एक अविभाज्य आध्यात्मिक कथा में बाँध देता है। जन्म लुम्बिनी में होता है, ज्ञान बोधगया में प्राप्त होता है, धर्मचक्र सारनाथ में प्रवर्तित होता है और करुणा सम्पूर्ण एशिया में फैलती है। यदि आधुनिक राजनीतिक दृष्टि इस यात्रा को चार देशों में बाँटना चाहे तो बाँट सकती है, किन्तु सनातन और बौद्ध दृष्टि में यह एक अखण्ड साधना-पथ है।
भारत और नेपाल का सम्बन्ध तीर्थों का भी है, परन्तु उससे पहले वह ऋषि-पथों का सम्बन्ध है। आज हम व्यापारिक गलियारों (इकोनॉमिक कॉरिडोर्स), सामरिक गलियारों (स्ट्रैटेजिक कॉरिडोर्स) और परिवहन गलियारों की चर्चा करते हैं, किन्तु सनातन सभ्यता ने सबसे पहले ऋषि-गलियारे (ऋषि कॉरिडोर्स) बनाए थे। ये ऐसे मार्ग थे जिन पर न सैनिक चलते थे, न व्यापारी। इन पर साधक चलते थे। इन्हीं मार्गों से वेदों की ध्वनि, उपनिषदों का चिन्तन, योग की साधना, बौद्ध करुणा और नाथों का तप भारत और नेपाल के बीच प्रवाहित होता रहा। वास्तव में यदि कोई पूछे कि भारत और नेपाल को किसने जोड़ा, तो सबसे सत्य उत्तर होगा—राजनीतिक संधियों ने नहीं, ऋषियों के चरणों ने। इसलिए भारत और नेपाल का सम्बन्ध केवल ऐतिहासिक नहीं कहा जा सकता। इतिहास राजाओं का वृत्तान्त लिखता है।सभ्यता ऋषियों की पदचाप को स्मरण रखती है। भारत और नेपाल उसी पदचाप से जुड़े हुए हैं जिसमें सत्य किसी एक राष्ट्र की सम्पत्ति नहीं, सम्पूर्ण मानवता की धरोहर है। इसलिए भारत और नेपाल का सम्बन्ध राजनीतिक मानचित्र पर दो रंगों से अंकित अवश्य है, किन्तु सनातन सभ्यता के मानचित्र पर वह एक ही अखण्ड ऋषि-भूमि के रूप में प्रकाशित होता है।
नेपाल भारत का पड़ोसी नहीं, भारत की ऊर्ध्वगामी दिशा है। पूर्व-पश्चिम-दक्षिण-उत्तर—इनमें उत्तर का अर्थ केवल दिशा नहीं।उपनिषदों में उत्तर का अर्थ है…. ऊप ! श्रेष्ठ ! आरोहण! इस अर्थ में नेपाल भारत का Northern Neighbour नहीं। भारत की आध्यात्मिक ऊर्ध्व दिशा है। भारत जब ऊपर देखता है, तो हिमालय दिखता है। हिमालय दिखता है, तो शिव दिखते हैं। शिव दिखते हैं, तो कैलास दिखता है। कैलास की ओर बढ़ने वाला प्रत्येक साधक वस्तुतः उसी सनातन यात्रा पर है जिसमें भारत और नेपाल दो देश नहीं, बल्कि एक ही आध्यात्मिक आरोहण के दो पड़ाव हैं। भारत और नेपाल का सम्बन्ध इतिहास का नहीं, “कॉस्मिक जियोग्राफी” (कॉस्मिक जियोग्राफी) का सम्बन्ध है। यह केवल दो राष्ट्रों का संवाद नहीं, बल्कि सनातन सभ्यता के जीवित शरीर के दो अवयवों का पारस्परिक स्पंदन है।
भारत-नेपाल सम्बन्ध “वंश” का नहीं, “ऋषि” का सम्बन्ध है, दुनिया के अधिकांश राष्ट्र रक्त (ब्लड) से बने। कुछ भाषा से। कुछ युद्ध से। भारत और नेपाल ऋषियों से बने। यहाँ पूर्वज केवल राजा नहीं हैं। ऋषि भी पूर्वज हैं। यही सनातन की सबसे बड़ी विशेषता है। हम दोनों के लिए हिमालय ज्ञान का “सर्वर” है। आज डेटा सेंटर की चर्चा होती है।सनातन में डेटा सेंटर हिमालय था। सभी ऋषि वहीं।सभी तप वहीं। सभी मन्त्र वहीं।नदियाँ वहीं। नेपाल इस “कॉस्मिक क्लाउड” का महत्वपूर्ण केन्द्र है।गंगा केवल जल डाउनलोड नहीं करती। ज्ञान भी डाउनलोड करती है।
नेपाल देवताओं का गणराज्य है।भारत में देवालय हैं। नेपाल में घूमते हुए मुझे लगा कि जैसे पूरा देश देवालय हो। लगभग प्रत्येक पहाड़ी, प्रत्येक नदी, प्रत्येक शिला किसी देवता से जुड़ी है। यह ऐनिमिज़्म नहीं। यह सनातन की वह दृष्टि है जिसमें प्रकृति स्वयं देवता है। यह एक सेक्रेड जियोग्राफी है।
पश्चिमी राजनीतिक चिन्तन में राष्ट्र सीमाओं (बाउंड्रीज़) से बनता है। सनातन परम्परा में सभ्यता क्षेत्रों से बनती है। कुरुक्षेत्र, ब्रजक्षेत्र, हिमालय क्षेत्र ये सब राजनीतिक इकाइयाँ नहीं, आध्यात्मिक क्षेत्र हैं। इस दृष्टि से नेपाल कोई “विदेश” नहीं, बल्कि हिमालय-क्षेत्र का एक दिव्य आयाम है। सनातन भूगोल नक्शे से नहीं, तीर्थों से बनता है। दुनिया में कितनी देशों की सीमाएँ खुली थीं? क्योंकि विश्वास संधि से नहीं आता। विश्वास हजारों वर्षों की साझा स्मृति से आता है। भारत और नेपाल की खुली सीमा वास्तव में आधुनिक प्रशासन में जीवित सनातन विश्वास है।
भारत को यदि विष्णु की भूमिका कहें… पालन व्यवस्था! लोकव्यापी विस्तार! ….तो नेपाल शिव का प्रदेश है… तप, वैराग्य, अरण्य, हिम, मौन।…. सनातन इन दोनों के बिना पूर्ण नहीं। बल्कि गंडकी भी नारायण को शालिग्राम के रूप में बहाकर भारत लाती है।
नेपाल सनातन का “उत्तर चक्र” है। मैं उसे सनातन के योग शरीर का सहस्रार कहता हूँ। यदि दक्षिण भारत चरण हैं, गंगा मध्यभाग है,
तो नेपाल सहस्रार है। गोरखनाथ और सिद्ध आश्चर्य नहीं कि यहाँ इतने हुए।
विश्व अक्सर पूछता है—बुद्ध हिन्दू थे या अलग? भारत और नेपाल इसका उत्तर हैं।
लुम्बिनी नेपाल में, बोधगया भारत में, सारनाथ भारत में, कपिलवस्तु दोनों ओर, यह विभाजन नहीं होने देता। बुद्ध स्वयं दोनों देशों को जोड़ते हैं। भारत और नेपाल दो राष्ट्र नहीं, एक “यज्ञ” हैं।
ऋग्वेद का समाज यज्ञ पर चलता है। यज्ञ का अर्थ है—सबका अपना-अपना योगदान। नेपाल हिमालय देता है। भारत गंगा का मैदान देता है। नेपाल स्रोत है।भारत विस्तार है। नेपाल बीज है।भारत वृक्ष है। नेपाल आरोहण है। भारत अवतरण है। दोनों मिलकर एक सम्पूर्ण यज्ञ हैं।यह यज्ञ चलता रहे, यही शुभकामना है।
