वैश्विक हिंदी परिवार की अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी: “विभिन्न संस्कृतियों में गुरु : बदलता परिदृश्य” संगोष्ठी सम्पन्न

नई दिल्ली, 26 जुलाई 2026। वैश्विक हिंदी परिवार की रविवारीय कार्यक्रम श्रृंखला के अंतर्गत ‘विभिन्न संस्कृतियों मे गुरु : बदलता परिदृश्य संस्कृतियों’ विषय पर एक महत्वपूर्ण परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भारतीय सहित विश्व की विविध संस्कृतियों में गुरु-शिष्य परंपरा, गुरु की बदलती भूमिका तथा वर्तमान तकनीकी और डिजिटल युग में गुरु की प्रासंगिकता पर वक्ताओं ने सारगर्भित विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का शुभारंभ सुश्री स्वरांगी साने के स्वागत वक्तव्य से हुआ। उन्होंने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का अभिनंदन करते हुए कार्यक्रम की विषयवस्तु की भूमिका प्रस्तुत की। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. सुरेंद्र दुबे, उपाध्यक्ष, केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल, ने कहा कि गुरु सभी संस्कृतियों में ज्ञान, नैतिकता और चरित्र निर्माण का सर्वोच्च स्रोत रहा है। गुरु केवल सूचना प्रदान नहीं करता, बल्कि जीवन जीने की दृष्टि, विवेक और नैतिक चेतना प्रदान करता है। उन्होंने कबीर के ‘गुरु कुम्हार शिष कुंभ है’, ‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े’ तथा ‘गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु’ जैसे उदाहरणों के माध्यम से भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता को रेखांकित किया। उन्होंने वशिष्ठ, विश्वामित्र, संदीपनि, चाणक्य, रामकृष्ण परमहंस और समर्थ गुरु रामदास जैसे महान गुरुओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन गुरुओं ने अपने शिष्यों के व्यक्तित्व को गढ़कर उन्हें समाज और राष्ट्र के लिए प्रेरणास्रोत बनाया। प्रो. दुबे ने स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा का वास्तविक अर्थ मनुष्य के भीतर निहित शक्ति को जागृत करना है। उन्होंने कहा कि आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) सूचना उपलब्ध करा सकती है, लेकिन सूचना को ज्ञान और ज्ञान को विवेक में बदलने का कार्य एक सच्चा गुरु ही कर सकता है। उन्होंने गुरु-शिष्य संबंध में श्रद्धा, विश्वास, अनुशासन और संवाद को आवश्यक बताया। भारतीय, यूनानी, चीनी और मिस्र की सभ्यताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विश्व की सभी प्रमुख संस्कृतियों ने गुरु को ज्ञान और नैतिक मूल्यों के संवाहक के रूप में स्वीकार किया है।
मुख्य वक्ता डॉ. धनंजय कुमार, मास्टर योग शिक्षक एवं चिकित्सक, अमेरिका, ने बदलते वैश्विक परिवेश में गुरु की भूमिका पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज शिक्षक तो बहुत हैं, लेकिन गुरु की भूमिका निभाने वाले व्यक्तित्व कम होते जा रहे हैं। उन्होंने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में बढ़ते तनाव, परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था, अंकों की प्रतिस्पर्धा तथा बच्चों में बढ़ती हीनता और श्रेष्ठता की भावना पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक प्राप्त करना अथवा नौकरी हासिल करना नहीं होना चाहिए, बल्कि विवेक, रचनात्मकता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता, मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना का विकास भी शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए। डॉ. धनंजय ने संस्कृति और सभ्यता के अंतरसंबंध को स्पष्ट करते हुए कहा कि संस्कृति हमारी आंतरिक चेतना और मूल्यों की अभिव्यक्ति है, जबकि सभ्यता उसी संस्कृति का बाहरी रूप है। उन्होंने भारतीय संस्कृति के प्रमुख तत्वों के रूप में समावेश, रचनात्मकता, शांति, अहिंसा, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और आध्यात्मिक विकास को रेखांकित किया। उन्होंने आधुनिक तकनीक और मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न समस्याओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मानव प्रकृति का हिस्सा होने के बावजूद आज प्रकृति का ही विनाश कर रहा है। ऐसे समय में गुरु और शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी होगी, जो मनुष्य को प्रकृति, समाज और स्वयं के प्रति जिम्मेदार बनाए। कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता प्रो. हरिराम मिश्र, पूर्व प्रोफेसर, संस्कृत एवं इंडिक अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, ने भारतीय संस्कृति में गुरु के महत्व को रेखांकित करते हुए श्रीमद्भगवद्गीता के प्रसिद्ध श्लोक—‘तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया’—के माध्यम से गुरु-शिष्य संवाद की परंपरा को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए गुरु के प्रति श्रद्धा के साथ जिज्ञासा और निरंतर प्रश्न करने की प्रवृत्ति भी आवश्यक है। उन्होंने गुरु को केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति न मानकर ‘तत्त्वदर्शी’ बताया, जो स्वयं यथार्थ को जानता हो और शिष्य को जीवन के सही मार्ग की ओर ले जाने में सक्षम हो। प्रो. मिश्र ने कहा कि भारतीय परंपरा में गुरु और शिष्य दोनों मिलकर ज्ञान के विकास में योगदान देते हैं। गुरु का उद्देश्य केवल विद्यादान नहीं, बल्कि शिष्य में चरित्र, नैतिकता, अनुशासन और सर्वोपकार की भावना का विकास करना भी रहा है। उन्होंने भारतीय आश्रम परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थियों को केवल अपने जीवन-निर्वाह के लिए शिक्षित नहीं किया जाता था, बल्कि उन्हें समाजोपयोगी और लोककल्याणकारी जीवन जीने की प्रेरणा दी जाती थी। उन्होंने कहा कि भारत को केवल स्वयं को विश्वगुरु कहने के बजाय ज्ञान, चरित्र और शिक्षा के क्षेत्र में पुनः गंभीर प्रयास करने की आवश्यकता है। आचार्य कौटिल्य सहित भारतीय ज्ञान परंपरा के अनेक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में ज्ञान और गुरु की प्रतिष्ठा धन और यश से कहीं अधिक रही है। उन्होंने सत्य, दीक्षा, तप, अनुशासन और श्रेष्ठ कर्म को मानव एवं समाज निर्माण का आधार बताया। कार्यक्रम के संरक्षक एवं वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष श्री अनिल जोशी ने कहा कि गुरु की भूमिका को केवल कर्मकांड तक सीमित न रखकर वर्तमान समय में उसे नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता है। उन्होंने शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ाव के प्रश्न को भी रेखांकित किया। वैश्विक हिंदी परिवार, दिल्ली इकाई के अध्यक्ष ऋषि कुमार शर्मा ने गुरु-शिष्य परंपरा के ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि गुरु का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि शिष्य के व्यक्तित्व का समग्र विकास करना है। उन्होंने शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए नैतिक शिक्षा और गुरु के प्रति सम्मान की परंपरा को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। प्रो. पी. मणिकाम्बा, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद, ने भारतीय गुरु परंपरा में व्यास, श्रीकृष्ण और शंकराचार्य के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में गुरु केवल विद्या प्रदान करने वाला नहीं, बल्कि शिष्य के सर्वांगीण एवं आध्यात्मिक विकास का मार्गदर्शक रहा है। कबीर और वेमना के संदर्भों के माध्यम से उन्होंने योग्य और अयोग्य गुरु के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि सच्चा गुरु शिष्य के भीतर ज्ञान, विवेक और तत्त्व-दृष्टि का विकास करता है। डॉ. ओम प्रकाश, सहायक आचार्य, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, ने भारतीय, पश्चिमी और पूर्वी एशियाई संस्कृतियों में गुरु की भूमिका की तुलना करते हुए कहा कि भारतीय दृष्टि में गुरु जीवन का मार्गदर्शक, पश्चिमी दृष्टि में कौशल एवं विकास का सहायक और पूर्वी एशियाई संस्कृतियों में अनुशासन एवं नैतिकता का प्रेरक रहा है। उन्होंने कहा कि ‘एआई सूचना दे सकता है, लेकिन गुरु विवेक देता है; इंटरनेट उत्तर दे सकता है, लेकिन गुरु सही प्रश्न पूछना सिखाता है।’ उन्होंने वर्तमान डिजिटल युग में गुरु की भूमिका को पहले से अधिक व्यापक और महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. किरण खन्ना, अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिंदी विभाग, डी.ए.वी. कॉलेज, अमृतसर, पंजाब, ने किया। उन्होंने विभिन्न वक्ताओं के विचारों को समेटते हुए गुरु की बदलती अवधारणा और वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. शिवम शर्मा, अनुवाद अधिकारी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, ने औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. सुरेंद्र दुबे, मुख्य वक्ता डॉ. धनंजय कुमार, विशिष्ट वक्ता प्रो. हरिराम मिश्र, कार्यक्रम के प्रेरणास्रोत श्री अनिल जोशी, प्रो. पी. मणिकाम्बा, संयोजक ऋषि कुमार शर्मा, डॉ. ओम प्रकाश, संचालिका डॉ. किरण खन्ना, स्वागत वक्ता स्वरांगी साने सहित सभी वक्ताओं, सहयोगियों और ऑनलाइन जुड़े प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
रिपोर्ट :— अजय शर्मा
