प्रेमचंद जयंती पर भाषण प्रतियोगिता संपन्न

पुणे, 30 जुलाई। प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में ग्रामीण जीवन, सामाजिक विषमता, आर्थिक संघर्ष, मानवीय संवेदना और नैतिक मूल्यों को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया। उनकी रचनाएँ आज भी समाज को समझने और मानवीय दृष्टि विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। प्रेमचंद ने जो लिखा, उसे आज मनोविज्ञान की सीख की तरह भी देखा जाता है। यह कहना था डॉ. जयश्री फडणवीस का। कॉर्पोरेट जगत की जानी-पहचानी हस्ती डॉ. फड़णवीस ने बतौर मुख्य अतिथि युवा वक्ताओं को स्मरण शक्ति तथा आत्मविश्वास बढ़ाने के गुर भी बताए। हिंदी साहित्य के महान कथाकार एवं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती (31 जुलाई) के अवसर पर महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति पुणे ने विद्यार्थियों के लिए एक दिन पूर्व भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों एवं युवा प्रतिभागियों में हिंदी साहित्य के प्रति रुचि विकसित करना तथा प्रेमचंद के साहित्य, विचारों और सामाजिक सरोकारों से परिचित कराना था। संस्था के शुक्रवार पेठ स्थित कार्यालय में यह प्रतियोगिता दो वर्गों में आयोजित की गई थी। नौवीं से ग्यारहवीं तक के विद्यार्थियों के लिए विषय – मेरा प्रिय लेखक प्रेमचंद (या अन्य कोई) तथा 12वीं से उच्च शिक्षा वर्ग (स्नातक-स्नातकोत्तर) के लिए प्रतियोगिता का विषय “प्रेमचंद के कथा साहित्य में सामजिक जीवन” था। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन से हुआ। अतिथियों एवं आयोजकों ने प्रेमचंद के साहित्यिक योगदान पर अपने विचार व्यक्त किए। भाषण प्रतियोगिता में विभिन्न प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। संस्था के कार्य अध्यक्ष डॉ. सुनील देवधर ने अतिथियों के स्वागत के साथ ही विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए कहा कि उनका धन्यवाद कि वे प्रतियोगिता में भाग लेने आए अन्यथा प्रतियोगिता का नाम सुनकर कई बार आजकल बच्चे “भाग लेते” हैं उनका अभिनंदन कि वे बड़ी संख्या में उपस्थित हैं. विषय की प्रस्तावना में डॉ. राजेंद्र श्रीवास्तव ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व, उनकी कहानियों में सामाजिक यथार्थ, ‘गोदान’, ‘गबन’, ‘निर्मला’, ‘कर्मभूमि’ आदि रचनाओं तथा वर्तमान समय में प्रेमचंद की प्रासंगिकता पर अपने विचार प्रस्तुत किए। अध्यक्षीय भाषण देते हुए डॉ. सदानंद महाजन ने वक्ता के गुण-दोषों के बारे में बताया। प्रतिभागियों ने तथ्यपूर्ण प्रस्तुति, भाषा-शैली, विषय की समझ, अभिव्यक्ति और आत्मविश्वास के माध्यम से अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। प्रेमचंद की कहानी ईदगाह के साथ मेरे प्रिय लेखकों में कनिष्ठ वर्ग के वक्ताओं ने रामधारी सिंह दिनकर, आर. के. लक्ष्मण वीर सावरकर तथा तुलसीदास सहित कई लेखकों के बारे में अपनी बात कही। निर्णायक मंडल में प्रथम समूह का निर्णय स्वरांगी साने, अलका अग्रवाल तथा हितेश व्यास ने दिया। द्वितीय समूह की निर्णायक त्रयी में लतिका जाधव, डॉ. कांतिदेवी लोधी तथा प्रो. शिवदत्त थे। प्रतिभागियों के भाषणों का मूल्यांकन विषय-वस्तु, भाषा की शुद्धता, प्रस्तुतीकरण, समय-पालन और प्रभावशीलता के आधार पर किया। प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार के रूप में एक हजार रुपए, द्वितीय आने वाले को 700 रुपए एवं तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को 500 रुपए का पुरस्कार दिया गया। कनिष्ठ वर्ग में प्रथम स्थान श्रीनिधि मयूरी सागरी, द्वितीय ऐश्वी विवेकानंद धनवडे तथा तृतीय स्थान स्नेहा बाजीराव कोडीतकर को मिला। प्रोत्साहन पुरस्कार अरना चौरसिया को दिया गया। वरिष्ठ वर्ग में ध्याना श्रेणीककुमार शाह प्रथम, रेनू सिंह द्वितीय तथा आत्मजा कुलकर्णी तृतीय स्थान पर रही। सभी 25 से अधिक प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए। कार्यक्रम का संचालन मनीषा तनपुरे ने किया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. निर्मला राजपूत ने सभी प्रतिभागियों, निर्णायकों, अतिथियों एवं संयोजन सहयोगी भावना महेंद्र के प्रति आभार व्यक्त किया। प्रतियोगिता ने विद्यार्थियों में साहित्यिक अभिरुचि, वक्तृत्व-कौशल और हिंदी भाषा के प्रति सम्मान की भावना को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस अवसर पर यह संदेश भी स्पष्ट हुआ कि प्रेमचंद का साहित्य केवल अतीत की साहित्यिक विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान समाज के प्रश्नों को समझने का एक सशक्त माध्यम है। उनकी जयंती पर आयोजित यह भाषण प्रतियोगिता साहित्य और नई पीढ़ी के बीच संवाद स्थापित करने की दिशा में एक सार्थक पहल रही।

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