दिन विशेष (व्यंग्य) में “हिन्दी हमारी पहचान है – इसे सदा बनाये रखना” : विजय विक्रान्त
विजय विक्रांत का यह आलेख एक संस्मरणात्मक आलेख जैसा है। विभिन्न देशों में प्राप्त अपने अनुभवों के आधार पर वह बताते हैं कि विदेशों में लोगों का अपनी भाषा के प्रति लगाव अटूट होता है। यदि पति-पत्नी अलग-अलग मातृभाषाओं को जानते हैं तो वे एक-दूसरे की भाषाओं को सीखते हैं और आपसी वार्तालाप में उनका प्रयोग भी करते हैं। उनमें से कतिपय लोग अपनी बोली और भाषा के प्रयोग में हठधर्मी भी होते हैं। इस संबंध में आप लेखक के विचार से इस आलेख में अवगत हो सकते हैं। – डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र
पिछले छ: दशक से अधिक कैनेडा में निवास, व्यवसाय से इलैक्ट्रिकल इँजीनियर। पावर प्रॉजैक्ट्स के हेतु भारत के अतिरिक्त ऐल सैल्वाडौर, ईरान, नाइजीरिया और कैनेडा के भिन्न भिन्न प्रान्तों में मुख्य ज़िम्मेदारी निभाई। सेवानिवृत्ति के पश्चात हिन्दी प्रचार प्रसार में बहुत सक्रिय। सह-संस्थापक निदेशक, हिन्दी साहित्य सभा तथा हिन्दी राइटर्स गिल्ड कैनेडा।

हिन्दी हमारी पहचान है – इसे सदा बनाये रखना
कैनेडा में रहते हुए भारतीय पृष्ठभूमि के लोगों से जब भी मैं यह प्रश्न करता हूँ कि “कैनेडा में उनकी पहचान क्या है?” तो अधिकतर लोग अपने-आप को कैनेडियन होने के साथ-साथ भारत के अपने प्रान्त से जोड़ लेते हैं। भाषा की जब बात आती है तो अलग-अलग लोगों के अलग-अलग विचार होते हैं। यहाँ उनकी आपसी बातचीत का माध्यम अँग्रेज़ी, हिन्दी और उनकी अपनी प्रान्तीय भाषा का मिश्रण होता है। इसी सँदर्भ में जब केवल मातृभाषा हिन्दी और उससे लगाव की बात आती है तो उस के उत्तर में उनका उत्साह कुछ ठण्डा नज़र आता है।
भाषा को लेकर मेरा यह सौभाग्य रहा है कि काम के सिलसिले में, मुझे भारत से बाहर कैनेडा के विभिन्न प्रांतों और ऐल साल्वाडौर, ईरान और नाईजीरिया के लोगों के साथ रहने और काम करने का अवसर प्राप्त हुआ। इन्हीं देशों में जापान, जर्मनी, फ़्रांस, इटली, अमरीका इत्यादि से आए इंजिनियर और दूसरे पेशों के लोगों से भी मिलने का मौका मिला। विदेशों से आए ये सब लोग अपनी भाषा को बोलचाल में और लिखने में कितना प्रयोग करते हैं और कैसा सम्मान देते हैं, यह सब देखने को भी मिला और आज, ये सब मैं आपसे साझा करूँगा।
ईरान – फ़ारसी:
बात 1976 की है। मुहम्मद रज़ा शाह पहलवी के शासन काल में ईरान का विद्युतीकरण बहुत तेज़ी से हो रहा था और इसी दौरान, मेरी कैनेडियन कंपनी ने मेरा तीन साल के लिए, अपनी तेहरान स्थित, ईरानियन शाख़ा में तबादला कर दिया था। लोकल स्टाफ़ के साथ-साथ इस कंपनी में, मेरे अतिरिक्त, और भी कैनेडियन इंजिनियर थे। काम पर, सदा हमारी भाषा अंग्रेज़ी ही होती थी। वैसे उर्दू भाषा की अच्छी पकड़ होने के कारण मुझे फारसी पढ़ने और समझने में अधिक समय नहीं लगा।
हालांकि ईरान का रहना-सहना और पहनावा किसी भी यूरुपियन देश से कम नहीं था परन्तु एक विशेष बात जो मैं ने यहाँ देखी कि, दफ़तर में, जब भी ईरानी लोग आपस में बात करते थे तो वो बातचीत फ़ारसी में होती थी। यहाँ तक कि कंपनी के चेयरमैन, मैनेजिंग डायरैक्टर, सीनियर स्टाफ़ और बाकी सारे ईरानियन लोगों की बातचीत का माध्यम अधिक्तर फ़ारसी ही होता था।
हाँ, जब भी इनमें से कोई हमसे बात करता था तो वह अंग्रेज़ी में होती थी। जब कभी भी सपोर्ट स्टाफ़, ड्राइवर, इत्यादि, के साथ अकेले होते थे तो जैसे-तैसे करके काम चला लेते थे।
तेहरान में, जब भी हमारी कैनेडियन और ईरानियों की इकट्ठी पार्टियाँ होती थीं, तो ऐसे अवसर पर, किसी भी प्रकार का न कोई परदा होता था और न ही पुरुषों में और महिलाओं में बात करने की कोई पाबंदी। यहाँ पर जैसा मौका होता था, उसी के हिसाब से भाषा का प्रयोग होता था।
और-तो-और, सारे देश की दुकानों के साइन बोर्ड, बड़े-बड़े होटल, पुलिस का महकमा, डाकघर, एयरपोर्ट, कस्टम और सारे सरकारी दफ़तरों में फ़ारसी का ही बोलबाला था। अगर कभी आप ऐसी जगह फंस भी जाएँ जहाँ आपको फ़ारसी नहीं आती हो तो आम ईरानी आपकी पूरी सहायता करने का प्रयास करता था।
जापान तथा जर्मनी:
ईरान और नाईजीरिया में नए-नए पावर हाउस का निर्माण हो रहा था और जापान तथा जर्मनी की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ, अलग-अलग मशीनों की सप्लायर और मुख्य कॉन्ट्रैक्टर थीं। क्योंकि मेरा और मेरे और साथियों का काम इन दोनों ठेकेदारों के काम का इंस्पैक्शन करना होता था, इसलिए उनके लोकल काम करने वाले जापानी और जर्मन इंजीनियर तथा जापान और जर्मनी से आए हुए शिष्टमंडल से ख़ूब वास्ता पड़ता रहता था। यही नहीं, कभी-कभी तो, प्रॉजैक्ट के सिलसिले में हफ़्तों इन लोगों के साथ बिताने पड़ते थे।
इन दोनों देशों की कंपनियों के लोकल स्टाफ़ के सारे लोग आपस में अपने देश की भाषा बोलते थे। जब कभी भी वन-टू-वन बातचीत होती थी, ये लोग पूरा प्रयत्न करते थे कि अंग्रेज़ी में बोलें। समय के साथ-साथ इन लोगों ने अपनी-अपनी भाषाओं के कुछ शब्द हमें भी सिखा दिए थे।
छोटी-मोटी मीटिंग के लिए, जब कभी भी मैं या मेरा कोई और साथी इनके दफ़्तर जाते थे तो सदा यही देखने को मिलता था कि आपस में ये सभी अपनी ही भाषा में बात करते थे। किसी बड़ी मीटिंग में बैठे हुए भी, अगर हमारे प्रश्न का उत्तर देने के लिए इन्हें आपस में सलाह करनी होती थी तो ये पहले, आपस में अपनी ही भाषा में सलाह करने के बाद इसका उत्तर इंगलिश में देते थे।
हालांकि ये लोग धड़ाके की इंगलिश बोलना जानते थे लेकिन, सालों इन लोगों के साथ काम करते हुए भी मैंने जापान और जर्मनी के लोगों को आपस में बात करते हुए, कभी भी किसी दूसरी भाषा का इस्तेमाल करते हुए नहीं देखा।
हालांकि मेरा यह तजुर्बा काम पर था परन्तु काम के बाहर भी जब भी इन दोनों देशों के नागरिकों से मुलाकात होती थी तो सदा यह अपनी ही भाषा में बातचीत करते थे।
यहाँ यह हकीकत काबिले-ग़ौर है कि इन दोनों देशों में शिक्षा का माध्यम इनकी अपनी ही भाषा है। बच्चों के स्कूल शुरु होने से लेकर साइंस, मैडिकल, इंजिनियरिंग, मैनेजमैण्ट और दूसरे विषयों पर केवल अपनी भाषाओं का माध्यम है।
फ़्रैंच कैनेडा:
1965 में, कैनेडा में, अपनी शुरुआत मैं ने क्युबैक प्रान्त के मॉन्ट्रेयाल शहर से की थी। वैसे तो कैनेडा की दो राष्ट्रभाषाएँ अंग्रेज़ी और फ़्रैंच हैं, लेकिन क्युबैक प्रान्त में फ़्रैंच का बोलबाला कुछ अधिक ही था। वैसे सारे काम अंग्रेज़ी भाषा समय के साथ-साथ इस प्रान्त में फ़्रैंच भाषा को बोलने का ज़ोर और भी मज़बूत होता जा रहा था। इसी प्रान्त के मॉन्ट्रेयाल शहर में मेरे एक मित्र कुमार को, जो म्युचवल फ़ण्ड का काम भी करते थे, अपने घर के पीछे डैक बनवाना था। इस काम के लिए उसने एक दो फ़ोन किए और एक फ़्रैन्च कैनेडियन ठेकेदार, जोज़ेफ़, को काम दे दिया। काम के दैरान, जोज़ेफ़ और कुमार आपस में अंग्रेज़ी में ही बातचीत करते थे। डैक बन जाने के बाद जब ठेकेदार अपनी आख़िरी भुगतान लेकर जाने लगा तो मेरे मित्र ने उसे बताया कि वो म्युचवल फ़ण्ड़ का काम भी करते हैं और वो उसको बहुत अच्छी डील दे सकते हैं।
इतना सुनकर जोज़ेफ़ एकदम फ़्रैन्च में बोलने लगा। मेरे मित्र कुमार के कहने पर कि उन्हें फ़्रैन्च नहीं आती और उन्होंने उससे अंग्रेजी में बोलने को कहा तो यह सुनकर जोज़ेफ़ बोला; ”देखिये मिस्टर कुमार, अगर आपको मुझे म्युचवल फ़ण्ड़ बेचने हैं तो फ़्रैन्च में बात कीजिये। मुझे जब काम की ज़रूरत थी तो मैंने आपकी भाषा बोली। आपको यहाँ रहते हुये तीस साल से भी ऊपर हो गए हैं; अब अगर आपको मुझसे कोई बिज़नैस लेना है तो मेरी भाषा में बात करो”। इतना कह कर जोज़ेफ़ बॉय-बॉय कहकर चला गया और मेरे मित्र यह सुनकर हैरान रह गए…।
हालाँकि, कहने को तो यह, एक छुटपुट घटना थी, लेकिन जैसा मैंने पहले भी कहा है, धीरे-धीरे ऐसी घटनाएँ ज़ोर पकड़ती जा रही थीं। एक बार तो जब हम एक गाँव में से गुज़र रहे थे तो एक दुकान पर अंग्रेज़ी में पानी मांगा तो दुकान्दार ने ऐसा मुंह बनाया जैसे उसे हमारी बात समझ ही नहीं आ रही हो, लेकिन जब एक डॉलर का नोट उसके सामने रखकर अंग्रेज़ी में कोका कोला मांगा तो तुरंत मिला।
यूक्रेन कैनेडा:
24 मई, 2013 को, हिन्दी टाइम्स द्वारा आयोजित, ड़ॉ. कुमार विश्वास के कार्यक्रम में, कैनेडा के इमीग्रेशन मन्त्री श्री जेसन कैनी से मुलाकात हुई। बातचीत के दौरान में श्री कैनी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कैनाडा के मल्टीकल्चरल वातावरण में, अंग्रेज़ी और फ़्रैन्च भाषाओं के अतिरक्त, हमें अपने बच्चों को हिन्दी भाषा की भी शिक्षा देनी चाहिये। उन्होंने सैस्काचवान-कैनाडा में बसे हुये युक्रे्नियन लोगों की मिसाल दी। आज की पीढ़ी के युक्रे्नियन लोगों के पूर्वज तकरीबन सौ साल से भी पहले यहाँ कैनेडा में आए थे। उन लोगों की अब पाँचवीं या छठी पीढ़ी होगी। वर्तमान पीढ़ी ने तो केवल कैनाडा को ही देखा और जाना है। बहुत से तो शायद कभी भी युक्रेन नहीं गए होंगे। इन सब के बावजूद, कैनाडा में रहते हुए, आज भी, इस पांचवीं या छठी पीढ़ी के लोग अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े हुए हैं।
आदरणीय कैनी के इस बात की पुष्टि मैंने स्वयं अपने अनुभव से देखी और परखी है। 1979 में जब पाँच साल के लिये मेरी पोस्टिंग सैस्काचवान की हो गई तो युक्रेन पृष्ठभूमि के लोगों के साथ काम करके, रह करके और बात के मुझे बहुत बड़ा आश्चर्य हुआ कि कैसे इन लोगों को अपनी भाषा पर गर्व है और कैसे इन्होंने इसको अभी तक कायम रक्खा है। इस समाज ने जब दिल में एक बार ठान ली कि अपनी भाषा को यहाँ रहते हुए जीवित रखना है तो फिर कैसे करना है, इन्होंने वैसे ही साधन जुटा लिए।
हिन्दी भारत:
सन 1947 में अंग्रेज़ तो चले गए; लेकिन जाते जाते अपनी एक निशानी, ऐसी छोड़ गए जिसमें ग़ुलामी की दुर्गन्ध आती है। इसका सबसे बड़ा कारण तो देश का दुर्भाग्य है कि आज़ादी मिलने के बाद भी उस समय के नेताओं ने ग़ुलामी की इस प्रथा को जारी रखा और अपनी राष्ट्रभाषा पर कोई ध्यान नहीं दिया। आज भी भारत में बहुत से ऐसे परिवार हैं जहाँ, घरों में अभी भी अंग्रेज़ी बोली जाती है। मल्टिनैशनल कंपनियों के आने के बाद तो यह ट्रैण्ड और भी ज़्यादा ज़ोर पकड़ गया है। प्रोफ़ैशनल कालेज के ग्रैज्युएटों का हिन्दी का न बोलना तो समझ में आता है क्योंकि उनकी सारी शिक्षा अंग्रेज़ी में हुई है और वो इसी भाषा में वार्तालाप करने में अपने आप को कंफ़र्टेबल महसूस करते हैं।
अपनी भाषा में पुस्तकों का न होना भी एक बहुत बड़ी कमी है। पिछले सत्तर वर्षों में टैकनिकल और मैडिकल पुस्तकों के हिन्दी अनुवाद पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया गया और इसका नतीजा हम आज देख रहे हैं।
अन्तरजातीय/और अन्तरभाषिक विवाह:
परिवार में बच्चा होने के बाद, कई बार अन्तरजातीय या/और अन्तरभाषिक विवाहों में यह समस्या आ जाती है कि बच्चों को कौन-सी शिक्षा को प्राथमिकता दी जाये; पिता की या माँ की? इस मुद्दे को लेकर जब लड़के या लड़की के माँ-बाप का दख़ल होने लगता है तो मामला और भी बिगड़ जाता है। ऐसे मामले में यदि पति-पत्नी आपस में ठण्डे दिमाग़ से विचार करें तो हर समस्या का हल बहुत आसानी से मिल जाता है। कैसे ऐसे मामले को सुलझाया गया, इसका एक किस्सा मैं आज आपके साथ साझा करना चाहता हूँ।
1965 में जब मैं मॉन्ट्रेयाल में था तो सैन्डियागो अल्वारेज़ नाम का मेरा एक स्पैनिश सहयोगी था। काम के साथ-साथ, कभी-कभी आपस की घरेलू बातें भी हो जाती थीं। एक दिन, बातों ही बातों में मुझे पता चला कि सैन्डियागो के तीन साल का बेटा, साईमन, है और उसकी बीवी डौना ड़च है। मेरे पूछ्ने पर कि बच्चे से किस भाषा में बात करते हो तो उसने बताया, ”मैं सदा साईमन से स्पैनिश में बात करता हूँ और वो मुझे स्पैनिश में ही जवाब देता है। इधर, डौना सदा अपने सवाल-जवाब डच में करती है और साईमन को प्रोत्साहित करती है कि वह डच में ही उत्तर दे। साईमन हम मियाँ-बीवी को आपस में फ़्रैंच में बात करते सुनता है और अधिकतर हमारे दोस्त, जब भी मिलते हैं, साईमन से अंग्रेज़ी में बोलते हैं।“ ये सब सुनकर एक बार तो मैं हैरान हो गया, लेकिन दोनों पति-पत्नी की सूझ-समझ और अण्डरस्टैंडिंग की दाद देने से भी नहीं चूका। अब आप ही सोचिये कि ऐसे वातावरण में पला हुआ बच्चा शुरू-शुरू में तो भ्रमित होगा लेकिन बड़ा होकर चार-चार भाषाओं में परांगत होगा। आज साईमन पचास से ऊपर का होगा और मुझे पूरा विश्वास है कि उसने और भाषायें भी सीख ली होंगी।
इन घटनाओं से आप जो भी निष्कर्ष निकालें, मैं आप पर छोड़ता हूँ। यहाँ, एक बात ज़ाहिर है और वह है, अपनी-अपनी भाषाओं पर गर्व करना और उन्हें सम्मान देना तथा मामला पेचीदा होने पर उसका सर्व-स्वीकार्य समाधान निकालना। हम हिन्दी भाषाइयों को अपनी पहचान को ज़िन्दा रखने के लिये हिन्दी को जीवित रखना क्या बहुत कठिन बात है?
